अतिक्रमण हटाने के नाम पर छिनती है जिन्दगी
हम भले ही कुछ भी सोंचे जनाब, पर इसी में बसी है लाखों लोगो की जिन्दगी । इसी तरह के काम से पलते हैं सबके पेट । सड़क के किनारे वो टूटी हुई झोपडी ही छुपाती है इनकी इज्जत, वही देती है इन गरीबों को सहारा । इनमे बसने वाले छोटे छोटे मजदूर बड़ी बड़ी इमारते खड़ी करने का काम करते हैं । हम जैसे आम लोगों को इनसे कोई शिकायत नहीं । कम से कम वो चोरी तो नहीं करते बसर तो कर रहें हैं अपनी जिन्दगी इमानदारी से । पर पता नहीं नगरमहापालिका को अपने आलिशान घर में रहते हुए इन बेचारे लोगों से क्या तकलीफ हो गई । शुरू कर दिया उसने अतिक्रमण हटाओ अभियान ।
हाय ! उजाड़ दिए उसने कितनो के आशियाने ख़तम कर दी न जाने कितनों कि रोटी के ठिकाने । उस दिन जब मैं सड़क पर निकली तो सड़क कुछ चौड़ी लगी । किनारे ठेले जो नहीं थे वो टूटी फूटी झोपड़ियाँ भी नहीं थी । कीचड वहीँ था, गढ्ढे वहीँ थे वो बदबूदार कीचड़ भी जस का तस पड़ा था । बस मन में सवालों की आंधी शुरू हो गई कि क्या आज उन लोगों के घर का चूल्हा जला होगा ? आज रात कहाँ बसर की होगी उन्होंने ? कहीं किसी माँ के आंचल में कोई बेटा भूखा तो नहीं सो गया न? उन बड़े अफसरों को कचरे, कूड़े, गढ्ढे जैसी समाज की गंदगी क्यों नहीं दिखी? क्यों सिर्फ गरीबों की जिन्दगी नजर आई? इन तमाम सवालों के बीच उसी छण खुद ने खुदी को एक तंज भरा जवाब भी पेश कर दिया । ये कोई अतिक्रमण हटाओ अभियान नहीं है, ये है गरीबी हटाओ अभियान । न रहेंगे गरीब और न रहेगी गरीबी । और सीना तानकर सरकार आम जनता के आगे आकड़े पेश करते हुए कहेगी " देखो गिरा दिया न गरीबी का प्रतिशत ।
जय हिंद जय भारत ।
स्वाती गुप्ता
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