Tuesday, 29 October 2013

तेजी से फ़ैल रहा है "मेहेंगा गिरोह"

                                         


पूरी दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरा देश इस समय “प्याज” के आँसू रो रहा है और रोये भी क्यों न, ये कलमूहा प्याज आज-कल ५० के नीचे तो बात ही नहीं करता, जहाँ कहीं भी चले जाओ इसने “हाफ सेंचुरी” तो मार ही रखी है जिस पर तालियां नहीं बल्कि गृहिणियों की गृह व्यवस्था की बैंड बजी पड़ी है |
मगर आँसू निकालने में सिर्फ झार वाला प्याज ही नहीं बल्कि “शांत आलू” और सभी “हरी सब्ज़ियाँ” भी कम नहीं हैं, जो कहीं-न-कहीं अपने “एटिट्यूड” की वजह से प्याज की बराबरी करने में जुटी हुई हैं, कहीं “टमाटर”, “प्याज” से जंग करने की होड़ में “आम आदमी” की “चटनी” बना रहा है तो कहीं “बैगन” और “लहसुन” के “पंगे” में “मैंगो पीपुल” का “भरता” बना जा रहा है |
माना प्याज का तो हर साल का रोना है कि वो “आँधी” से “तूफ़ान” हो जाता है, पर इस बार तो उसने “सीधी-सादी” “घिया(लौकी)” और “भोले भाले” “कददू” को भी अपने “महंगे गिरोह” में शामिल कर लिया | इस मौसम में सिर्फ सीधी-सादी “घिया(लौकी)” और भोला भाला “कददू” ही नहीं हैं जो महंगे गिरोह में शामिल हुए है, सुना तो यहाँ तक जा रहा है कि शलगम,मूली,कुंदरू और कमलगट्टे जैसी सब्जियां भी “महंगे गिरोह” में शामिल होने का मन बना रही हैं |
वही खुद को महंगी सब्जी बताने वाले “पनीर” और “मशरूम” जैसी सब्जियों ने महंगे गिरोह का खंडन करते हुए कहा है कि महंगे गिरोह के सारे “राइट्स” उनके पास हैं | इस पर सभी बाकी सब्जियों कि तरफ से “स्टैंड” लेते हुए “प्याज” ने कहा है कि पनीर और मशरूम को खुद को महंगा कहने का कोई अधिकार नहीं है क्यूंकि उनको महंगा तो मै(प्याज) ही बनाता हूँ |
दूसरी तरफ सरकार द्वारा प्याज के भाव गिराने के प्रयास पर प्याज ने अपना विरोध दर्ज किया और कहा कि नेता मुझे अपनी वोट की राजनीति के लिए इस्तेमाल न करें वरना वो अपनी असली ताकत दिखाकर बड़ा राजनितिक उलटफेर करने पर मजबूर हो सकता है एवं इस बात पर संदेह होने की स्तिथि पर इतिहास भी टटोला जा सकता है |

                                लेखक- वैभव सिन्हा 

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सारी नज़रों से दरकिनार हुआ



सारी नज़रों से दरकिनार हुआ 

मैं गए वक़्त का अखबार हुआ 



एक इशारे से भी निबट जाता 

उनसे शिक़वा तो बेशुमार हुआ 



मैं अदाकार तो अच्छा था मगर 
मुझसे हटके मेरा किरदार हुआ 

रास्तों ने की परवरिश अपनी 
ये सफ़र कितना शानदार हुआ 

जितने रिश्तों को आज़माया था 
सबकी बुनियाद में बाज़ार हुआ 

कोई सरमाया लूट लो मेरा 
मेरा सपनों का कारोबार हुआ 

कोई जंगल तो मेरे अन्दर था 
मैं जो एक घर का तलबगार हुआ 

उनके आने के बाद भी कितना 
उनके आने का इन्तज़ार हुआ


 कवि- ध्रुव गुप्ता (आई.पी. एस )

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Monday, 28 October 2013

कब तक शुतुरमुर्ग बने रहेंगे हम


                                                                 

भले ही कुछ मित्रों को इसे स्वीकार करने में आपत्ति हो, भले ही इसकी संरचना के बारे में आज हमारे पास बहुत सूचनाएं न हों, भले ही इसके नाम पर पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों द्वारा पिछले कुछ सालों में सैकड़ों बेगुनाह मुस्लिम युवाओं को देश के जेलों में भरा और अपमानित किया गया हो, लेकिन यह सच भी है कि पाकिस्तान-समर्थित इंडियन मुजाहिदीन नाम का देशी आतंकी संगठन आज एक हकीकत है, पुलिस की कल्पना की उपज नहीं। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में भी इसकी जड़ें गहरी हो चुकी हैं।
 बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्ती पुर तथा भागलपुर जिलें तो कई वर्षों से इस संगठन के आतंकवादियों की शरण-स्थली बने हुए थे, लेकिन वोट बैंक की गंदी राजनीति के कारण सरकारें इस सम्बंध में प्राप्त सूचनाओं को नज़रअंदाज़ ही नहीं खारिज भी करती रही हैं। नतीजतन बोधगया और पटना के रास्ते बिहार अब आतंक का गढ़ बनने के रास्ते पर तेजी से अग्रसर है। इंडियन मुजाहिदीन का जैसे-जैसे विस्तार होगा, न सिर्फ देश का सांप्रदायिक वातावरण विषाक्त होगा, बल्कि मुसलमानों के हक़ और सम्मान की लड़ाई भी कमजोर पड़ेगी। वक़्त आ गया है कि देश पर मंडरा रहे इस बड़े खतरे से न आंखें चुराई जाय और न इसे मज़हबी चश्मे से देखने की कोशिश की जाय! यह हम सबकी साझा समस्या है और इसका सामना हम सबको मिलकर ही करना होगा |
                                   
                                                        लेखक- ध्रुव गुप्ता 

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Friday, 25 October 2013

ज़िन्दगी क़र्ज़ अगर है तो यूं अदा भी न हो






ज़िन्दगी क़र्ज़ अगर है तो यूं अदा भी न हो 

उम्र भर चलते रहो कोई रास्ता भी न हो 


कितनी मुद्दत से हमने लौटकर नहीं देखा 
किसे पता वो रूठकर कभी गया भी न हो 

जिस एक बात पे दुनिया बदल गई अपनी 
क्या पता आपने हमसे कभी कहा भी न हो

पास इतना भी न आना कि चैन मिल जाए 
आपको छू न सकें इतना फ़ासला भी न हो 

तेरे आने की खबर से भी मुतमइन हैं अभी 
बला से तूने अभी आने का सोचा भी न हो

यह गलत ही सही पर दिल में बात होती है 
जो हम नहीं तो तेरा कोई दूसरा भी न हो !

लेखक- ध्रुव गुप्ता 

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मोदी हैं श्रेष्ठ विकल्प : किरण बेदी


देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए श्रेष्ठ विकल्प बताया।

अहमदाबाद स्थित निरमा यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शामिल होने आई किरण बेदी ने गुजरात और राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि देश के मतदाताओं के पास प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी श्रेष्ठ विकल्प हैं। अब मतदाताओं को तय करना है कि वे किसी स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि केन्द्र में अगली सरकार को केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का अमल करना होगा। उन्होंने कहा कि देश में दो प्रमुख पार्टियां हैं, जिसमें से भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री पद के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का ऎलान कर दिया है, जबकि कांग्रेस के अघोषित उम्मीदवार कौन है वो सभी को पता है। ऎसे में लोकतंत्र (जनता) के पास बेहतर विकल्प है। किरण बेदी ने सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन कोलगेट और २जी जैसे भ्रष्टाचार के मामलों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का श्रेय देश की जनता और मीडिया को दिया।सेमिनार में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल और प्रशासन की सराहना की। साथ ही कहा कि यही मॉडल अब देश को चाहिए ताकि गुजरात की तरह देश भी आगे बढ़ सके, प्रगति कर सके।


महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर बात करते हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी ने कहा की महिलाये और पुरुष दोनों ही समाज के अद्वितीय पहलु है | उन्होंने कहा की मेरे माता पिता ने कभी लड़के या लड़की के बीच भेदभाव नहीं किया. मुझे अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में सबसे अच्छी शिक्षा दी गयी और उन्होंने ही मुझे गतिशीलता भी दी | 

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Thursday, 24 October 2013

पुण्यतिथि / साहिर लुधियानवी : मैं पल दो पल का शायर हूं पल दो पल मेरी जवानी है !


साहिर लुधियानवी को शब्दों और संवेदनाओं का जादूगर कहा जाता है। वे प्रगतिशील चेतना के ऐसे क्रांतिदर्शी शायर थे जिन्होंने जीवन के यथार्थ और कुरूपताओं से बार-बार टकराने के बावजूद शायरी के बुनियादी स्वभाव - कोमलता और नाज़ुकबयानी का दामन नहीं छोड़ा। ग़ज़लों और नज़्मों की भीड़ में भी उन्हें एकदम अलग से पहचाना जा सकता है। अदब के साथ उन्हें हिंदी / उर्दू सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार का दर्ज़ा भी हासिल है। ढेरों कालजयी फिल्मों, जैसे - धर्मपुत्र, मुनीम जी, जाल, पेइंग गेस्ट, धूल का फूल, हम हिंदुस्तानी, प्यासा, सोने की चिड़िया, फिर सुबह होगी, ताजमहल, मुझे जीने दो, हम दोनों, बरसात की रात, नया दौर, दिल ही तो है, वक़्त, बहू बेगम, शगुन, लैला मजनू, गुमराह, काजल, चित्रलेखा, हमराज़, दाग, इज्ज़त, कभी कभी आदि के लिए लिखे उनके गीत कभी भुलाये न जा सकेंगे। पुण्यतिथि पर इस महान शायर को खेराज़-ऐ-अक़ीदत , उनकी फिल्म 'साधना ' की एक कालजयी नज़्म के साथ !

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा दुत्कार दिया 


तुलती है कभी दिनारों में, बिकती है कभी बाजारों में 
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में 
ये वो बेईज्ज़त चीज़ है जो बंट जाती है इज्ज़तदारों में 
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....



मर्दों ने बनाई जो रस्में उनको हक़ का फ़रमान कहा 
औरत के जिन्दा जलने को कुर्बानी और बलिदान कहा 
अस्मत के बदले रोटी दी और उसको भी एहसान कहा 
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....



मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवां औरत के लिए रोना भी ख़ता 
मर्दों के लिए लाखों सेज़ें औरत के लिए बस एक चिता 
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा 
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....



औरत संसार की क़िस्मत है फ़िर भी तक़दीर की हेठी है 
अवतार पयम्बर जनती है फ़िर भी शैतान की बेटी है 
ये वह बदक़िस्मत मां है जो बेटों की सेज़ पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को .....

लेखक- ध्रुव गुप्ता 

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स्पर्श से भी तो देखी जा सकती है दुनिया

                                                                  



"मुक्ति" अर्थात "स्वतंत्रता", न जाने कितने ही मायनों में हम सदैव मुक्ति को देखते व समझते हैं किन्तु क्या कभी हम समाज कि विकलांगता के प्रति एक संकुचित मानसिकता से मुक्ति के लिए सोंच पाते हैं, क्या मात्र स्वयं को परतंत्रता कि बेड़ियों से आज़ाद रखना ही मुक्ति है, क्या विकलांगता व विकलांगता के अंतर्गत नेत्रहीनों को "सूरदास", "नयनसुख" जैसे शब्दों के साथ उनका संबोधन एक संकुचित मानसिकता को नहीं दर्शाता |


हम "मुक्ति- एक नयी सोंच" के माध्यम से समाज को संकुचित मानसिकता से मुक्त कराने का प्रयास करेंगे, ताकि ये समाज अपने ही इन नेत्रहीन भाई-बहनों के प्रति अपनी मानसिकता बदले और इन्हें अपने समानाधिकार दे |

विकलांगता (दृष्टिहीनता ) भारतीय समाज का शायद सबसे बड़ा अभिशाप समझा जाता है विकलांग व्यक्ति पर ईश्वर का रोष, प्रकोप, ग्रहों की दशा खराब होने जैसे न जाने कितने ही आरोप लगाकर कितने ही अंधविश्वासों से जोड़ कर देखा जाता है, विकलांगता को ऐसा अभिशाप माना जाता है जो किसी व्यक्ति के पूर्वजन्म में किये गये दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप उसे इस जन्म में मिला है ।

भारतीय समाज में विकलांग, वृद्ध व बीमार व्यक्ति की सेवा को सबसे बड़ा पुण्य मन जाता है, परन्तु मात्र पुण्य अर्जित करने के लिए, उन्हें ख़ास मानकर या दयापात्र मानकर उनकी सेवा करना अवश्य ही हमारे समाज की संकुचित मानसिकता को दर्शाता है । 
उन्हें विकलांग( दृष्टिहीन) क्यों और किन मायनों में कहा जाता है, क्या वे वास्तव में विकलांग हैं, मात्र देखकर ही नहीं स्पर्श से भी तो दुनिया देखी जा सकती है ।

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Amour (French/2012): Review


Amour (French/2012): The film which will be seeing it's Indian release on 25th of October 2013, a year after it's international release is one of the best romantic films coming from the European Cinema till date. Directed by acclaimed Austrian director Michael Haneke, the film which won the Best Foreign Language Film at the 85 Academy Awards and the Palme D Or at the 2012 Cannes Film Festival, has a narrative whose structure follows an aged couple where the lady suffers from Paralysis and how her husband helps her till a tragic ending with their abroad staying daughter suffering the pains (based on an event happened in the director's family). The best thing about the film lies in the cinematography by Darius Khondji and the screenplay by the director himself where the still framing in most of the scenes in the film employs conversations and moments that make the film progress well, making it gripping. The editing by Monika Willi is smooth and she also employs some motif based shots well that actually make them a vital part in the film's narrative. The music score has been rarely, yet well placed in the film. A word about the performances: Excellent. Emmanuel Riva as the paralysed old woman is simply mindblowing and Jean Louis Trintignant as the husband is great and their chemistry is superb in the film. Isabelle Huppert, Alexandre Tharaud and rest are brilliant. Overall, this film is a must watch for film lovers, enthusiasts and students and moreover the die hard romantics as well! 

My rating would be 4.5/ 5.

By Yash Mishra

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Sunday, 20 October 2013

यादों की किताब से बचपन की शैतानियों तक


कभी रूठता, कभी मनाता
लड़-झगड़ कर, दुश्मन को भी प्यार करता
हर खता को माफ़ कर देता है ये बचपन....

झूठ की परछाइयों से दूर भागता
सच को गले लगाता
भोलेपन की मिसाल है ये बचपन....

मिट्टी के खिलौने बनाता
पोषम पा भई पोषम करता
खुद से ही छुपन-छुपाई खेलता है ये बचपन....

न भूल पाने वाली यादों के साथ
कभी न लौट आने का वादे करके
रूठ के चला गया वो बचपन.....

यादों की किताब बनकर
ज़िन्दगी के सफ़र में कहीं पीछे छूट चुका
सचमुच बहुत अदभुत था वो बचपन.....

........सुप्रिया श्रीवास्तव...........

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Saturday, 19 October 2013

मिसाइलों और बम बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शिक्षा

                                                                           

पिछले दो-तीन दशकों में भारत एक शक्तिशाली देश के रूप में विश्व के समक्ष उभरा है और अपनी पहचान एक ऐसे राष्ट्र के रूप में कायम की है जो किसी भी देश से तकनीक और हथियारों के मामले में कमजोर नहीं है, साल-दर-साल भारत ने नयी तकनीक और नए हथियारों के जरिये विश्व को अपनी ताकत का एहसास कराया और भारत आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत छवि वाला देश नजर आता है । ये भारत का एक ऐसा चेहरा है जिसे देखकर हम गौरवान्वित महसूस कर सकते हैं, पर दूसरी तरफ भारत आज भी एक ऐसी समस्या से जूझ रहा है जिसके चलते कोई भी देश महान की श्रेणी में नहीं आ सकता,  भारत आज भी शिक्षा के दृष्टिकोण से काफी पिछड़ा हुआ देश है, जहां देश को नयी तकनीक और प्रगति देने वालो की कोई कमी नहीं है वही ऐसे लोगो की भी भरमार है जो शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से कोसों दूर हैं । 

 पिछले एक दशक में भारत ने अपनी प्राथमिक शिक्षा को पुख्ता करने के लिए काफी कुछ किया है। बच्चों का स्कूल तक पहुंचना आसान हुआ है और स्कूल में दाखिलों और हाजिरी में भी सुधार हुआ है, लेकिन इनके आंकड़ों के पीछे का एक सच यह भी है कि हमारा सारा ध्यान दाखिले पर रहा है लेकिन इसी के साथ शिक्षा की गुणवत्ता में काफी तेजी से गिरावट आई है, भारत में विकास को गाँवों से जोड़कर देखा जाता है पर शिक्षा के मामले में गाँवों की दशा निंदनीय है |  भारत के ग्रामीण स्कूलों में हुए कुछ सर्वेक्षणों से पता चलता है कि स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बहुत खराब है, इसमें और भी गिरावट आती जा रही है। पांचवीं कक्षा के 53.2 फीसद बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ भी नहीं पढ़ सकते हैं, दो साल पहले इन बच्चों का प्रतिशत 46.3 था, यानी हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ रहे हैं। इसी तरह दो साल पहले पांचवीं कक्षा के 29.1 फीसद बच्चे संख्याएं घटाने का वह साधारण सवाल हल नहीं कर पा रहे थे जो उन्हें दूसरी कक्षा में कर लेना चाहिए। अब यह प्रतिशत काफी बढ़ कर 46.5 हो गया है। दुखद यह है कि करीब बीस फीसद बच्चे तो दहाई की संख्या को भी नहीं पहचान पा रहे हैं।

 दूसरी तरफ सरकार को जहाँ देशभर में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में आए आम बजट में शिक्षा बजट को बढ़ाना थाउसके विपरीत बजट में कटौती कर इसे महज 65,867 करोड़ ही आवंटित किए गये। ऐसी स्थिति में देश की साक्षरता दर बढ़ाने के लिए चलाये जाने वाले कार्यक्रमों को भी उचित धन नहीं मिल पाया क्योंकि सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को महज 27 करोड़ का ही आवंटन हुआ जबकि इसे अधिक धन की दरकरार थी।अच्छी शिक्षा देश की प्रगतिमजबूतीविकास और लोकतंत्र की सफलता के लिए एक अनिवार्य शर्त है। बम,मिसाइलोंपरमाणु बिजलीघरों और मंगल ग्रह पर यान भेजने से ज्यादा जरूरी है बच्चों की सामान्य शिक्षा, वरना आने वाले समय में समाज ऐसे दो वर्गों में बटा हुआ पाया जाएगा जिसमे एक तरफ होगा एक ऐसा समाज जो सक्षमता का पर्यायवाची हो सकता है, पर दूसरी तरफ एक ऐसा आवश्यक समाज होगा जिसकी हमें बेहद आवश्यकता तो होगी मगर वो इस लायक नहीं होगा की राष्ट्र की प्रगति में भागीदारी कर सके ।

                                लेखक- वैभव सिन्हा 

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Rajula (Hindi/Kumaouni/Garhwali)


The film which won the Audience Choice Award at the DIFF 2012, is actually a Discovery Channel exploration of a twisty Love Story which goes hand in hand with the male protagonist's story of today, on the backdrop of beautiful locales. The film scores with it's original screenplay (director Nitin Tiwari) which has shades of films like Hindi film "Rang De Basanti"  for showing parallel narration and the recent Malayalam hit "Neelakasham Pachakadal Chuvanna Bhoomi" for the film having a tour in search of love and a story, then the cinematography work by Eugene DSouza which captures the locales and beauty of Uttarakhand brilliantly, the production design work (Various) and then the BGM Score by Sudeep and Milind. The male protagonist played by Karan Sharma is brilliant and some of the supporting cast is good too. But the flaws lie in few things such as few scenes in the film were overstretched, then and the romantic track too was quite stretched, the sound design and dubbing and even few performances too lacked the brilliance that could have enhanced the beauty. But the film scores with it's narration, visuals and the twisty climax and successfully brings out the best of the God's Own Heaven. A good Weekend fare. 
My rating would be 3. 5/ 5

By Yash Mishra

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Friday, 18 October 2013

Shahid (Hindi) : Review By Yash Mishra



Shahid (Hindi): This film is a winner all the way, being one of the brilliant contemporary Indian films till date. Based on the life accounts of one of the most controversial figures of our times, the slain lawyer Shahid Azmi who got 17 cases successful in 7 years of his career, the film also highlights the Indian judiciary system and the venom of terrorism in broader light by director Hansal Mehta (also directed "Dil Pe Mat Le Yaar!"/2000) whose narration is gritty, no nonsense and moreover without any melodrama which will make you sympathize and criticize few moments in the film. The film scores with it's screenplay (Sameer Gautam Singh, Apurva Asrani and Hansal Mehta) whose development and portrayal has shades of films like "Lawrence Of Arabia", "Bombay", "Mammo", "Black Friday" and "Aamir". and even in the dialogue part, few of the lines here are much better than that of what we hear the punchlines in the so called Masala entertainers. The film has a great cinematography by Anuj Dhawan which captures the depth of the life and surroundings of the protagonist brilliantly and the editing by Apurva Asrani which is a reminiscent of his brilliance in the 1998 cult "Satya" where he has done an award winning job in making the film slick, sharp and smooth. In performances, Tigmanshu Dhulia, Kay Kay Menon, Vipin Sharma, Akash Sinha, Prabhleen Sandhu and Baljinder Kaur are true to their roles and hatsoff to the casting genius Mukesh Chhabra for picking up such a great starcast which make the frame go alive with their brilliance. Mohammad Zeeshan Ayyub is great in the film as he returns with his "Raanjhanaa" charms and last but not the least is Raj Kumar: Take A Bow as he walks away with all the applauds with such a brilliant portrayal of the slain lawyer with sheer excellence. Overall, this film is NOT TO BE MISSED. Please go and watch this film and get a good cinematic orgasm. 

Rating 4.5/ 5

Review By Yash Mishra

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Thursday, 17 October 2013

शिक्षा


शिक्षा हा वही है
जिससे व्यक्ति
अपनी पहचान बनाता है
और अपने लक्ष्य तक
पहुचता है !
हा वही शिक्षा
जो जीवन का
एक मूल आधार है

बिना शिक्षा जीवन
मानो ऐसा है जैसे
बिना जल के सागर
अच्छाई और बुराई
बुराई की नीव है शिक्षा ,
व्यक्ति के व्यवहार
का वर्णन कराती है
मुश्किल भरे रास्तो
का हल बताती है
हा हा वही शिक्षा जो
बचपन से ही बच्चो के सामने
मंजिल पाने का रास्ता
बन खड़ी हो जाती
उसका जीवन सफल
बनाने में उसकी सहायता करती है 
और कहती है परिश्रम करो
फल की चिंता मत करो

__VK__


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Friday, 11 October 2013

War Chhod Na Yaar: Review


War Chhod Na Yaar : This one's got be one of the brilliant Indian satirical films till date, coming under films like "Jaane Bhi Do Yaaron" and "Khosla Ka Ghosla" where writer and director Faraz Haider  brilliantly handles the serious issue of Indo Pak relations and the political and media game in it on celluloid in his debut, with the shades of patriotism and the need for peace. The only flaw felt were the song(s) which wasn't much required in the film. The director scores well with his original screenplay, with no nonsense involved which has the best moments which will actually make you laugh to the hilt and also make you think about the peace relations and adding to it are the dialogues by Deepak Kingrani which add humor in every frame and the cinematography by Sejal Shah who brilliantly captures the mood of the front and the dark side beneath. Now coming to the performances, Dalip Tahil showcases the best of his versatility and he scores well in his brilliant comic timing. Sanjay Mishra and Vivek Rana are brilliant too and the lead Shraman Joshi, Soha Ali Khan and especially Javed Jaffery are simply riveting and their chemistry on screen is worth watching in the film. It was also fun watching my college people and even my own college on screen. Plus, a note for the offence takers regarding the depiction of the war and such things in the film: please dont use your brains in taking the offence and just treat yourself with this film. Yeh Film Dekh Na Yaar! 

My Rating would be 4/ 5

Review By - Yash Mishra

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Sunday, 6 October 2013

शाम....


ज़िन्दगी में रिश्तों को उलझते हुए देखा है मैंने
हर मोड़ पर बिना बात के झगड़ते हुए देखा है मैंने
एक लम्हें में जिया है सदियों का सफ़र 
चंचल मन को हर पल उदास होते देखा है मैंने
प्रेम की एक पाती में प्यार को सिमटते हुए
आँखों से छलकते आसुंओं में
रिश्तों को डूबते हुए देखा है मैंने 

उम्र बीत जाती है सच्चे प्यार के इंतज़ार में
किसी को किसी के प्यार में टूट कर बिखरते हुए देखा है मैंने
यूँ तो हर जाम यादों के पिया करते थे
प्यार को कई बार सिसकते हुए देखा है मैंने
एक वो शाम थी जब आंसुओं से दोस्ती हुआ करती थी
एक ये शाम है जब आंसुओं से भी नाता टूटते देखा है मैंने

_____सुप्रिया श्रीवास्तव____ 

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Thursday, 3 October 2013

अनगढ़ पत्थर



सदियों से हमें यह सिखाया गया है कि 


पत्थर छेनी और हथौड़ी से तराशे जाते हैं

और हम देते चले आये हैं 

पाषाण खण्डों को विभिन्न आकार



छेनी की धार और हथौड़ी की मार को 

पत्थर पहचानते हैं और 


जो तराशे जाने को नियति मानते हैं 

पूज्यनीय या शोभनीय हो जाते हैं 



विशाल पर्वतों और दुर्गम पठारों में 

आज भी हैं विलक्षण शिलाखण्ड 

जो तराशे नहीं गए

इसलिए पूजे या सजाये भी नहीं गए



पहाड़ों के स्वाभाविक सौन्दर्य का हिस्सा बनकर

वे चेतना के अंकुरण की बाट जोह रहे हैं 


जब भी कभी जीवन संगीत  

इन पहाड़ों पर बजेगा

सबसे पहले उठ खड़े होंगे 

ये अनगढ़ पत्थर

आकार से मुक्त और चेतन 



कवि - सुशील कुमार

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Wednesday, 2 October 2013

Besharam Review


Besharam (Hindi): Indeed a much better film than the director's previous venture "Dabangg", the film was exactly the way what I said while sharing it's theatrical trailer few months back: a touch of surrealism, but promising. After the 2010 Grosser "Dabangg", director Abhinav Singh Kashyap returns with a Bang with the film which is light, warm and well loaded with beautiful moments, which might has the story structure like "Dabangg", but the film's narration (Kashyap and Rajeev Barnwal) is original and entertaining, despite few loopholes in between. The film has great dialogues and the moments which will make you smile and even cry (at few moments) with it's every frame. Wasiq Khan continues his brilliance of his great production designing work. The cinematography by Madhu Vannier is good and he captures the Delhi and Chandigarh locales well. The music score by Lalit Pandit might not be as great as his previous venture, but he manages well to make the volume pump up. The BGM is great. Now performances wise, the newbie Pallavi Sharda shows a great promise and has a long way to go. Himani Shivpuri, Javed Jafferi and Amitosh Nagpal do justice to their respective roles. The chemistry between Rishi Kapoor and Neetu Singh Kapoor is brilliant and no words to describe their riveting performance. Ranbeer Kapoor succeeds in his experimentation of doing a Mass Entertainer with his show stealing performance and he walks away with a standing ovation by his moments which will maintain a smile on your face, which has the shades of films like "Rockstar" and "Barfi". Overall, a good "Mass" Entertainer and a perfect weekend venture. My rating would be: 3.5/5.

Review By - Yash Mishra 


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