Wednesday, 31 July 2013

बॉलीवुड दिखा रहा है “दाउद” की नायकत्व छवि ?

               
भारत को जिन अन्तराष्ट्रीय अपराधियों की तलाश है उनमे से शीर्ष पर “दाउद” का भी नाम है पर कुछ सालों से हिंदी सिनेमा इस अपराधी की एक नायकत्व छवि दर्शको के सामने प्रस्तुत कर रहा है | शुरुवात हुई साल 2004 में आई फिल्म “ब्लैक फ्राइडे” के साथ, मगर इस फिल्म में दाउद की छवि को नायक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, लेकिन वहाँ से कई निर्देशकों और लेखकों को एक सिनेमाई मसाला मिल गया जिसे बाद में वो अपने अनुरूप प्रस्तुत करते रहे | साल 2010 में आई फिल्म “वन्स अपान अ टाइम इन मुंबई” में दाउद के नायकत्व किरदार का जन्म हुआ, और जिसका अगला भाग “वन्स अपान अ टाइम इन मुंबई दोबारा” भी दर्शकों के सामने आने वाला है | इसी साल 2013 जुलाई महीने में फिल्म “डी-डे” में एक बार फिर दाउद के किरदार को पुरे शान और रुतबे के साथ पर्दे पर लाया गया |

दाउद हिन्दुस्तान के शीर्ष अन्तराष्ट्रीय अपराधियों में से एक है, ये वाजिब है कि उसके द्वारा किये गए कुकृत्यों को दुनिया के सामने सिनेमा के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए पर यह बिल्कुल भी वाजिब नहीं है कि एक अपराधी को दर्शकों के सामने नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाए | हमेशा ही युवा वर्ग सिनेमा से ज्यादा नजदीक रहता है और वो आकर्षक रूप से प्रस्तुत किये गए दाउद के किरदार से प्रभावित हो सकते हैं और भटक सकते हैं |

हिन्दी सिनेमा से जुड़े हर शख्स को इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा कि वो कहीं मनोरंजन की आड़ में समाज को ऐसा कुछ न डे बैठे जिसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़े और हिंदी सिनेमा अपने मूल सिधान्तो मनोरंजन और समाज को जागृत करने से विमुख हो जाए |



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Tuesday, 30 July 2013

तेरी खामोश निगाहें कुछ कहना चाहती हें


 तेरी खामोश निगाहें कुछ कहना चाहती हें,
शायद ! मुझ को,अपनी आगोश में लेना चाहती हें|

बीते लम्हों की याद को, फिर से जगाना चाहती हें ,
एक चिंगारी को फिर से ,भड़काना चाहती हें|

भूल चुका था जिस हंसी को,आज वो तेरे शुर्ख लबों पे हें ,
उन लबों को आज फिर से ,चूमना चाहता हूँ में|

एक प्यारी सी कली जो , गुलिस्ताँ में खिल रही  हें,
उस कली को तोड़ कर ,जुल्फों में लगाना चाहता हूँ |

एक  तेरी  तश्वीर  को ,  अपने  सीने  से लगा कर ,
फिर से मजनूं को इस,दुनिया में बुलाना चाहता हूँ.|

भूल चुका था जिनकी यादें  ,आज उन की यादों को,
अपने दिल में बसा कर ,फिर से याद करना चाहता हूँ में |

कवि- संजय कुमार गिरि 

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“मिड डे मील” उत्तमता से मीलों दूर

"बिहार" के जहरीले "मिड डे मील" प्रकरण में 23 मासूम बच्चों की मौत ने सभी को झकझोर दिया और इसके साथ ही फिर से मिड डे मील सवालों के घेरे में आ चूका | वैसे तो मिड डे मील में  खामियों की खबर समय-समय पर सामने आती रही है पर बिहार में 23 बच्चों की मौत के बाद यह योजना कई तरह से निन्दात्मक हो गयी है |
 मिड डे मील योजना इस दृष्टिकोण के साथ आरम्भ हुई थी की गरीब बच्चों को भोजन के माध्यम से स्कूलों तक लाया जाये, जो एक हद तक कामयाब भी हुई पर इस योजना के समय-समय पर बच्चों के लिए प्राणघातक होने पर ये सवालों के घेरे में भी आती रही | साथ ही इस योजना में समय के साथ परिवर्तन की भी आवश्यकता थी जो अब तक नदारद है, बच्चे अगर सिर्फ खाना खाने की कामना लेकर स्कूल आयेंगे तो शिक्षा कौन ग्रहण करेगा, ब्लैक बोर्ड पर अगर विषयक ज्ञान के साथ दिन के खाने का मेनू लिखा होगा तो बच्चों का ध्यान भटकना स्वाभाविक है |
  बिहार में जहरीले मिड डे मील प्ररण के बाद कुछ बुद्धिजीवियों ने पैक्ड खाने की पैरवी शुरू कर दी है, पर पैक्ड खाना स्कूलों में सही समय पर बट जाएगा इस बात को कौन सुनिश्चित करेगा, क्यूंकि पैक्ड खाने की एक सीमित अवधि होती है जिसके रहते उसे खाना आवश्यक होता है | जब लापरवाही के चलते बच्चों की थाली में जहरीला भोजन पहुँच सकता है तो पैक्ड खाना बिना लापरवाही के उचित समय पर बच्चों तक पहुँच जाएगा इसकी क्या गारेन्टी है, साथ ही पैक्ड खाने में पोषकता की कमी तो जगजाहिर है ही |

 इन सब बातों से ये साफ़ है कि मिड डे मील योजना में कई बदलावों की आवश्यकता है और साथ ही जरुरत है इस योजना पर सरकार की गहन नज़र रहे ताकि यह योजना बिना किसी लापरवाही और सम्पूर्णता से चले | 

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Monday, 29 July 2013

बदन पर सिंकतीं रोटियाँ



गरम-गरम रोटियों के लिए
तुम्हारे भी पेट में
आग धधकती होगी
कितना अच्छा लगता है
जब माँ या पत्नी तुम्हारे लिए 
सेकतीं है गरमा-गरम रोटियाँ
लेकिन 
एक गली है इस शहर में
जहाँ रोटियाँ तवे की मुहताज नहीं हैं
बल्कि बदन पर सेंकीं जाती है

यहाँ बदन को तपाकर  
इतनी गर्मी पैदा कर ली जाती है कि
उस पर रोटियाँ सेंकी जा सके

तुम जान भी नहीं पाते हो
कि  तुम्हारी सहानुभूति के छींटे
कब छनछनाकर उड़ जाते हैं
इस लहकते शरीर से

यहाँ शरीर की रगड़न से पैदा हुई
चिंगारियों को अंगीठी में सहेज कर
क्रूर सर्द रातों को गुनगुना बनाया जाता है  

इस गली तक चल कर आते हैं
शहर भर के घरों से रास्ते
और शायद यहीं पर खत्म हो जाते हैं
क्यूंकि इस गली से कोई रास्ता
किसी घर तक नहीं जाता

तुम बात करना अगर मुनासिब समझो
तो जरा बताओ कि क्या तुमनें कभी
बदन पर सिंकतीं हुई रोटियों को देखा है यहाँ
शायद नहीं देखा होगा
क्यूंकि यहाँ से निकलते ही
जब तुम अपनी पीठ
इस गली की तरफ करते हो
नजरें चुराने में माहिर तुम्हारी आँखें

सिर्फ अपने घर के दरवाजे पर टिकी होती है | 

कवी - सुशील कुमार 

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Sunday, 28 July 2013

जरुरी है युवाओं के लिए सेक्स एजुकेशन

युवावस्था जीवन का एक ऐसा चरण होता है जब हर किसी का मन चंचल और जिज्ञासू रहता है और सेक्स और उससे जुडी चीज़ें हमेशा से ही युवाओं के लिए एक जिज्ञासू विषय रही हैं, मगर न ही इसे युवाओं के समक्ष कभी शैक्षिक तरीके से प्रस्तुत किया गया और न ही इसकी बातों को कभी खुलकर ही युवाओं के समक्ष प्रस्तुत रखा गया, जिसके कारण युवाओं की जिज्ञासा कभी-कभी कुंठा में भी परिवर्तित होती दिखायी देती है |
   हमारा समाज आज तेज़ी बदलाव और तरक्की की ओर बढ़ रहा है, पर आज भी हमारा समाज कई ऐसे विषय हैं जिन पर बात करना हमारे समाज में अशोभनीय और अनुचित मन जाता है या फिर जिन पर बात करने से हम सब कतराते हैं उनमे से एक विषय सेक्स भी है | यह एक ऐसा विषय है जिस पर बात करने से तो हम बचा करते हैं मगर इससे युवाओं में इसकी जिज्ञासा आगे चलकर कभी-कभी एक भयंकर रूप भी ले लेती है जो समाज में किसी प्रकार के अपराध का कारण भी बन सकती है | जब युवाओं के समक्ष इस तरह की बातें सकारात्मक रूप से प्रस्तुत नहीं होती हैं तो वे अपने मन में अपनी एक अलग विचारधारा बना लेते है जिसके अनुरूप वो ढलने लगते है और गलत कदम उठा बैठते हैं |

  हमारे समाज में सेक्स के प्रति जागरूकता की बेहद आवश्यकता है क्यूंकि जब किसी समस्या का निदान सही तरीके से करना हो तो उस समस्या को जड़ से उखाड़ना पड़ता है और आज का भटका हुआ युवा ही आगे चल कर अपराधी भी बन सकता है इसलिए आज हमारे समाज में इस संवेदनशील विषय पर खुली चर्चा करने की बेहद आवश्यकता है | इस विषय पर सामने आकर घर के बड़ो को अपने बच्चों से बात करनी होगी और उससे भी महत्वपूर्ण इस विषय को सकारात्मक रूप से अपने बच्चों के समक्ष रखना होगा | अगर इस बेहद संजीदा विषय को चर्चा का विषय न बनाया गया तो आगे चलकर ये यथा स्तिथियों से भयंकर परिणामो के साथ सामने आ सकता है | यह विषय संवेदनशील तो है पर जिस तरह से समाज में इसका प्रस्तुतीकरण किया जाता है वो एक गलत विचारधारा को जन्म देता है जोकि घातक हो सकता है इसलिए आवश्यकता है की आगे बढ़कर इस विषय को सही तरीके से प्रस्तुत किया जाए |

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गुंजाइशों का दूसरा नाम


लो वह दिन भी आ गया
जब हमारा खून गर्म तो होता है
लेकिन
उबलता नहीं है

सूख कर कड़कड़ाई हुई साखों में 
रगड़ तो होती है मगर
अब वो चिंगारी नहीं निकलती
जिससे धू-धू कर
जंगल में आग लग जाती थी

आयरन की कमीं वाले हमलोगों नें
अपने खून में लोहे की तलाश भी छोड़ दी है
जिससे बनाए जाते थे खंजर

यह
उबाल रहित खून
आग रहित जंगल और
खंजर रहित विद्रोह का नया दौर है

फिर भी मजे की बात तो यह है कि
यहाँ समाजवाद
अजय भवन के मनहूस सन्नाटे में
आगंतुकों की बाट जोहती
कामरेड अजय घोष की मूर्ति नहीं

बल्कि
छांट कर रखी गयीं
पुस्तकालय की किताबों के चंद मुड़े हुए पन्नों में
बची गुंजाइशों का दूसरा नाम है.

कवी - सुशील कुमार 

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Friday, 26 July 2013

तकिये पर रखते ही हो जायेगा मोबाइल चार्ज |

अब मोबाइल चार्ज करना होगा और भी आसान नहीं लगाना पड़ेगा प्लग

अक्सर दिनभर काम में लेने के बाद मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाती है। तब आप फोन को चार्ज करते हो। लेकिन अब चार्ज करना और भी आसान हो गया है।

नोकिया एक ऎसा तकिया बना रहा है जिस पर फोन रखते ही वह चार्ज होने लगेगा। यानी अब आपको अपने फोन को एक पॉवर की झपकी देनी प़डेगी। इस तकिए पर फोन रखते ही आपको मोबाइल को प्लग करने की आवश्यकता नहीं होगी। तकिए पर आराम करते ही आपका फोन चार्ज होने लगेगा। 

190 एमएम लंबाई और 140 एमएम चौ़डाई वाले इस तकिए की थिकनेस 30 एमएम है। इसका वजन 112 ग्राम है। इसमें वायरलेस कनेक्टिविटी चार्जर है। 2.5 एमएम का चाजिंüग कनेक्टर इसमें लगा हुआ है।

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Thursday, 25 July 2013

बुरका


जब खुदा मेरी देह बना रहा था
उसी समय उसने
तुम्हारी आँखों पर
बनाया था हया का पर्दा

तुमनें मन की कालिमा से
एक लिबास बनाया
और
हमने पहन लिया  
तुम्हारी कालिख छिपाने के लिए

तुम हमेशा मुझे पर्दे के मायने समझाते हो
और मैं हाँ-हाँ में सिर हिलाती हूँ
मन करता है
तुम्हारी बातों की मुखालफत करूँ

मैं जानती हूँ कि
बेहयाई मेरे बदन में नहीं है
जो ढँक लूँ किसी लिबास से
बल्कि
वो तैर रही है तुम्हारी आँखों में
बागी, बेख़ौफ़ लड़ती हुई हर पल 
हया के पर्दे से

कवी - सुशील कुमार 

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Tuesday, 23 July 2013

हे माँ तेरे चरणों में |



जब तक जां में जां रहेगी 
भारत माता तेरी आन रहेगी 
मर जाऊं चाहे मिट जाऊं 
नाम वतन का कर जाऊँगा 
हे माँ तेरे चरणों में
मैं कसम ये खाता हूँ
दुश्मन की गोली का 
हर जख्म खा लेंगे 
पर तेरे माथे पर 
न कलंक कोई होगा
अपना -अपना कर्म 
बस शरहद ही होगा

कवी - संजय कुमार गिरी

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Monday, 22 July 2013

चेतावनी दे रहा हिमालये


चेतावनी दे रहा हिमालये 
अब भी संभल जाओ इन्सान .
कुदरत की हसीन वादियों को 
अब न कोई पहुँचाओ नुक्सान .
अंम्बर से गिरता पानी 
नदियों तक ही रहने दो .
मत मोड़ो इनके रुख को 
अपने तक ही रहने दो. 
बहुत हो चुकी मनमानी 
अब कर लो कुछ भलमानी.
अब न किसी का घर उजड़े
न रुके किसी का दाना पानी .

कवी - संजय गिरी 

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Monday, 15 July 2013

लोकसभा चुनाव से पहले चला सुप्रीम कोर्ट का डंडा |


लोकसभा चुनावो की चिंता क्या कम थी जो सुप्रीम कोर्ट ने एक और तनाव बढ़ा दिया, कुछ ऐसा ही चल रहा है आज कल हमारे राजनीतिक दलों के दिमाग में, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार सजा पाए हुए विधायक और सांसदों की सदस्यता तो रद्द होगी ही साथ ही साथ वो ना हीं चुनाव लड़ सकेंगे और ना ही वोट दाल सकेंगे 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक दलों को मुश्किल में डाल दिया है। दल फैसले का स्वागत करने को मजबूर हैं, लेकिन उनकी हिचक भी साफ दिख रही है। राजनीतिक पार्टियां कोर्ट के फैसले पर कोई विपरीत टिप्पणी नहीं करना चाहतीं, लेकिन फैसले के असर से बचने के लिए संसद का सहारा लिया जा सकता है। 

देश की सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी सीपीएम ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन होगा। सीपीएम की धुर विरोधी तृणमूल के सौगत राय ने भी इसे गलत बताया है। जबकि बीजू जनता दल ने शंका जताई है कि इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। वही समाजवादी पार्टी तो इतनी ज्यादा तनाव में है कि उनके महासचिव रामगोपाल यादव ने यह तक कह दिया की सुप्रीम कोर्ट संसद का तीसरा सदन नहीं बन सकता है, संसद का फैसला ही सर्वोच्च है, और सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कतई स्वागत करने योग्य नहीं है, और उनकी पार्टी 
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को संसद में रद्द कराने का पूरा प्रयास करेगी

तो क्या एक एतिहसिक फैसला लागू होने से पहले ही रद्द कर दिया जायेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता हमारी संसद जहाँ पर बड़े से बड़े बिल पर नेताओ की एक राय नहीं बन पाती ऐसे मुद्दों पर अक्सर वो एक साथ आ जाते है।       

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शहर में चांदनी


भागो कि सब भाग रहे हैं
शहर में
कंकड़ीले  जंगलों में
मुंह छिपाने के लिए
चाँद
ईद का हो या
पूर्णिमा का
टी.वी. में निकलता है अब
रात मगर क्या हुआ

मेरी परछाई के साथ
चांदनी चली आई
कमरे में
शौम्य, शीतल,
उजास से भरी हुई

लगा मेरा कमरा
एक तराजू है
और
मै तौल रहा हूँ
चांदनी को 
एक पलड़े में रख कर
कभी खुद से
कभी अपने तम से

लगा रहा हूँ हिसाब
कितना लुट चुका हूँ
शहर में !

कवी - सुशील कुमार 
 

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Sunday, 14 July 2013

बहुत खूब भागा मिल्खा

“राकेश ओम प्रकाश” हमेशा से ही एक अलग, बेहतरीन और सामाजिक मुद्दा दर्शकों के सामने लाते रहे हैं, इस बार वो “तिग्मांशु धुलिया” के “पान सिंह तोमर” की तरह एक भूले हुए नायक की कहानी दर्शको के सामने लेकर आये, दुनिया जिन्हें “मिल्खा सिंह” या “फ्लाइंग सिख” के नाम से जानती थी, “मिल्खा सिंह” की कहानी “पान सिंह तोमर” की तरह मार्मिक तो है ही साथ ही ह्रदयस्पर्शी भी है | “मिल्खा सिंह” का नाम “फ्लाइंग सिख” कैसे पड़ा और उन्होंने अपने जीवन में कैसी परिस्थितियों का सामना किया और कैसे वो भारत की शान बन गए इस बात को “राकेश ओम प्रकाश”, “प्रसून जोशी” और “फरहान अख्तर” की जोड़ी ने बखूबी पेश किया है |
  फिल्म की शुरुवात होती है 1960 में “रोम” के “ओलंपिक” से जहां “मिल्खा सिंह” दौड़ हार जाते हैं और भारत का स्वर्ण पदक पाने का सपना टूट जाता है, मिल्खा सिंह की हार की वजह उनका भयावह अतीत है जिसे याद कर लेने पर वो सहम उठते हैं | ओलंपिक में मिली इस हार से “मिल्खा सिंह” उदास हैं और इसी बीच भारत-पकिस्तान के रिश्तों को मजबूत करने के लिये खेलों का आयोजन होता है जिसमे दौड़ की अगुवाई करने के लिए मिल्खा सिंह को चुना जाता है, पर मिल्खा सिंह का अतीत पकिस्तान से जुड़ा हुआ है जिस कारण वो पाकिस्तान नहीं जाना चाहते हैं | मगर तत्कालीन प्रधानमन्त्री “जवाहर लाल नेहरु” ये चाहते हैं की मिल्खा सिंह पकिस्तान जरूर जायें, क्यूंकि मिल्खा सिंह भारत के स्टार धावक हैं |
  ये फिल्म मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित है, मगर दर्शकों को कहानी और मिल्खा सिंह से जोड़ने के लिए वास्तविकता से हटकर कुछ आवश्यक परिवर्तन किये गए हैं जो जरुरी भी थे | प्रसून जोशी ने कहानी लिखते समय इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि मिल्खा सिंह की वास्तविकता कहीं कहानी कहने में खो न जाये, और प्रसून इस कार्य में कामयाब भी रहे | अगर बात करें निर्देशन की तो “राकेश ओम प्रकाश” का निर्देशन एक अलग पहचान रखता जिससे “भाग मिल्खा भाग” की कहानी और ज्यादा निखर गयी | अदाकारी के मामले में फरहान अख्तर ने खुद को साबित किया है, वैसे मिल्खा सिंह चाहते थे कि ये किरदार “अक्षय कुमार” द्वारा किया जाए, मगर बाद में फरहान की मेहनत से वो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खुद ही फरहान को बहुत सारी टिप्स दी जिनकी मदद से फरहान “मिल्खा सिंह” का किरदार निभा पाने में और ज्यादा कामयाब हो पाये |

  कुल मिलाकर भाग मिल्खा भाग जहां एक ओर एक भारतीय सितारे की कहानी को बयान करती है वही ये फिल्म मनोरंजन के स्तर से भी परिपूर्ण दिखाई देती है, “पान सिंह तोमर” के बाद “भाग मिल्खा भाग” भी एक सराहनीय कोशिश है जिसे हर दर्शक को एक बार जरूर देखनी चाहिए |

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Saturday, 13 July 2013

माँ


माँ ,जिसकी गोद में 
बचपन बीता,बड़ा हुआ .
जिसके आँचल तले
सुनहरे स्वप्न में खोया 
न जाने कितनी शेतानिया की,
     न जाने कैसे -कैसे माँ ने 
     मुझे पाल -पोस कर ,
     अपने खून से सींच-सींच कर 
     इस लायक बनाया कि में,
     उसकी बुढ़ापे कि लाठी बनू ,
किन्तु में स्वार्थी ,
प्रिये के कहने पर 
उस बूढी माँ को ,ठुकरा कर 
छोड़ दिया तिल-तिल तरसने को 
और खुद वासना  में ,लिप्त ,
अपनी प्रिये कि गोद में ,
उसकी सुनहरी जुल्फों से 
खेलता रहा ,उलझता रहा .
     उधर वह बूढी माँ 
     किस -किस के आगे
गिद्गिदाती .हाथ पसारती.
किन्तु ,मैं इन सब से 
बेखबर केवल अपनी प्रिये 
के खयालो में उसकी हर 
तम्मना पूरी करता ,
     आह आज मैं
     जीवन के किस मोड़ पर आ गया  
     मेरी सारी शिराएँ शिथिल पड़गई हें 
आँखों के समक्ष घोर अन्धकार 
तवचा का रंग लुप्त हो गया हे 
कोई भी अब मेरे नजदीक  आने  
घबराते ,मैं एक तक 
दीवार पर टंगी तश्वीर निहारता 
और शिशकता अपने कर्मो पर 
      बेचारी  बूढी माँ ,इसी तरह 
      न जाने कितनी तकलीफों 
      का सामना  कर -कर के 
      इस दुनिया से चल बसी होगी ,
मैंऔर मेरा घर 
केवल रह गया सूना
शमशान के सामान 
यही हे ,हाँ यही हें 
मेरे अत्याचारों और 
दुष्कर्मों का फल .

-संजय कुमार गिरि

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बीजेपी नहीं कांग्रेस है मोदी की प्रचारक

कहते हैं अगर आपको अपने प्रतिद्वंदी को हराना हैं तो उसके नाम तक को जनता के जहन से मिटाना होता है मगर कांग्रेस इसके विपरीत ही नज़र आ रही है क्यूंकि मोदी का प्रचार करने में जितनी सक्षम शायद बीजेपी और खुद मोदी नहीं रहे, उनके इस काम को कांग्रेस ने मूर्खतावश बखूबी अंजाम दिया है, कल तक एक ऐसा बड़ा वर्ग था जो मोदी को सिर्फ गुजरात के मुख्यमंत्री और हिन्दूवादी नेता के रूप में जानता था, पर अब वो मोदी को बिना किसी घोषणा के बीजेपी की तरफ से प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार के रूप में जानने लगा है | मोदी से जुड़े हर विवाद और उस पर आयी कांग्रेस की प्रतिक्रया से मोदी एक मजबूत ब्रांड की तरह लोगो के सामने आ रहे हैं जिसका लाभ मोदी को २०१४ के चुनावों में भी मिल सकता है |
  मोदी के साक्षात्कार में कही बात का सियासी दलों और राजनितिक पंडितो ने अपना मतलब निकला और कांग्रेस के साथ-साथ ज्यादातर सियासी दलों ने मोदी के खिलाफ बयानों की जंग छेड़ दी | मोदी आमतौर पर गुजरात दंगो पर बोलने से किनारा किया करते है, मगर शायद अब वो समझ गए है कि अपनी हिन्दुत्ववादी छवि को किस तरह से उपयोग में लाया जाए |
  काल्पनिक कुत्ते की मौत पर उमड़ा ये बवाल न जाने कहाँ जाकर थमेगा, मगर एक बात तो तय है की मोदी पर विपक्षीय पार्टियों की बयानबाजी से, मोदी का ही प्रचार और प्रसार होगा एवं जो लोग मोदी और उनकी छवि से परचित नहीं हैं वो भी मोदी से परिचित हो जायेंगे जिसका लाभ मोदी को आने वाले समय में अवश्य ही मिलेगा |


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धूल सी जम गयी आँखों में, उस धूल को हटा के देखो तो |


धूल सी जो जम गयी है आँखों में, उस धूल को हटा के देखो तो |
दुनिया में जो भी दुखी हैं, उनका थोड़ा दुःख मिटा के देखो तो |
दुसरो के दर्द के सामने, अपना दर्द भुला के देखो तो |
गैरो के दोष ढूंढने से पहले, अपने को आईने में देखो तो |
अपने लिए तो सब हँसते हैं, कभी दूसरों के लिए मुस्कुराकर देखो तो |
लोगों की आँखों में आये आसूं को, उनकी हंसी में बदल के देखो तो |
मिलता है एक अजीब सुकून, उस एहसास को महसूस कर के देखो तो |

धूल सी जम गयी आँखों में, उस धूल को हटा के देखो तो |

जाग्रति पाण्डेय 

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Friday, 12 July 2013

सबसे सफल चरित्र अभिनेता थे प्राण साहब

  प्राण साहब की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस एक घटना से लगाया जा सकता है की फिल्म “फिर वोही दिल लाया हूँ” के एक सीन के दौरान जब फिल्म के नायक “जॉय मुखर्जी” खलनायक बने “प्राण” को मुक्का मारे तो वहां खड़ी पब्लिक को ताली बजानी थी, मगर कोई भी दर्शक इस बात के लिए राज़ी नहीं हुआ, वो अपने पसंदीदा अभिनेता के पीटने पर ताली नहीं बजाना चाहते थे | बाद में प्राण साहब ने खुद उन्हें समझाया की यह सिर्फ शूटिंग है तब जाकर दर्शक माने थे |
  प्राण साहब बॉलीवुड में एक अलग ही पहचान रखते थे जो न किसी नायक की और न ही किसी खलनायक की थी उन्होंने एक सफल चरित्र अभिनेता के तौर पर बॉलीवुड में अपना अलग मुकाम बनाया है | एक समय हुआ करता था जब किसी रोल में कोई भी कलाकार फिट नहीं बैठता था तो सबकी पहली पसंद प्राण साहब बन जाते थे, फिल्म “राम और श्याम” में खलनायक गजेन्द्र की भूमिका निभाने के बाद उन्होंने उस किरदार के विपरीत फिल्म “उपकार” में एक मस्त मौला इंसान का किरदार निभाया जिसे भी दर्शको ने खूब पसंद किया और सराहा इसके बाद उन्होंने कई यादगार चरित्र निभाये जैसे “ज़ंजीर” का “शेर खान” और “डॉन” का “जसजीत” आदि जिससे वो “प्राण” से “प्राण साहब” बन गए |
  नायक और खलनायक तो बहुत से हुआ करते है मगर किसी भी किरदार को जीवित कर देने वाला “प्राण साहब” जैसा चरित्र अभिनेता सदियों में एक बार ही पैदा होता है, हम सभी दर्शक और उनके चाहने वाले ये ही चाहेंगे की वो अगला जन्म भी प्राण के रूप में ले और अपने बेहतरीन संवाद और अदायगी से हम सब का मनोरंजन करते रहें |


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शहीद अफरीदी से प्रेरित है फिल्म “मै हूँ अफरीदी”


भारत के मिल्खा सिंह पर आधारित फिल्म के बाद दर्शको के लिए परदे पर आने को तैयार है पाकिस्तानी क्रिकेटर शहीद अफरीदी से प्रेरित फिल्म, मैं हूं आफरीदी फिल्म पकिस्तान की खेलो पर बनने वाली पहली फिल्म है, फिल्म के निर्माता और निर्देशक हुमायूं सईद है, अफरीदी पर आधारित इस फिल्म में अभिनय के लिए शाहिद अफरीदी से पेशकश की गयी थी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था।  इस फिल्म को बनाने के लिए हुमायूं सईद ने 10 लाख डॉलर (लगभग 6.1 करोड़ रुपए) खर्च किए हैं। फिल्म में शाहिद आफरीदी के रोल में कराची के युवा एक्टर नोमान हबीब नजर आएंगे। आफरीदी की लेडी लव इस फिल्म में होंगी पाकिस्तानी एक्ट्रेस महनूर बालूच, इस फिल्म में बॉलीवुड में काम कर चुके पाकिस्तानी अदाकार जावेद शेख, नदीम बेग, शफकत चीमा और सईद भी शुमार हैं। फिल्म ईद के मौके पर पाकिस्तान के अलावा भारत और गल्फ देशों में भी रिलीज होगी।

निर्माता हुमायूं सईद ने हाल में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया की ‘‘यह फिल्म क्रिकेट से प्रेरित है और एक गरीब युवा की कहानी है जिसकी अनजान टीम ख्याति प्राप्त करती है। खिलाड़ी और उनकी टीम को शाहिद आफरीदी से प्रेरणा मिली, इसलिये हमने उनके नाम का इस्तेमाल इस तरह से किया।"

सैयद ने कहा, ‘‘वह इस फिल्म में काम करें या नहीं, शाहिद आफरीदी हमारे लिये शाहिद आफरीदी ही रहेंगे।" उन्होंने कहा कि वह चाहते थे कि आफरीदी इस फिल्म भूमिका अदा करे लेकिन इस क्रिकेटर ने अपनी परिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए यह पेशकश ठुकरा दी। सैयद ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने हमें अपना नाम फिल्म के टाइटल में इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी”।

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Thursday, 11 July 2013

जीवन एक संघर्ष हे


जीवन एक संघर्ष हे ,
इन्सान हर मोड़ पर 
गुमराह हो जाता हे 
सफल वही होता हे 
जो संगर्ष स्वीकारता हे .
जीने की राह के
रास्ते तो अनेक हें 
किन्तु फिर भी ,
इन्सान जीने की राह 
स्वंम ही अपनाता हे ,
जीना भी एक कला हे 
यह शायद कम लोग 
ही जानते हें ,किन्तु !
फिर भी ,कुछ लोग 
जीवन को खेल समझतें हें.
और मौत को गले लगते हें.

कवी - संजय कुमार गिरि

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“आयरन मैन” या “स्पाइडर मैन” नहीं अब "डोगा" बचाएगा दुश्मनों से

अभी तक आपने कॉमिक्स किरदारों को परदे पर सिर्फ हॉलीवुड में देखा है, आयरन मैन, स्पाइडर मैन, कैप्टन अमेरिका" आदि इनके सफल उदाहरणों में से है जिन्हें बच्चों के प्यार के साथ-साथ बड़ो की तारीफ भी मिली और इन कॉमिक्स किरदारों को सबका पसंदीदा बनाकर आसमान पर पहुंचा दिया, ये सभी ज्यादातर अमेरिका की प्रसिद्ध कॉमिक्स मारवल के किरदार हैं |
 भारत में भी कॉमिक्स का बेहद क्रेज़ रहा है और यहाँ के प्रसिद्ध कॉमिक्स ब्राण्ड "डायमण्ड कॉमिक्स" और "राज कॉमिक्स" रहे है | "राज कॉमिक्स" ने कई एक्शन सुपर हीरो दिए है जिनमे नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, परमाणु, भेड़िया, तिरंगा और डोगा आदि हिट सुपर हीरो थे, मगर भारत में किसी भी निर्देशक ने इन पर कोई फिल्म नहीं बनाई पर अब पहली बार "अनुराग कश्यप" सुपर हीरो "डोगा" पर फिल्म बनाने जा रहे है | "डोगा" जो असल ज़िन्दगी में "सूरज" नाम का एक लड़का है मगर समाज में फैली बुराइयों को अपने तरीके से ख़त्म करने के लिए निकलता है और अपनी पहचान छिपाने के लिए एक कुत्ते का सा मुखौटा पेहेनता है | डोगा उर्फ़ सूरज जो कि बचपन में अनाथ हो गया था और उसे हल्दी चाचा ने पाला था |
  अनुराग ने इस रोल के लिये "कुनाल कपूर" को चुना है और डोगा को ध्यान में रखते हुए अनुराग ने कुनाल से अपना वजन बढाने को कहा है जिससे किरदार ज्यादा से ज्यादा वास्तविक लगे | कुनाल भी इस भूमिका को निभाने के लिए खासे उत्साहित है और कुनाल ने कहा की उन्होंने कभी नहीं सोचा था की वो डोगा जैसे किसी सुपर हीरो का किरदार निभाएंगे | अनुराग फिल्म की शूटिंग जल्द ही चालू करना चाहते हैं और वो इसकी स्टार कास्ट फाइनल करने में जुटे हुए हैं |

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