गरिमा
स्याह किन्हीं अंधेरों में बेआबरू हुयी आज भारत की आन ,
सभ्यता की इस नगरी में फिरते भेड़िये पहन इंसानी खाल ,
एक बेटी का आहत दामन चीख कर पूछे हम से ये सवाल ,
माँ भारती की रूह से कब मिटेंगे ये हैवानियत के निशान ,
गंगा की निर्मल धारा भी दहक उठी धुल ये पापों की आग ,
मर्यादाओं की इस भूमि में आखिर क्यूँ बिखरते हैं संस्कार ,
पूजता है एक तरफ तो देवीयों की हस्ति को पुरूष संसार ,
दूजी ओर फ़िर पलट करता है क्यूँ उस देवी पर ही आघात ,
विकृत उस कृत्य के कारण डोल गया विश्वास का आधार ,
चोटिल रोती नारी गरिमा देख खड़ी मानवता यहाँ शर्मसार........
लेखक-अंकुर सहाय
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