Monday, 31 December 2012

उन्हें फांसी दो या हमें



स्त्री के अदम्य साहस और उसकी बेजोड़ जिजीविषा का, जिसके बूते ही तमाम आघात झेलने के बाद भी आज न सिर्फ वह लड़की जीने का हौसला रख रही थी बल्कि उसने अपने खिलाफ हुए जुर्म के जरिये लिंगभेद की सारी दीवार तोड़ते हुए देश की आवाज को एकजुट कर दिया है। हर तरफ से एक ही आवाज आ रही है कि जुल्म करने वालों को फांसी दो. इस वक्त सारा देश गुस्से से उबल रहा है क्योंकि एक लड़की के साथ हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली में सात दरिन्दों ने ना सिर्फ बलात्कार िया बल्कि हैवानियत की सारी सीमाएं लांघते हुए लोहे की रॉड से उसके पेट और गुप्तांगों पर इतना मारा कि वह लड़की अपने जिस्म-ओ-जेहन पर चोट का भयानक दर्द झेलते हुए सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही थी, कागज पर लिखे लफ्जों के जरिये वह अपनी बात कह रही थी, अभी तक इस हादसे के कारण पांच ऑपरेशन का दर्द झेलने के बाद उसने अपनी मां से कागज पर एक बात कही थी जानना चाहेंगे, वह बात क्या थी उसने लिखा है- मां, मैं जीना चाहती हूं।
इस एक वाक्य से सारी दुनिया के सामने एक संदेश जाता है और वह संदेश है- स्त्री के अदम्य साहस और उसकी बेजोड़ जिजीविषा का, जिसके बूते ही तमाम आघात झेलने के बाद भी आज ना सिर्फ वह लड़की जीने का हौसला रख रही थी बल्कि अपने साथ हुए जुर्म के जरिये लिंगभेद की चारदीवारी तोड़ते हुए देश की आवाज को एकजुट कर दिया था , हर तरफ से एक ही आवाज आ रही है कि जुल्म करने वालों को फांसी दो। मसला महज दोषी को सजा देने का नहीं है, मुद्दा जनतंत्र में कराहते उस जन का है जो इस देश का समान नागरिक होने के बावजूद महज स्त्री होने के कारण सदियों से दोयम दर्जा भुगत रहा है लेकिन अब हालात बर्दाश्त के बाहर हो रहे हैं। कोई भी दो टके का भंडवा आता है और मां-बहन की गाली बकता किसी लड़की को सरेआम बेइज्जत करके चला जाता है और हम खड़े होकर तमाशा देखते रहते हैं या उस कानून के सहारे सालों इंसाफ का रास्ता तकते रहते हैं जहां पहले से ही अपराधी को बचाने के लिए कई चोर दरवाजे बने हुए हैं। गौरतलब है कि इस नजीर को महज सूचना ना समझा जाए, ये खुली चेतावनी है उन आवारा दोपाया लोगों के लिए, जो अपनी चरित्रहीनता के जरिये देश और समाज का नाम बदनाम कर रहे हैं। अब जनतंत्र हमें इंसाफ देने के बजाय इन छुट्टा सांडों को हमारे सुपुर्द कर दे। हम आंख के बदले आंख और जान के बदले जान की नीति के तहत खुद मौका-ए-वारदात पर या माकूल वक्त मिलते ही इंसाफ हासिल कर लेंगे क्योंकि खुद के बचाव में की गई हत्या अपराध नहीं होती। जिसने स्त्री को जलाया है, उसे उतनी ही शिद्दत से भूनेंगे, जिसने स्त्री के गुप्तांग पर लोहे की सरिया से बेरहम वार किया है, उसके गुप्तांगों को उतनी ही निर्ममता से कूच डालेंगे, जिसने लड़की के चेहरे पर तेजाब डालकर उसे मर्मान्तक पीड़ा दी। उसके ऊपर इतना तेजाब डालेंगे कि उसकी रूह तक जल जाये। जिसने किसी अबोध बच्ची की मासूमियत से खेला, उसकी जुबान काटकर धीरे-धीरे हाथ-पैर काटकर जंगली जानवरों के बीच छोड़ देंगे ताकि उसकी हड्डी तक का पापी बोझ ये धरती ना झेले। जिसने अपनी नामर्दगी दिखाते हुए स्त्री के जिस्म से बलात्कार किया है, उसे चौराहे पर नंगा करके लटका देंगे ताकि हर राहगीर उस पर थूक कर पत्थर मारे। ये पैरा पढ़ते वक्त कई लोगों को मुझसे शिकायत या नफरत हो सकती है, यकीन मानिये, मैं एक महान देश का सभ्य नागरिक हूं जिसे अपनी राष्ट्रीय और सामाजिक जिम्मेदारी का पूरा बोध है। अपने पूरे होशो-हवास में यह बात मैं महज इसलिए कह रहा हूं ताकि वहशियाना व्यवहार करने वालों को यह अहसास हो सके कि उन्हें पढ़कर जब इतनी नफरत हो सकती है तो जिसके साथ वे सदियों से इतनी पाशविकता करते आ रहे हैं, उन्हें किस दर्जे की शिकायतें या नफरत होगी? अगर पीड़ित स्त्री नफरत पर उतर आये तो घर से लेकर संसद तक हाहाकार मच जायेगा, लिहाजा वक्त रहते सुधार बेहद जरूरी हो गया है। यह गुजर रहे बरस या उसके पहले स्त्री के खिलाफ हुई हिंसा की प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि आज के वक्त की मांग है क्योंकि अब हमें न्याय की रोकर भीख नहीं मांगनी बल्कि अपराधी के घर में भीड़ बनकर धावा बोलकर उसे वहीं बेइज्जत करना है। तभी देन एंड देअर जस्टिस की अवधारणा चरितार्थ होगी। हाल ही में थॉमस रियूटर्स ट्रस्ट द्वारा एक सव्रेक्षण कराया गया। उस सव्रेक्षण से जो तथ्य सामने आया, उससे भारत की छवि और भी ज्यादा शर्मनाक हो गयी। सव्रेक्षण के अनुसार, भारत संपूर्ण विस्वा में महिलाओं के लिए चौथा सबसे असुरक्षित स्थान है। महिलाएं आज बाजार, दफ्तरों, शिक्षण संस्थानों, बस, ट्रेन या किसी भी अन्य सार्वजनिक स्थल पर स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं और करें भी तो कैसे? 9 जुलाई 2012 को असम की राजधानी गुवाहाटी में एक किशोरी को 30 लोगों की भीड़ ने घेरकर सरेआम प्रताड़ित किया। इस प्रकार की घटनाएं भारतीय समाज में आज आम हो चुकी हैं। आज समाचारपत्रों से लेकर न्यूज चैनल तक सभी नारी उत्पीड़न की घटनाओं से भरे पड़े हैं। 

अजय शुक्ला
रफ़्तार लाइव
raftaarlive@gmail.com

Labels:

स्त्री अस्मिता पर उठते प्रश्न



साल का अंत आते-आते देश में महिला की अस्मिता और सुरक्षा पर बढ़ते हमलों का प्रश्न अखिल भारतीय जनाक्रोश का विषय बन गया। देश का हर सोचने-समझने वाला व्यक्ति शर्मसार है और महिला भी इंसान है का नारा देश के हर कोने में गूंज रहा है। अब समाज के सामने लाखों सवाल मुंह बाए खड़े हैं- आखिर आधुनिक युग में औरत को क्यों केवल भोग की वस्तु के रूप में देख जा रहा है? क्यों हजारों महिला-पक्षधर कानूनों के बनने के बाद भी महिलाओं पर हिंसा बढ़ेगी ही? क्यों महिलाओं के बढ़ते कदमों को समाज बर्दाश्त नहीं कर पा रहा? आज संयुक्त राष्ट्र को कहना पड़ रहा है कि महिलाओं पर हिंसा को खत्म करने के लिये सभी को एकताबद्ध होना होगा। इस पर विशेष अभिज्ञान लिया गया और 2013 में महिलाओं की स्थिति पर बने आयोग का 57वां अधिवेशन न्यूयार्क में होगा, जिसमें महिलाओं और लड़कियों पर हर प्रकार की हिंसा का खत्मा अहम मुद्दा बनेगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा- बलात्कार और महिलाओं पर अपराध की घटनाओं में जो भयानक इजाफा हुआ है, वह देश-विदेश में गंभीर चिंता का विषय बना है। एशियन मानवाधिकार संगठन ने कहा कि महिला को बराबर का हक देना और महिलाओं पर हिंसा को अपराध की श्रेणी में शामिल करना अब तक व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सका है। महिलाओं पर हिंसा को परंपरा और धर्म वैधानिकता प्रदान करते हैं- इस वजह से एशिया को बदलने की महिलाओं की योग्यता व क्षमता कमजोर होती है।
पिछले वर्ष के एनसीआरबी के आंकड़े बता रहे थे कि महिलाओं पर हो रहे अपराधों में इजाफा हुआ है और पश्चिम बंगाल व आंध्र प्रदेश, जहां लोग परंपराओं के काहिल हैं, पहले और दूसरे नंबर पर थे, पर इन राज्यों की सरकारों या केंद्र सरकार ने कोई ऐसे कदम नहीं उठाए जिनको देखकर लगे कि अब इन अपराधों को रोकने का प्रयास किया जाएगा। बलात्कार के मामले मध्य प्रदेश से सबसे ज्यादा आए थे और घरेलू हिंसा के मामले तमिलनाडु से, 40 प्रतिशत आये हैं। मेगा  शहरों में दिल्ली, बेंगलुरू और हैदराबाद में महिलाएं अत्यंत असुरक्षित रही हैं। इसके अलावा इस वर्ष हरियाणा ने सामूहिक बलात्कार के इस वर्ष हरियाणा बलात्कार के रिकार्ड माह में 19 कांड है, रिकार्ड तोड़ दिये जब एक माह में 19 कांड हो गए जिनमें ज्यादातर लड़कियां नाबालिग थीं। पर जिस रफ्तार से महिलाओं पर हिंसा बढ़ रही है, सरकार और संस्थाओं की प्रतिक्रिया बहुत ही क्षीण है। महिला आयोग शक्तिहीन है। यूनियन केबिनेट बलात्कार कानून में परिवर्तन कर धारदार बनाने के लिये भारतीय दंड संहिता और अपराध संहिता में संशोधन के मामले को लटकाई हुई है; पर यौन हिंसा के सवाल को लिंग निरपेक्ष बनाने की कोशिश जारी है, जिस पर तमाम महिला संगठनों ने विरोध दर्ज किया है।
अजय शुक्ला
रफ़्तार लाइव

Labels:

Sunday, 30 December 2012

तुम क्यों छोड़कर चली गई, हमें जगाने के बाद


तुम क्यों छोड़कर चली गई, हमें जगाने के बाद
हर दिल रो रहा है आज, तेरे गुज़र जाने के बाद।।


कितनी बड़ी विडंबना है न ! कि वो निर्दोष थी तो चल बसी और जो गुनेहगार हैं वो आज भी ज़िन्दगी जी रहे हैं। भारत में जिस औरत को आस्था मानकर वर्ष भर पूजा जाता है उसी आस्था के रूप को इन्साफ दिलाने में इतनी देर लग रही है। इन्साफ देने की बजाये जो आवाजें इन्साफ के लिए उठी उन्हें दबाने की कोशिश की गई। कभी भीड़ पर आंसू गैस के गोले बरसाए गए तो कभी लाठियाँ। उस अवाम को रोकने की हर मुमकिन कोशिश कर ली गई जो अपने घर की बेटियों और उस लड़की की आबरू के लिए खड़ी थी। अगर कोई कोशिश नहीं की गई तो वो इसकी कि कोई सख्त क़ानून जल्द से जल्द पास करके उस लड़की को कम से कम थोड़ी राहत दी जाए। सच में उस लड़की का आधा बलात्कार भारत सरकार ने किया है। अगर अब भी दरिंदगी की उस तस्वीर को फांसी न मिली तो उस लड़की की मौत की जिम्मेदार पूरी तरह से भारत सरकार होगी। जिसे FDI पर नियम बनाने पर समय नहीं लगता, जिसे पेट्रोल डीजल और गैस सिलेंडर के दाम बढाने में समय नहीं लगता, पर उसे भारत की बेटी की आबरू से खेलने वालों को फांसी दिलवाने में इतनी देर लग रही है, जबकि 17 दिसम्बर से देश की अवाम लगातार इसके लिए झूझ रही है। अगर उन दरिंदो को फांसी होती है और एक सख्त कानून बनता है तो शायद हमारे जैसी तमाम लड़कियां अपने को थोडा महफूज महसूस करें, पर अगर सरकार सोई रही तो हर माँ अपने बच्चे को जन्म देने से पहले अपनी  कोख से डरेगी की कहीं बेटी न हो जाए! हर भाई की कलाई सूनी रहेगी और इस जीवन का आधार समाप्त हो जाएगा।

Written by- Swati Gupta

Labels:

पूरा देश आहत है आज उसके गुजर जाने से


पूरा देश आहत है आज उसके गुजर जाने से। आज इस देश ने अपनी एक बहादुर बेटी को खो दिया पर उसके जाने की वजह ऐसी क्यों है ये मेरा सवाल है उस विधाता से ?? किसी भाई ने अपनी बहन खोई है, किसी माँ ने अपनी बेटी, किसी ने अपनी दोस्त। देश के हर भाई, माँ, पिता और बहन का दिल जख्मों से हरा है। हर दिल में एक मलाल रह गया कि ...........
काश हम उसे जिन्दा रख पाते,
काश दे देते उसे हम अपनी ही जिन्दगी,
काश हम उसकी आँखों को ये नज़ारे दिखा पाते,
काश दिखा पाते कि इतनी सर्द में भी यहाँ जलती है जिन्दगी तेरे लिए,
तेरे हर कतरे खून का हिसाब मांगते हैं ये लोग,
तेरी हर एक आह का जवाब मांगते हैं ये लोग,
मर गई आज भारत की आत्मा सिसक सिसक कर ये सवाल करती है,
क्यों क़त्ल कर डाला मेरे संस्कारों का तूने,
न जाने कितनो के जख्मो का बयान करती है,
इनके जख्मो पर भला मरहम कैसे लगे ?
दुःख इस बात का है कि हमारी न्याय प्रणाली के लोग इन तमाम लोगों को न्याय दिलाने के बजाय इन मुद्दों को दबाना चाहते हैं।
न्याय आज बिलख बिलख कर रोया हर जन जन के साथ खड़े होकर,
बस तुझ तक पहुँचने का रास्ता ढूंढ रहा था बिलख बिलख कर।
 सरकार की न्याय प्रणाली न उसे न्याय दिल पाई न उसे जिन्दा रख पाई। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और ममता शर्मा का कहना है कि इतनी विभत्स घटना के बाद भी जनता को शांति से मनन और चिंतन करना चाहिए। ताकि जब तक हम चिंतन करे तब तक ये आग शांत हो जाए और फिर कुछ दिनों बाद इस चिंतन का नतीजा ये निकले कि फिर जब हम किसी सुबह उठें तो हममे से एक नयी दामिनी तैयार मिले। आज भी इतने बड़े आन्दोलन के बाद भी महिलाओं के साथ होने वाले दुराचार से अखबार और न्यूज़ चैनल सजे मिलते हैं। इस घटना को महज 15 दिन हुए हैं पर आज ही दिल्ली की सडको पर दौडती इन तेज बसों में फिर से एक ऐसा ही किस्सा सामने आया है लड़की की उम्र 13 वर्ष थी पर किस्मत की धनी थी शायद वो जो स्थानीय लोगों ने उसे बचा लिया। आज की ही घटना में मुज्जफरनगर की दो शिक्षकाओं के साथ बलात्कार की कोशिश की गई जिसमे से एक तो किसी तरह भाग निकली पर एक फिर से उसी हालात की शिकार हो गई। दूसरी तरफ एक और 13 वर्ष की लड़की के साथ उसके ही मौसेरे भाई और जीजा ने मिलकर बलात्कार किया रिश्तों को शर्मशार कर डाला इन लोगो ने। अभी उस वीभत्स घटना की आग शांत भी न हो पाई कि ये घटनाएं घट गई। ये केवल एक ही दिन की घटना हैं न जाने कितनी घटना होगी जो घटित तो हुई होगी पर उजागर नहीं। हम आज भी महफूज नहीं। मेरी आबरू मुझसे सवाल करती है कि मैं कब तक उसे संभाल कर रख पाउंगी इन मंजरों में। मैं क्या भारत की हर बेटी की आबरू आज ये सवाल करती होगी।

Written by- Swati Gupta

Labels:

Wednesday, 26 December 2012

सर्दी और सरकारी रवैये ने की जन समर्थन में कमी


गैंग रेप में जनता द्वारा लड़ी जा रही लड़ाई में आज थोड़ी कमी देखने को मिली जंतरमंतर पर लोगो की भीड़ में भी कमी आई है जिसके कई कारण बताये जा रहे हैं जिनमे पहला है सरकार का गैरजिम्मेदाराना और तानाशाही रवैया, जो की लगातार चले आ रहे जन विरोध के बावजूद नहीं बदल रहा है |सुबह से ही आज जंतर मंतर पर कम भीड़ देखी गयी लेकिन बाद में धीरे-धीरे भीड़ एक समय बड़ी भी और उस भीड़ को देखकर आसानी से कहा जा सकता था की वो किसी भी तरह इस मुदद्दे पर बिना इन्साफ पाए पीछे नहीं हटेंगे , इसी बीच कई बार अपवाह भी उडी की शायद पीड़िता की मृत्यु हो चुकी है जिसे छुपाया जा रहा है, मगर रात होते-होते ये खबर आई की पीड़िता की हालत में सुधार न आने की वजह से उसे इलाज़ के लिए विदेश भेजा जा रहा है |
इन सब परिस्तिथियों के बीच एक बात तो साफ़ हो गयी है की इन्साफ मांग रही जनता किसी भी तरह ये लड़ाई बीच में नहीं छोड़ना चाहती है क्यूंकि वो ये बात अच्छी तरह से जान चुकी है की अगर वो आज पीछे हट गयी तो उनका कल बहुत ही ज्यादा अंधकारमय हो सकता है |


Labels:

Tuesday, 25 December 2012

गरिमा



स्याह किन्हीं अंधेरों में बेआबरू हुयी आज भारत की आन ,

सभ्यता की इस नगरी में फिरते भेड़िये पहन इंसानी खाल ,

एक बेटी का आहत दामन चीख कर पूछे हम से ये सवाल ,

माँ भारती की रूह से कब मिटेंगे ये हैवानियत के निशान ,

गंगा की निर्मल धारा भी दहक उठी धुल ये पापों की आग ,

मर्यादाओं की इस भूमि में आखिर क्यूँ बिखरते हैं संस्कार ,

पूजता है एक तरफ तो देवीयों की हस्ति को पुरूष संसार ,

दूजी ओर फ़िर पलट करता है क्यूँ उस देवी पर ही आघात ,

विकृत उस कृत्य के कारण डोल गया विश्वास का आधार ,

चोटिल रोती नारी गरिमा देख खड़ी मानवता यहाँ शर्मसार........




लेखक-अंकुर सहाय 










Labels:

“पान सिंह तोमर” के बाद अब “भाग मिल्खा भाग”


               फरहान अख्तर जो की आज के समय में फिल्मी दुनिया के ऐसे सितारे के रूप में उभरकर आयें हैं जो हर फ़िल्मी छेत्र में एक सम्पूर्णता को दर्शाते हैं और अपनी फिल्मो के माध्यम से एक अलग तरह का सिनेमा प्रदर्शित करने कोशिश हमेशा से करते रहे हैं और इसी तरह की कोशिश को आगे बढ़ाते हुए वो अपनी अगली फिल्म "भाग मिल्खा भाग" के साथ दर्शको के सामने आ रहे हैं जो की एक ऐसे एथलीत की कहानी है जिसे लोग "फ़्लाइंग सिख" के नाम से जानते थे और जो एक मात्र धावक थे जिन्होंने कॉमन वेल्थ में भारत की तरफ से गोल्ड मेडल जीता था |
               इससे पहले खिलाड़ी के जीवन के संवेदनशील हिस्से पर बनी फिल्म “पान सिंह तोमर” को लोगो ने काफी पसंद किया था मगर ये फिल्म पैसे कमाने की होड़ पीछे ही रही थी | आज के समय में फ़िल्मी दुनिया में हर व्यक्ति जहां ऐसी ही फिल्म से जुडना चाहता है जो भरपूर फायदा यानि पैसा दे ऐसे में इस तरह की फिल्मो को कम दर्शक मिलना एक बुरा संकेत होगा उस इंडियन सिनेमा के लिए जो दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता है |
         इस फिल्म से जुड़ी एक और बात खास है मिल्खा सिंह ने अपनी जीवन गाथा मात्र एक रूपए में बेची है और इस फिल्म की कमाई का एक बड़ा हिस्सा एथलीत लोगो की सहायता के लिए जाएगा |

Labels:

अब बस सफेद जर्सी मे दिखेंगे


तेंडुलकर ने क्रिकेट को भारत मे एक धर्म बना दिया और भारत की जनता ने उन्हे इस खेल का भगवान बना दिया है.कई सालो तक भारत मे लोग अपने टी.वी बंद कर देते थे जब सचिन आऊट हो जाते थे.                           


अपने पहले दो एकदिवसीय मैच मे उनके बल्ले से कोई रन नही निकला पर फिर भी उन्होने हार नही मानी.न्यूजीलैंड के खिलाफ एकदिवसीय मैच मे जब पहली बार पारी की शुरुवात करने का मौका मिला तो उन्होने उस मौके का भरपूर लाभ उठाया और सिर्फ 49 गेंदो पर शानदार 82 रन बना डाले. एकदिवसीय क्रिकेट मे अपना पहला शतक उन्होने 79 मैचो के बाद बनाया. परंतु उस शतक के पहले ही उनमे एक महान बल्लेबाज़ की छवि उनमे नज़र आने लगी थी.

सचिन रमेश तेंडुलकर जी हा यही नाम है उस महान बल्लेबाज़ का
. अपने 23 साल के एकदिवसीय क्रिकेट के  करियर मे सचिन ने बल्लेबाज़ का हर रिकार्ड अपने नाम किया है.सबसे ज्यादा शतक हो ,सबसे ज्यादा रन या सबसे ज्यादा मैच हर जगह सचिन का ही नाम है. सचिन का खेलने का अंदाज़ बेखौफ है. जब सचिन ने एकदिवसीय मैचो मे बल्लेबाज़ शुरु की तो उन्होने एक नये अंदाज़ मे खेलने का तरीका दिखाया .तकनीक के जरीये किस तरह से तेजी से रन बनाये जा सकते है.

सचिन तेंडुलकर पर हमेशा आरोप लगता रहा है के जब कभी वो शतक बनाते है टीम हार जाती है. लेकिन शायद ऐसा कहने वाले और उनकी बातो पर विश्वास करने वालो ने कभी आकडो पर गौर नही करा है. सचिन के 49 शतक मे से 33 शतक भारत की जीत मे शामिल थे.
अपने पहले ही दौरे पर एक शो मैच मे जब सचिन ने मुश्ताक अहमद की गेंद पर छ्क्के जडे.तो पाकिस्तान के अब तक के उम्मदा लेग स्पिनर अब्दुल कादिर ने कहा –“ बच्चो को क्या छ्क्के मार रहे हो, हमारी गेंद पर मार के बताओ”. सचिन ने कादिर के अगले ही ओवर मे 4 छ्क्के जड दिये.सचिन ने छ्क्के जडने के पहले ना बाद मे कादिर को कुछ कहा. बस अपने बल्ले से जवाब देते रहे. ये सचिन की एक शानदार खूबी है. वो कभी भी शब्दो से नही अपने बल्ले से प्रहार करते है. सचिन ने उस मैच मे सिर्फ 18 गेंद पर 53 रन बनाये थे और वो मैच सिर्फ 20 ओवर का था. अगर वो एक अंतरराष्ट्रिय मैच होता तो ये पारी रिकार्ड के पन्नो मे स्वर्णिम अक्षरो मे लिखी जाती.

सचिन ने दुनिया के हर गेंदबाज़ का सामना किया, किसी ने उन्हे अपनी गती से, किसी ने स्पिन से तो किसी ने उन्हे उकसा के आऊट करने की कोशिश की, लेकिन मास्टर बलास्टर ने सबको चित कर दिया.अपने करियर मे सचिन को सिर्फ आस्ट्रेलिया के ग्लैन मैग्राथ की गेंदबाजी खेलने मे परेशानी आयी और ये उन्होने खुद एक बार कहा था.शेन वार्न के तो वो सपने आने लगे थे.
शारजाह मे लगाये वो 2 शतक आज भी हर क्रिकेट प्रेमी के जेहन मे है.
अकेले दम पर सचिन ने भारत को फाईनल मे पहुचाया और फिर फाईनल मे फिर से शतक लगाकर भारत को कप जीता दिया.
सचिन ना सिर्फ बल्लेबाजी मे बल्कि गेंदबाजी और क्षेत्ररक्ष्ण मे उम्मदा प्रदर्शन करते है. आज भी कोई भी बल्लेबाज़ चाहे वो युवा क्यो ना हो सचिन के थ्रो पर अतिरिक्त रन नही लेता है. गेंद्बाजी मे वो स्विंग भी कराते है तो कभी लेग स्पिन और कभी आफ स्पिन भी करवा देते है. कटक मे आस्ट्रेलिया के खिलाफ़ उन्होने 5 विकेट भी लिये थे और मैच को आस्ट्रेलिया की पकड से छिन लिया था.

सचिन एक महान बल्लेबाज है, पूरी दुनिया ऐसा मानती है. कुछ लोग कहते थे के सचिन उम्मदा बल्लेबाज़ है पर महान नही.
लेकिन उन लोगो के शक को “सर डान ब्रैडमेन “
अपनी पत्नी से कहा था “ये लडका तो मेरे जैसा खेलता है”.

सचिन का एक सपना था.भारतीय टीम को विश्व कप जीताना और 2 अप्रैल 2011 को उनका ये सपना भी पूरा हो गया.सचिन की आंखो मे उस दिन खुशी के आसू थे.
सचिन ने बडे ही सादगी भरे अंदाज़ मे एकदिवसीय क्रिकेट से सन्यास लिया है. सबका कहना है के अगर सचिन एक मैच पहले बता देते तो उन्हे मैदान मे सम्मान के साथ विदा करते. परंतु सचिन को ये सब का मोह नही है. वो तो बस क्रिकेट से प्यार करते है और अभी ये प्यार सिर्फ एकदिवसीय क्रिकेट से कम हुआ है. टेस्ट मे सफेद जर्सी मे भारत का ये शेर अभी भी जवान है.


लेखक-चिराग जोशी (खेल संपादक) 


Labels:

अब जाकर होश में आई सरकार


            दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के नौ दिन के बाद अब जाकर सरकारी हाथ पाँव जनता के सामने आयें है और ऐसी परिस्थितियों के बाद प्रधानमन्त्री का एक औपचारिक बयान भी जनता के समक्ष आया, जिसमे उन्होंने इस कुकृत्य की नींद की और साथ ही लोगो से शान्ति बनाये रखने की भी अपील की, उधर गृह मंत्री शिंदे ने दिल्ली के मुख्य न्यायाधीश से मुलाक़ात के बाद कहा की सात दिनों में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगा और तीन जनवरी से रोजाना सुनवाई होगी | वहीँ उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने दिल्ली के दो ए.सी.पी. मोहन डबास और यादराम को निलंबित कर दिया साथ ही डी.सी.पी. प्रेमनाथ और सतबीर कटारिया को नोटिस भी भेजा है |
            दूसरी तरफ सोमवार को कई मेट्रो स्टेशन बंद होने की वजह से यात्रियों को खासा दिक्कतों का सामना करना पड़ा और मेट्रो बंद होने की वजह से सड़को पर भी कई जगह बड़ा जाम देखने को मिला ये स्थिति मंगलवार को भी जारी है और मंगलवार को भी कई मेट्रो स्टेशन बंद रहेंगे |
            इन सब चीजों के चलते देखने वाली बात अब ये होगी की सरकार द्वारा एक साथ उठाये गए ये कदम कितने कारगर होंगे क्यूंकि सिर्फ क़ानून बना देना और ऐसे हादसों के बाद शोक प्रकट कर देने से ही सारी समस्याओ का समाधान नहीं हो सकता, और सभी क़ानून और और बदलाव तभी कारगर सिद्ध होंगे जब इन पर ध्यानपूर्वक अमल होगा | 

Labels:

Monday, 24 December 2012

मेरा शहर



मेरे शहर से जब मै दुर हो गया

मै गाता रहा कोई सुनता न था
मै रोता था तो कोई आसु नही पोछता था
मै चलता था तो भी पैरो  कि आवाज नही आती थी
मेरी बाते यु ही गुजती थी
मेरी तन्हाईयो का कोई सहारा न था
वो शहर था मेरा
जहा मै बोलना सीखा 
लिखना सीखा 
मुसीबतो से गुजरा
पर जो भी था वो मेरा शहर था
उसकी मिट्टी की खुशबु याद आती है 
तो मन मेरा तडपता है
वो सडके जहा मै चलना सीखा 
वहा की गलीयो का सकरापन 
चौराहे की भीड़ 
जिसमे मै अपने आप को ढुढता हूँ 
उस शहर कि तस्वीर बदल गई है
वहा अब वक्त नही मिलता
उस तालाब का किनारा जहा मै सोचा करता था 
आज वो जर्जर है
वो हर जगह जहा मै बैढकर रोया करता था 
वहा अब आसु नही धुआं  बहा करता है.
वो शहर मुझे भुल गया है.
वो शहर था मेरा
वो शहर था मेरा जिसे मै छोड आया हूँ 
मेरा बरसो पुराना रिश्ता उससे तोड आया हूँ 



निरज जाट

Labels:

Sunday, 23 December 2012

ये बर्बाद ऩज़ारे



मजबूर है ज़िन्दगी आम मुफलिसी के अँधियारों में ,

थिरकता है सुकून केवल यहाँ सत्ता के गलियारों में ,

उठता है जब कभी शोर गरीबी के कुचले पैमानों में ,

छिपती है कातिल नीयत कहीं शराफत के मैखानों में ,    

मरती है जनता रोज़ तड़प उम्मीद के झूठे वादों में ,

भटकता है मेरा ये देश हमदर्दी में लिपटे छलावों में ,

जलता है वजूद –ए- हिंद यहाँ अपने ही मकानों में ,

सिसकती है सोने की चिड़िया बर्बाद इन नज़ारों में.......



लेखक-अंकुर सहाय 




Labels:

अक्षय और अर्जुन फिर से अलग भूमिकाओ में

                            हमेशा से अलग तरह के किरदारों को निभाने कि भूंख रखने वाले दो कलाकार “अक्षय कुमार” और “अर्जुन रामपाल” इस समय अपनी अलग तरह कि फिल्मो कि वजह से आज कल काफी चर्चा में हैं, अक्षय कुमार तैयार है अपनी अगली फिल्म “स्पेशल छब्बीस” के साथ तो वहीँ अर्जुन की “इन्कार” भी  तैयार हैं जहां “इन्कार” “चित्रांगदा सिंह” के हॉट सीन्स और पटकथा के सस्पेंस को लेकर आकर्षण का केंद्र बनी है, वहीँ “अक्षय कुमार” और “अनुपम खेर” की “स्पेशल छब्बीस” सत्य घटना पर आधारित पटकथा को लेकर यू-ट्यूब पर इसका ट्रेलर खूब पसंद किया जा रहा है |
               इससे पहले भी दोनों कलाकारों ने कई बार अलग तरह के किरदार निभायें जिनमे उन्हें कभी तो पसंद किया गया मगर कभी सिरे से नकार भी दिया गया है, मगर फिर भी इन दोनों कलाकारों ने अलग तरह के किरदारों को निभाना नहीं छोड़ा और लगातार ऐसे किरदारों को निभाया और सफलता भी पायी है और आज फिर वो एक अलग तरह की भूमिका में दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत हैं |
               फिर एक बार दोनों ही कलाकारों के लिए बड़ी चुनौती सामने है और अब देखने वाली बात ये होगी कि जिस तरह आज के समय में सफलता का आकलन कमाई के ग्राफ को देखकर किया जाता है वहाँ ये फिल्मे बॉक्स-ऑफिस पर कितना पैसा बटोरती हैं और क्या दर्शक इन्हें पसंद करता है या फिर अभी भी दर्शको की सुई मसाला फिल्मो पर ही अटकी हुई है |


लेखक-वैभव सिन्हा

Labels:

मिलेगा इन्साफ या भयावह होगी जिंदगी ?



वो मरती रहेगी ता उम्र 
वो कैसे जिएगी ता उम्र?????????

हर नज़र उसका बलात्कार करेगी,
हर नज़र उसपे वार करेगी,
हर नज़र होगी उसकी कत्लगाह,
हर नज़र उसका शिकार करेगी।
वो कैसे सहेगी ता उम्र।
वो मरती रहेगी ता उम्र।।

हमेशा उसे वो मंजर याद आएगा,
नहीं कभी वो दरिंदा, उसे भुला पायेगा,
वो अपने ही जिस्म से नफरत करेगी पल-पल,
हर दिन उसकी जिंदगी का खार खायेगा।
वो उदास रहेगी ता उम्र।
वो मरती रहेगी ता उम्र।।


जीकर भी वो जिन्दा लाश रहेगी,
निःशब्द, निर्दोष और पाक रहेगी,
वो उलझा हुआ सा एक सवाल रहेगी,
अपनी किस्मत के लिए वो "काश" रहेगी 
वो सिसकती रहेगी ता उम्र।
वो मरती रहेगी ता उम्र।।

वो अपनी जिंदगी उधार मांगेगी,
वो अपना बाइज्ज़त संसार मांगेगी,
चार दिवारी में खुद को समेट लेगी शायद,
हर साँस उसकी खुदा से इन्साफ मांगेगी।
वो कैसे लड़ेगी ता उम्र।
वो मरती रहेगी ता उम्र।।

किस गुनाह का उस पर ये असर हो गया,
वो खुदा कितना बेरहम हो गया,
वो पत्थर ही है शायद, उसे रहम नहीं आया,
वो चुप रहा और, इतना बड़ा कहर हो गया।
वो खुदा की ओर नहीं देखेगी ता उम्र।
वो मरती रहेगी ता उम्र।।

मै आज इश्वर से प्रार्थना नहीं कर सकती कि उसकी जिंदगी संवार दो, क्योकि जो कुछ भी हुआ उसमे शायद उसे उसकी नज़रों में कभी इन्साफ मिल पायेगा। पर देशवाशियों से मेरी गुजारिश है कि ये आन्दोलन जारी रहे। जब तक हर लड़की, हर माँ, हर भाई और हर पिता को इन्साफ न मिल जाए और इश्वर हम और आप में से फिर किसी को ऐसी स्थिति में लाकर न खड़ा कर दे।

Written By- Swati Gupta

Labels:

जनतारूपी ज्वालामुखी से सरकार हैरान क्यों


हाल में दिल्ली में हुए अतिघ्रनित कुकृत्य बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन से अगर सत्ता में बैठे लोगो को आश्चर्य हो रहा है तो वो ये जान ले कि जिन परिस्तिथियों को अपने समक्ष पाकर आज वो इतने परेशान हैं वो उन्ही के द्वारा उत्पन्न कि हुई हैं और आज जो जनतारूपी ज्वालामुखी उनके सामने आ खड़ा हुआ है उसमे लावा तो बहुत समय पहले से फूट रहा था, क्यूंकि ये तूफ़ान उस लंबी ख़ामोशी के बाद आया जहां पर हर शांतिप्रिय इंसान का धैर्य टूट जाता है |
लोगो का सड़क पर उतरकर इस तरह उस प्रताड़ित लड़की का साथ देना इस बात का सुबूत है कि लोगो में गुस्सा बहुत है और सरकार उसे अजमाने के बजाये दोषियों पर कार्यवाही का कोई त्वरित तरीका निकाले तो उसके और समाज दोनों के लिए ही बेहतर रहेगा, साथ ही सरकार के कुछ नुमाइंदो को भी इस बात का पूरा ख्याल रखना होगा कि वो अपनी भाषाशैली में जिम्मेदारी का भी परिचय दें, और वो भी तब जब मुल्क इस तरह कि परिस्थितियों में है जब किसी बलात्कारी को क़ानून का भय न रहा हो, जनता का विश्वास क़ानून और व्यवस्था पर से उठ गया हो, जब लोग भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में सड़क पर आकार इन्साफ मांगने को मजबूर हो जायें |
समझने वाली बात ये नहीं कितने लोग इस समय सड़क पर उतर कर प्रदर्शनकारी बन गए है समझने वाली बात तो ये है कि क्यूँ इतने लोग इस तरह सड़क पर आकार इन्साफ मांग रहें हैं, और इसका जवाब सरकार को आसानी से मिल सकता है अगर वो आँखे खोल कर जनता कि समस्याओं को देखे और उन्हें समझे |
ये जन सैलाब सुबूत है इस बात का कि ना जाने कितने ही कुकृत्य रोजाना इस देश और देश कि राजधानियों पर रोज होते हैं जिनकी खबर पुलिस स्टेशनों तक पहुँच भी नहीं पाती है, क्यूंकि जनता के समक्ष अपराधकर्ताओं को सजा न मिलने के ऐसे उदाहरण सामने प्रस्तुत हैं जो उन्हें इस बात के लिए तैयार कर देते हैं कि अगर वो इस मामले पर इन्साफ कि उम्मीद रखते हैं तो वो ऐसी चीज़ कि कामना कर रहें हैं जो इस व्यवस्था में मुमकिन नहीं है, ये जन सैलाब इस बात का भी सुबूत है कि राजनेताओं के बड़े-बड़े आश्वासनों को सुन-सुन कर जनता थक चुकी है और वो देश में एक ऐसी व्यवस्था चाहती जो उसकी सुरक्षा कि जिम्मेदारी लें सके और इस बात कि पुष्टि कर सके कि वो भविष्य में एक भयमुक्त समाज उन्हें दे सकने में सक्षम है |

लेखक- वैभव सिन्हा 

Labels:

Saturday, 22 December 2012

किस बात का लोकतंत्र !

ये है हमारे देश का लोकतंत्र , राहुल . मनमोहन , सोनिया के पास इतनी फुर्सत नहीं की वो अपने मुह से जवाब दे सके लाठियों से दिया जा रहा है जवाब .
मनमोहन कोशिश करेंगे की आगे ऐसी घटनाये न हो और विशेष सत्र के लिए भी सोचना पड़ेगा .अरे कितना मूर्ख बनाओगे हमारा कह क्यों नहीं देते की तुम नहीं सुधरोगे चाहे कोई मरे या जिए , देश जवाब चाहता है न्याय चाहता है पर हमारी सरकार के पास इतनी फुर्सत कहा , देश के भावी प्रधान मंत्री राहुल महोदय न जाने कहा है , केवल चुनाव प्रचार के दौरान ही वो अपनी शर्ट की बाहें समेटते हुए दिखाई पड़ते है , एफ डी आई जैसे मुद्दे पर तुरंत चर्चा होती है और वोटिंग हो जाती है , पर किसी को न्याय दिलाने के लिए हमारे प्रधान मंत्री को सोचना पड़ता है , जनता की सुरक्षा के लिए पुलिस बल की कमी पड़ जाती है पर राष्ट्रपति भवन के सामने हजारो की तादात में पुलिस बल मौजूद हो जाता है , शिंदे की बात चीत होती है मनमोहन से , सोनिया की बात होती है मनमोहन से , शीला की बातचीत होती है मनमोहन से और बातचीत का परिणाम क्या निकलता है ये तो भगवान् ही जानते है अरे कितनी बातचीत करोगे अब , देश में कोई भी काण्ड होता है बातचीत का दौर शुरू हो जाता है पर परिणाम कुछ नहीं निकलता इनको शायद इस बात का एहसास ही नहीं है की जनता ने इन्हें बातचीत के लिए नहीं चुन है बल्कि इस लिए चुना है ताकि जनता को उनकी बात का जवाब दे सके देश को इन्साफ दे सके , न्याय कर सके . देश की सबसे प्रभावशाली सख्शियतो में से एक और सरकार की सर्वोच्च महिला न्याय की मांग कर रही है अरे देवी जी आप किससे मांग कर रही है सब कुछ तो आपके हाथ में है कभी तो कुछ ऐसा करो की हम अपने आपको गर्व से हिंदुस्तानी कह सके , पूरी दुनिया में देश की धित्कार हो रही है उसके बावजूद भी सरकार पर कोई असर नहीं हो रहा है , ऊपर से इन्साफ मांग रही जनता पर लाठिय  बरसाई जा रही है .

Labels:

Wednesday, 19 December 2012

हॉरर किलिंग सुरक्षा कब



HONOUR KILLING

इस लेख को मैंने कही से देख कर लिखा है इस जगह पर क्यों की ये एक ऐसी घटना है जिसे ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाना जरुरी है, और लोगो को इसके प्रति जागरूक करना फ़र्ज़ भी है हमारा.  

अपने समाज में तमाम विकास के बावजूद अभी भी प्रेम विवाह करना खतरों से खाली नहीं। प्रेम करने वाले जोड़े कई बार दहशत में जीते हैं और कोई उनके साथ नहीं आता। अपना दर्द बयां करते हुए प्रेम विवाह करने वाले यूपी के दंपति ने बताया कि गांववालों ने उन्हें देखते ही जान से मारने की धमकी दी है। नव विवाहित दंपति ने कहा कि गांव वाले लगातार उनकी तलाश कर रहे हैं और उन्हें जान से मारने की कोशिश में हैं। ये यूपी के मेरठ जिले के खरखौदा गांव का रहने वाला दंपति आज सभी से छुपते-छुपाते दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हैं। इनका कसूर बस इतना ही है कि इन्होंने प्रेम विवाह किया है। आए दिन हो रही झूठी शान के लिए होती हत्याओं को देखकर हैरानी होती है कि हमारे देश में ऐसे लोग भी हैं, जिनकी अपनी दुनिया और अपने बनाए नियम कानून हैं। जो लोग उनके फरमानों का पालन नहीं करते उन्हें या तो गांव से निकाल दिया जाता है या मौ त के घाट उतार दिया जाता है। ऐसे ही फरमान के भुक्तभोगी है यह युगल सचिन त्यागी और उनकी पत्नी पूजा त्यागी। ये दोनों 10 जनवरी, 2012 को शादी के पवित्र बंधन में बंध गए। इनके विवाह का पंजीकरण विवाह निबंधक गाजियाबाद के वहां हुआ था।

घरवालों ने की मारपीट जैसे ही पूजा के परिवार वालों को इस बात का पता चला, वे सचिन के घर पहुंच गए। वहां तोड़फोड़ की और सचिन के परिवारवालों को मारपीट कर घर से निकाल दिया। पूजा के परिवार में इस विवाह का विरोध करने वालों में उनके पिता राधेश्याम, भाई व चचेरे भाई हैं। यही नहीं, पूजा के घरवालों ने सचिन की जान लेने की नियत से अवैध हथियारों और बंदूकों से उसके घर पर फायरिंग भी की। सचिन के परिवारवालों ने इसकी शिकायत पुलिस में की लेकिन उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया। छह महीने से सचिन व उसके घरवाले घर से बाहर रह रहे हैं क्योंकि उन्हें गांव न घुसने की धमकी मिली हुई है। इन मामले को प्रशासन बेहतरी से जानता है लेकिन कोई भी कार्रवाई करने से बचता है। प्रेम करने वाली लड़कियों को इज्जत के नाम पर परिवार की प्रताड़ना से हमेशा जूझना पड़ता है। खासकर ग्रामीण इलाकों में परिवार के मर्द सदस्य इसे अपनी बेइज्जती बता कर मार-कूट पर उतारू हो जाते हैं। प्रेमी युगल के खिलाफ पारिवारिक रंजिशें पाल ली जाती हैं और परिवार एकदू सरे के खून के प्यासे हो जाते हैं।

कोर्ट से मांगी सुरक्षा इलाहाबाद हाईकोर्ट में इन्होंने याचिका दायर की थी, जिसमें प्रशासन से सुरक्षा मुहैया कराने की बात कही गई थी लेकिन इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट की ओर से जारी सुरक्षा का आदेश लेकर जब सचिन अपने गांव खरखौदा वापस गया तो वहां पुलिस प्रशासन ने यह कहकर खिल्ली उड़ाई कि आपकी समस्या तभी सुलझ सकती है, जब आपकी हत्या हो जाए। पुलिस वर्दीधारियों के मुंह से यह कहा जाना काफी शर्मनाक है, जबकि अभी प्रदेश के एक अन्य दंपति का ऐसा ही मामला चर्चा में है और सरकार की ओर से उनकी सुरक्षा के कदम उठाये जाने की बात हुई है। सचिन जब वापस पुलिस सुरक्षा पाने


के लिए गांव में पहुंचा तो पूजा के परिवार वालों ने फिर उनके साथ मारपीट की और उनकी फसलों को आग लगा दी। पीड़ित दंपति चाहता है कि पुलिस उन्हें सुरक्षा मुहैया कराए और वे अपने गांव में सकुशल लौटकर चैन से रहें। यह अकेले सचिन और पूजा की कहानी नहीं है, ऐसी कई घटनाएं हैं, जो मीडिया में आ भी नहीं पाती, जिनको मार दिया जाता है या भयभीत करके रखा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि सबकुछ जानते हुए भी सरकार और प्रशासन आखिर कब तक चुपचाप आंख मूंदें झूठी शान के नाम पर होते इस खूनी खेल को देखते रहेंगे। आखिर कब तक गांव की पंचायतें ऐसे नौजवानों की बलि चढ़ाती रहेंगी। यह भी सच है कि यह सिर्फ कानूनी मामला नहीं है, सामाजिक परिवर्तन और विकसित सोच द्वारा भी इस तरह के मामले सुलझ सकते हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि पहल कौन करे।

अजय शुक्ला (रफ़्तार लाइव)

Labels:

नए साल में नए चेक


 
क्लीयरिंग प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए बैंकों में एक जनवरी, 2013 से सीटीएस मानकों वाले चेक ही स्वीकार किए जाएंगे। जाहिर है पुराने चेक चलन से बाहर हो जाएंगे। ऐसे में किसी भी परेशानी से बचने के लिए अपने बैंक से नई चेक बुक प्राप्त कर लें । इसके एवज में बैंक कोई शुल्क नहीं वसूल रहे हैं। नई व्यवस्था लागू होने पर चेक क्लीयर होने में एक-दो दिन से ज्यादा का समय नहीं लगेगा
देशभर में चेक क्लीयरिंग की नई व्यवस्था लागू होने के कारण बैंकों में एक जनवरी, 2013 से पुराने चेक स्वीकार नहीं किए जाएंगे। ऐसे में जिन लोगों के पास पुरानी चेक बुक हैं वह अपनी बैंक शाखा में जाकर चेक ट्रंकेशन सिस्टम (सीटीएस) 2010 मानकों वाली चेक बुक प्राप्त कर लें। भारतीय रिजर्व बैंक इस व्यवस्था को लागू करने के लिए काफी समय से प्रयास कर रहा है। सीटीएस व्यवस्था लागू करने का उद्देश्य चेक क्लीयरिंग प्रक्रिया में तेजी और पारदर्शिता लाना है। अभी तक अधिकांश बैंकों में यदि कोई खाताधारक चेक जमा कराता है तो क्लीयिरिंग के लिए बैंक इस चेक को जारी करने वाले बैंक के क्लीयरिंग हाउस में भेजता था। इस प्रक्रिया को पूरी होने में कई बार एक सप्ताह से ज्यादा का समय लग जाता था। क्लीयरिंग प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए ही नई व्यवस्था लागू की जा रही है।
क्या है सीटीएस व्यवस्था सीटीएस व्यवस्था के तहत चेक को भौतिक रूप में भेजने के बजाय स्कैन करके इसकी इमेज बनाकर संबंधित बैंक के क्लीयरिंग हाउस में भेजी जाएगी। इसके जरिए आपका चेक जमा करने की तिथि में ही क्लीयर हो सकता है। जिन लोगों के पास अभी नई चेक बुक नहीं है, उन्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। फिलहाल 31 दिसम्बर तक सभी बैंक पुराने चेकों को स्वीकार करेंगे। खाताधारकों को जागरूक करने के लिए तमाम बैंक विज्ञापन जारी कर रहे हैं। ग्राहकों को बताया जा रहा है कि वह अपनी शाखा में जाकर नए मानकों वाली चेक बुक प्राप्त कर लें। किसी भी असुविधा से बचने के लिए खाताधारकों को कुछ बुनियादी बातों पर गौर करना जरूरी है।
चेक बुक के मानकों को परखें कई बैंकों ने पहले से ही नए मानकों वाली चेक बुक जारी की व्यवस्था शुरू कर दी है। यदि आपने कुछ दिन पहले ही नई चेक बुक के लिए आवेदन किया है तो संभवत: बैंक ने आपके पास नई मानकों वाली चेक बुक ही भेजी होगी। यदि आपने एक-दो माह पहले ही चेक बुक मंगाई है तो किसी भी असुविधा से बचने के लिए इसके मानकों के बारी जानकारी जरूर हासिल कर लें। इसकी पड़ताल आप स्वयं कर सकते हैं। यदि आपके चेक में धनराशि दर्ज करने वाले बाक्स में बाई ओर रुपए का लोगो ‘Rs’ बना हुआ है तो यह चेक बुक सीटीएस मानकों वाली होनी चाहिए। यदि आपको कोई दुविधा है तो अपने बैंक की शाखा में जाकर असलियत पता कर सकते हैं।
नई चेक बुक मंगाएं यदि यह सुनिश्चित हो गया है कि आपके पास पुरानी चेकबुक है तो जल्द ही नई चेकबुक के लिए आवेदन कर दें। पुरानी चेकबुक बदलने के लिए बैंक दो तरह की प्रक्रिया अपना रहे हैं। पहले विकल्प के तहत बैंक अपने भी खाताधारकों को नई चेकबुक भेजकर पुराने सभी चेकों को नष्ट करने के लिए कह सकते हैं। दूसरे विकल्प के तहत बैंक पुराने चेकों को वापस लेकर नई चेक बुक जारी करें। बहरहाल जो भी हो नई चेक बुक प्राप्त करने में देरी न करें। खास बात यह है कि पुरानी चेक बुक के बदले नई चेक बुक जारी करने के एवज में बैंक कोई शुल्क नहीं वसूल रहे हैं।
चिंता की जरूरत नहीं जिन लोगों ने अभी हाल में अपने टेलीफोन या बिजली का बिल पुराने चेक के जरिए जमा किया है और वे क्लीयर नहीं हुआ तो चिंता करने की जरूरत नहीं है। बैंकिंग कोड्स एंड स्टैंर्डड बोर्ड आफ इंडिया (बीसीएसबीआई) ने सीटीएस की व्यवस्था पूरी तरह से लागू करने के लिए 31 मार्च, 2013 तक का समय दिया है। जाहिर तौर पर जो चेक जमा हो चुके हैं, 31 मार्च तक उनकी क्लीयिरिंग में कोई अड़चन नहीं आएगी। जिन लोगों ने होम लोन या लंबी अवधि के किसी अन्य लोन के लिए चेक दे रखे हैं, ऐसे लोग संबंधित वित्तीय संस्थान में जाकर पुराने चेकों के एवज में नए चेक जमा कर सकते हैं। कुछ बैंक और वित्तीय संस्थानों ने इस बारे में अपने ग्राहकों को सूचनाएं भेजनी शुरू कर दी हैं। खासकर वित्तीय कंपनियों के प्रतिनिधि अपने ग्राहकों से संपर्क कर रहे हैं।
सावधानी बरतें यदि आपने अभी तक अपनी पुरानी चेक बुक जारी नहीं कराई है तो अब किसी को पुराना चेक जारी न करें। यदि आपने सीटीएस के मानकों वाला चेक जारी किया है तो उसमें कटिंग या ओवरराइटिंग कतई न करें। रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को ऐसे चेक कतई स्वीकार न करने का निर्देश जारी किया है। क्लीयरिंग में अब चेक स्कैन करके भेजे जाएंगे इसलिए चेक भरते समय गहरे रंग की स्याही का इस्तेमाल करें। यदि किसी चेक में कटिंग या ओवरराइटिंग हो गई है तो उसे तत्काल नष्ट कर दें।

अजय शुक्ला
रफ़्तार लाइव  

Labels: