Tuesday, 30 April 2013

‘CHINKI’: Might land you behind the bars for 5 years



Belonging from Assam, situated in the north-eastern part of the country and having almost spent two years in the capital now, with one thing that I have always come across is the use of the word ‘chinki’. Be it some of my close friends and others with whom I have been closely associated with nobody have refrained from using this particular term. During my initial days in Delhi when I was beginning to bud up in the region and make new friends from this region as well as other parts of the country, they always enquired about one common thing, “Aap Assam se ho na, waha pe chinkiya bohut hain na??” I being a mere beginner in the place had no idea what they were implying at, however soon I got hold of what their commonly used term pointed out.

When with a gang of friends we often tend to call each other with various names and sometimes even racial, however so as long as we don't mean it in a serious defamatory manner, it doesn't matter much. But the attitude of some is certainly spurious and stereotyped. I have even come across people utter, “I heard that chinkis are really very much easy going” and other vulgar chattel.

However, apart from the above mentioned idiotic attitude the prime objective of this piece of writing is to make aware why one should refrain from using this term and what might be the consequences if used.

Very few people are aware that, early is 2012 the Ministry of Home Affairs asked all the states and union territories to book anyone who commits an act of atrocity against people from North East under the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act. In the later course of time, the term ‘chinki’ was made officially derogatory and illegal and anybody found in engaging such act will have to face the law which might land the fellow behind the bars for 5 years. Many might argue that jail for 5 years is a too harsh punishment, for simply using a racial term. But, when there’s an attack on a person’s integrality and dignity, law must intervene to protect it, after all if not stopped now today’s racial discrimination might turn into tomorrows more serious crime and violence. So, next time beware and think twice before addressing someone ‘chinki’. 

By-Shamim Zakaria

Labels:

Monday, 29 April 2013

कमजोर विदेश नीति की परिचायक यूपीए सरकार

   अभी हाल ही में कुछ दिनों पहले भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी इटली के मरीन को जब सरकार की तरफ से वोट देने के लिये वहाँ जाने की इजाज़त दी थी तभी से ये बात तो सिद्ध हो गयी थी की हमारी सरकार की विदेश नीतियाँ कितनी परिपक्व हैं उसके बाद जब चीन के भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की खबरे आयीं तो हमारे विदेश मंत्री ने बड़ी ही विनम्रता से चीन दौरे पे जाकर इस मुद्दे पे बात करने का मन बना लिया | इस सब के बाद जब सरबजीत का बेहद संजीदा मुद्दा सामने आया तो फिर से हमारी सरकार की कोशिशें बेअसर दिखायीं दीं |

  वहीँ अजमेर: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के वंशज और अजमेर शरीफ दरगाह के दीवान सैयद जैनुल आबिदीन अली खान ने सरबजीत सिंह पर जानलेवा हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि इसमें पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईअसआई की साज़िश से इन्कार नहीं किया जा सकता है |

  अब सोचने वाली बात ये है कि अफजाल गुरु और कसाब कि फांसी के बाद हुए विरोध के बाद भी क्या सरकार को इस बात की ज़रा सी भी समझ न थी की पाकिस्तानी जेल में बंद सरबजीत पर इस घटना का असर पड़  सकता है और उसे विशेष सुरक्षा दिए जाने के लिये पाकिस्तानी सरकार को आगाह किया जाये, अगर हमारी सरकार दिन पर दिन इस तरह के संजीदा मुद्दों पर ढीली पड़ती जायेगी तो वो दिन दूर नहीं जब हर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी सुरक्षा और सुविधा पाने के लिये भारत में ही अपराध करेगा |

Labels:

Sunday, 28 April 2013

एक अजीब सी बेबसी

एक अजीब सी बेबसी,
एक अनचाहा डर,
इन मासूम आँखो में,
हर पल, हर वक्त।

वासना से भरी मुझे टटोलती नज़रे,
हवस से भरी शिकारी मनोवृत्तियाँ,
फबत्तियाँ कसती ज़ुबानें,
कभी अपनो की, कभी परायो की।

कभी वो जिनपर बहुत विश्वास किया तुमने,
कभी वो जिनके पास होकर भी,
ना भाँपी उनकी मंशा तुमने,
हाँ माँ, हाँ, वो ही,
जो देवालयो में पूजते रहे मुझे,
और बाहर खेलते रहे जिस्म से मेरे।

और इस बार तो कुछ किया भी ना मैंने,
बस पाँच बसंत ही तो देखे थे मैंने,
ना देर रात किसी बस में सफर किया मैंने माँ,
ना कोई भड़कीले कपड़े पहने मैंने माँ,
ना बोले कोई लुभावने बोल मैंने माँ।

मैं तो बस एक कलीं थी,
ओस की चादर से ढकी,
बन फूल किसी आँगन को महकाती मैं,
बन हार किसी के जीवन को खूबसूरत बनाती मैं,
बन एक नदी खुशियों की बहती जाती मैं।
 
 
लेखक - अम्बर सक्सेना

Labels:

"आयरन मैन" पर हावी हुआ "टोनी स्टार्क"


शुक्रवार को आयरन मैन सीरीज की तीसरी फिल्म “आयरन मैन-3” रिलीज हुई और उम्मीदों के मुताबिक ये भाग भी एक्शन से भरपूर है और साथ ही दोबारा “रोबर्ट दावनी जूनियर” का बेहतरीन अभिनय भी देखने को मिलता है फिल्म को तकनिकी दृष्टिकोण से और ज्यादा विकसित किया गया है साथ ही कहानी पर भी अच्छा काम किया गया है |

  फिल्म की कहानी वहीँ से शुरू होती है जहाँ फिल्म “एवेंजर” में खत्म हुई थी, टोनी आज एक समृद्ध व्यक्ति है उसके पास एक अच्छी गर्लफ्रेंड है और वो अपने द्वारा मानवता की भलाई के लिये किये गये कामों से भी संतुष्ट है पर फिर भी वो अंदर से खुद को कमजोर महसूस करता है और वो रातों को सो भी नहीं पाता है वो टूट रहा है वो दिन रात अपना सारा समय केवल अपने काम को ही दे रहा है | अतीत की कुछ यादें और लोग उसकी जिन्दगी में आ कर ऐसा भूचाल मचाते हैं की वो संभल ही नहीं पता और दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी “मेंडरिन” भी टोनी के लिये एक बड़ी मुसीबत बन जाता है टोनी कैसे इन मुसीबतों से बाहर निकलता है ये देखने लायक है |

  अक्सर सुपर हीरो वाली फिल्मो में एक्शन हीरो के मुखौटे की पीछे छुप जाता है पर इस फिल्म में आयरन मैन कभी सिर्फ अपने कवच के हाथ से ही लड़ता दीखता है तो कभी हवा में ही अपना सूट पहनता दीखता है जो इस फिल्म के एक्शन सीन को जबरदस्त रोमांचक बना देतें हैं | फिल्म हर तरह से देखने लायक है चाहे वो निर्देशन हो, अदायगी हो या फिर फिल्म का जबरदस्त एक्शन, फिल्म आपको निराश नहीं करेगी |

Labels:

Thursday, 25 April 2013

मुझे प्रेम है उन सारी कश्तियों से


मुझे प्रेम हैं उन सारी कश्तियों से.
जो औंधे मुह पडी रहती है
नदियों झीलों और समन्दरों के किनारों पर
बिना थके, बिना रुके बिना रोयें
ओ नाविक!!!
आओ और घसीट कर उतार लो
बेरंग पानी में प्यासी कश्ती को !!!
कश्तियों की कोई जरूरते नहीं होती हैं ....
जरूरते तो होती हैं,या तो नाविकों की,या तो मुसाफिरों की.
कश्तियाँ मुसाफिर नहीं होती हैं.
एक दिन जब जिंदा शज़र को काट कर,
गढ़ दी गई थी वह कश्ती की शक्ल में,
सूख गया था उनका खून,उनका पानी,उनका जीवन.
तब से अब तक हर पल
अनगिनत मुसाफिरों के सपने,जीवन और दुनिया भर के बोझ
लिये लिये फिरती हैं.
वे नाविक
जिन्होंने,सदियों से कश्तियों को अपनी मर्जी से चलाया है
कहते हैं-मुक्त हो जाएँगी ये कश्तियाँ डूबकर.
कोरा झांसा, झूठा सपना,ख्याली पुलि-न्दें.
कश्तियाँ डूबकर स्वतंत्र नहीं होती हैं.
करती रहती हैं इंतज़ार,फिर से
सपनों के फूल पत्तियां खिलने का
कलियों के ख्वाब बुनने का.
अपनी जमीन और अपना आसमान चुनने का.
मुझे प्रेम है उन सारी कश्तियों से.

 अविनाश पाण्डेय

Labels:

Wednesday, 24 April 2013

पुलिस सुधार के साथ स्वयं की मानसिकता बदलना जरूरी !

आप क्या सोचते है आप जाने लेकिन मैंने पिछली दफ़ा कई बार दिल्ली पुलिस से लाठियां खाते,आँसू गेस के गोले खाते युवाओं की आँखो में आँसू देखें या नारे लगाने वक़्त ज़रूरत कम होने पर उनको एक कोने पर पैंट या कमीज़ उपर कर चोंट पर फूंक मारते देखा हैं|इसी दौरान पुलिस भी कई दफ़ा अजीब किस्म की मानसिक प्रताड़ना से गुज़रती है जब आते-जाते बच्चे उन्हें गालियां दे कर गुज़रते या उन्हीं के नाम से हाय-हाय के नारे लगाते|कई पुलिस अफसर तो अनेक मौकों पर कहते कि "बेटा हम तुम्हारे साथ हैं बस ड्यूटी की मजबूरी समझो,कई बताते कि आंदोलन में मेरी भी बच्ची या बच्चा शिरकत करने आए हैं हमें खुशी है कि आप युवा देश के लिए अपने स्वयं के लिए इतना सोचने लगे हो"|हालांकि उस दौरान भी पुलिस पर जमकर आक्रोश निकाला था मैंने भी कुछ चीज़ो को देख मसलन लड़कियो को ही पीटना लाठियों से या धोखे में रखकर आंदोलन कुचलने का प्रयास करना|फिर भी भीतर ही भीतर जानता था कि 1861 के पुलिस अधिनियम पर आधारित ये पुलिस दरअसल आज के भारत के अनुरूप कार्य करे भी तो कैसे जब औपनिवेश्क काल के शासकों के बाद सत्ता के शीर्ष पर विराजमान ताक़ते इन्हें जनता नहीं खुद का सेवक समझती और बनाए रखना चाहती हो|पुलिस सुधार को लेकर सर्वोच्च न्यायलय से लेकर न जाने कहां-कहा़ं और कितनी दफ़ा सरकारों को फटकार नहीं लगी फिर भी कोई ऐसे बदलाव को स्वीकार करे भी तो कैसे जिससे उनके खुद के आने वाले कल की राते कहां गुज़रेगी जैसे प्रश्न मुंह बाहें खड़े हो जाएं ?पुलिस की आलोचना उसके उन सभी निंदनीय क्रियाकलापों को लेकर अवश्य होनी चाहिए जिसकी वह हक़दार हैं|उदाहरणार्थ गांधीनगर में पांच वर्षिय बच्ची के साथ हुई दरिंदगी में भी उसके परिवारजनों की माने तो वक़्त रहते कारवाई होती तो काफी कुछ होने से बचा जा सकता था,वो नहीं तो न सहीं चोरी पर सीनाजोरी अलग कि मामला रफादफा कीजिए क्योंकि आप गरीब हैं,कहां इन सब चक्करों में पड़ रहे हैं चलिए दो हज़ार रूपय काफी होंगे!ज्यादा नारे लगाती हो लो थप्पड़!लानत है ऐसी मानसिकता,ऐसी इंसानियत पर|

यूं ही सोलह दिसंबर को दामिनी रेप कांड के संदर्भ में भी कई सवाल है जिनमें से मामूली सवाल ये कि पुलिस आखिर कर क्या रहीं थी जब एक बस सरेआम युवती और युवक के चंद पाशविकों से घिरे होने पर उनकी मौत का काल बनने को आमादा थी ? स्कूल के दौरान जब छोटा था ऐसा खिड़की से बहुत बार देखा कैसे ड्राईवर नीचे जाकर कुछ देरी में पर्याप्त कागज़ात न होने पर भी हंसी खुशी मामला सुलझा आता था|पुलिसिया स्टाफ में बहुतेरे आसामाजिक तत्वों की तूती बोलती है यह बात किसी के लिए कोई रहस्य नहीं हैं|फिर भी इन बातों से इतर यदि बलात्कार जैसे अपराध के विषय में इमानदारी से सोचा जाए तो बताइएगा जिस अपराध को नब्बे फीसद परिवार,रिश्तेदारों,पड़ोसियों द्वारा अंजाम दिया जाता हो उसमें पुलिस का कितना हस्तक्षेप अपराध घटित होने से पहले हो पाना संभव होगा ?क्या पुलिस हाय-हाय के बीच हम अपने समाज की दीवारों पर आई सड़न को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं?निश्चित तौर पर पुरूष प्रधान समाज उपर से पुलिस को ख़ाकी का गुरूर उन्हें मौजूदा कार्यप्राणली में अधिक खतरनाक बना देता है पर अंतत: वह भी समाज का ही अंग तो हैं|फिर,इनके राजनीतिक आंकाओं पर किसी की नज़र नहीं जाती जो इन्हें सुधारने के बीच सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं|हमे शुरूआत तो अपनी स्वयं की मानसिकता बदल कर ही करनी होगी|ये सब बाते मैं आंदोलन,पुलिस की आलोचना,सबसे इतर कर रहा हूं चूंकि लोकतंत्र को अधिक मजबूत बनाने में आंदोलनों एवं किसी संवेदनशील मुद्दे पर जनता जनार्दन का स्वत: स्फूर्त होता हस्तक्षेप मुल्क के भविष्य के लिए मुफीद साबित होगा बस किसी ग़लत ताक़त के हाथों इस्तेमाल होने से बचना चाहिए|और खामियां जिसकी जहां हो उसकी आलोचना होनी चाहिए चाहे वे जो हो|आलोचना ही आपको-हमको बेहतरी की ओर ले जाती हैं फिर हमारी पुलिस तो जितनी भर्त्सना झेले वो कम !लेकिन शर्त ये रहे कि पुलिस हाय-हाय के बीच अहम लक्ष्य यानी 'पुलिस सुधार' को हाशिाए पर न धकेला जाय जिस पर बात न होना पुलिस की बीमार गुलाम मानसिकता से अधिक ख़तरनाक और आने वाले भविष्य के साथ अन्याय होगा !



लेखक- अंकित मुटरेजा

Labels:

Happy Birthday to “GOD OF CRICKET”



  In India religion has been a very important aspect of people’s life.  Everyone has their own way of worship. No one ever has seen their god but they believe that he is always close to them whenever they need him. There is a religion in India which is followed by almost every citizen of this country. There have been no riots and fights happen because of this religion. You don’t have to go to temple, mosque, gurudwara and church to worship the GOD of this religion. The most important thing about this religion is that you can witness the GOD of this religion; you can meet him, talk to him, hear to him, touch him and even click a photo with him.
  The religion is named as “CRICKET” and “SACHIN RAMESH TENDULKAR” is the GOD of this religion. Cricket was started way back in 16th and 17th century in England. The birthplace of this game was England. But, the GOD of this game took birth in India. He knew that this country had lot of passion and eagerness for this game.
  Sachin Tendulkar was born on 24 April 1973 at Bombay (now Mumbai). From his childhood he had lot of interest in sports. He wants to be a Tennis player in future and he was a big fan if John McEnroe (a famous tennis player from). He also had his hairstyle like him. But, his elder brother had something else in mind for Sachin. He wanted him to be a cricketer. So he put him under the coaching of Ramakaant Achrekar. Ramakaant Achrekar was the first person who identified the talent in Sachin. From the first day when he had meet Sachin, he knew that he would be India’s greatest player.
  When Tendulkar started playing cricket he wanted to become a fast bowler. He also went to MRF Pace Foundation for that but, he was rejected from there. On 24 November 1989 first time Sachin made his debut in International Cricket on the tour of Pakistan. At that time he was just 16 years old and he had to face one of the fastest bowling attacks of that time, which had Imran Khan, Waseem Akram, and Waqar Younis.
  In the fourth test on that tour Sachin tried to pull a fast bouncer from Waqar, the ball hits the inside edge and trampled into the nose of Sachin. He went down and lot of blood was coming from his nose. It was a heavy blow and everyone thought that this would be a serious injury. Sachin proved everyone wrong he stand and ready to play. Next ball from Waqar was fast in swinging Yorker and hit went to the boundary rope with the double speed it came. Sachin hit straight drive on that ball.

  We all know about the record of Sachin Tendulkar. Almost every record of batting belongs to him. He not only game this record to India. But, he gave a hope, a motivation to fight and a passion to chase your dream. There is lot of youngsters who wanted to be like Sachin. Lot of them was now playing in the Indian Team. Kohli, Yuvraj, Rahane, Pujara and Dhoni all started playing cricket because of Sachin.  There were days when everyone switched off their TV sets when Sachin gets out, people in the ground leave the ground on his dismissal.
  Today he turned 40. His body would not support him like it did when he was 25.but, his enthusiasm, passion and love towards this game was still the same as it would be 20 years ago. People in India called him GOD OF CRICKET. He served this game as GOD. Always ready to help and support this game. He retired from ODI and time came when he will retire from Test Matches. All of them, who saw him batting on TV or Ground, would consider themselves lucky.
  Wishing him a great success in his upcoming future, we feel proud that Sachin is from India. Thank you GOD OF CRICKET for entertaining us, for giving us a lot of lessons of life through your batting,

Labels:

Tuesday, 23 April 2013

PROSPERITY BEHIND ADVERSITY

  We all are aware or the craziness of Indian people for gold. Record declines of 25% in yellow metal has raised the expectations of the
buyers but have shattered the dreams of  investors. as per experts it’snot safe to invest in gold in present situation .
  The recent fall in gold is indicating towards shabby future of gold. Normally gold prices are inversely proportional to the dollar rate but
recent dollar fall have generated no effect on gold.
  As per experts American economy is recovering from dark clouds so money which was invested to gold is now shifted to share market. Gold is proving itself non profitable for short term investment so it is advisable to invest for longer period or hold the stock . Law of averages state that probability of negative is more or less equal to positive so beware gold doesn’t suit everyone

Labels:

एक मुलाकात ........


मैं बाज़ार को निकला था दिल बहलाने के लिए .........
सामने देखा तो मेरा बिछड़ा प्यार खड़ा था ...........
कुछ पल के लिए मानो दुनिया ही ठहर गई हो ..............
नज़रें मुझसे उसकी मिली तो जैसे जन्नत थी मिल गई ......
बोले न हम जुबान से मगर आँखों से न जाने कितनी बातें की ..............
इशारों इशारों में मैंने उसकी और उसने मेरी तबियत भी पूछ ली ...........
मै उसको टोक कर बदनाम न कर सका ............
उसके सामने तो कम्बखत मैं आह भी न भर सका ..........
चलते हुए आँखों ही आँखों में मैंने खुश रहने की दुआ दी उसे .........
उसने मेरे और मैंने उसकी आँखों में नमी भी महसूस की ..........
इतना कहकर मैंने अपने घर का रुख किया .........
मैं फिर से टूट गया उसे देख कर उसने जान लिया  ..........

Written By-Shashank Mishra

Labels:

Monday, 22 April 2013

आस्थाएं भी ख़ाक हो गई, मानवता भी राख हो गई।


भारत में त्योहारों का मान शायद अब पीढ़ी बदलने से कम हो गया हो पर हालात इतने बिगड़ जायेंगे ये नहीं सोचा था। एक ओर नवरात्रि की पावन बेला पर जब पूरा देश कन्याओं के चरण वंदन में लगा था वही दिल्ली की गाँधी नगर की घटना ने इस पर्व की आस्था को तार तार कर दिया। देश भर में चल रहे कन्या पूजन के वक्त एक कन्या की आबरू को इस कदर लूटा गया कि दानव प्रकृति की भी सारी सीमाएँ लाँघ दी गई। एक बार फिर मीडिया कवर, हर चैनल पर एक ही खबर , कैंडिल मार्च, सरकार पर पथराव, नेताओं का घेराव और सरकार का गूंगे बहरे बने रहना, जनता का थक जाना, और बस किस्सा खत्म। शायद ऐसा ही हुआ था 16 दिसंबर 2012 की घटना के बाद। अगर कदम तब उठा होता तो शायद ये अब फिर से न होता। तब तो सरकार को मजा आ रहा था सड़क पर भीड़ देखकर, और आंसू गैस के गोले छोड़कर। और आज इस घटना के बात एक बिल पास तो हुआ पर इस बात पर नहीं कि अपराधियों के लिए सख्त दंड क्या है बल्कि बिल ये पारित हुआ कि अगर बलात्कार हो रहा हो तो लड़की को क्या अधिकार है करने का। जरा बताइये इन्हें अगर लड़की बलात्कार के समय अपना बचाव करने में सक्षम होती तो जनता आज सड़क पर या इनके सदनों का घेराव न करती। और वो भी ऐसी बच्ची जिसकी उम्र महज़ 5 साल की हो। हम लोग क्या है सरकार लोलीपॉप देती रहेगी और हम खुश होते रहेंगे फिर अगली बार सड़क का घेराव करते रहेंगे। आखिर दम न हममे कम है न सरकार में। पर याद रखियेगा अगला सिकंजा आपकी बहन या बेटी है।

Labels:

Sunday, 21 April 2013

SEBI: SECURITY AND EXCHANGE BOARD OF INDIA


Last Sunday I was coming out of society meeting Mr
Sumit Tiwari one of our society member was tensed
sitting in a garden ,I felt something went wrong with
him ,when I asked him about it he told me how he
invested his lifetime saving in a fraud company .

Its very common in India or I should say in whole world.
People usually get attracted towards high rate of interest
or handsome return.High rate of interest , 200% returns , money multiplies
every month all these formulae generally used as a bait
to attract innocent people .

To prevent people from forgery related to market
government has regulatory body ,SECURITY AND EXCHANGE BOARD OF INDIA is a regulator for security markets in India who act as watchdog of
market . It was established in 12 April 1992 for those who
are unaware about SEBI it is important to know that SEBI
is responsible for the needs of 3 groups

1 issues of security

2 the investors

3 the market investment

SEBI has 3 main function

1 quasi legislative

2 quasi judicial

3 quasi executive

Quasi legislative conducts and investigate and
enforcement action in its executive function and
its passes ruling and order in its judicial capacity ,
which makes it powerful and appeal process makes it
accountable SEBI act as a surveillance body who save investors from
various kinds of risks here are powers of SEBI

- to approve by−laws of stock exchanges.
 -to require the stock exchange to amend their by−laws.
 -inspect the books of accounts and call for periodical returns from recognized stock
  exchanges.
 -inspect the books of accounts of a financial intermediaries.
 -  compel certain companies to list their shares in one or more stock exchanges.
 - levy fees and other charges on the intermediaries for performing its functions.
 -grant license to any person for the purpose of dealing in certain areas.
 -delegate powers exercisable by it.
 -prosecute and judge directly the violation of certain provisions of the companies Act.
 -power to impose monetary penalties.

Labels:

Saturday, 20 April 2013

आखिर कब तक चलेगा दुआओं और कैंडल मार्च का सिलसिला



१६ दिसम्बर २०१२ को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार ने मानो जैसे देश को झकझोर के रख दिया था और उसी के साथ “निर्भया” को इन्साफ दिलाने के लिये देश के हर शहर, गली और चौराहे से इन्साफ के गुहार की आवाज़ें आने लगी थी, असल में १६ दिसम्बर को हुआ ये काण्ड इतना निर्र्मम था कि जहाँ देश की जनता की सहानभूति “निर्भया” के साथ जुड़ी वहीँ लोगो का गुस्सा भी ज्वालामुखी की तरह फूटा और लोगो ने पूरे देश में कैंडल मार्च निकालकर शांतिपूर्ण तरीके से रोष से भरी हुई कई रैलियां भी निकाली, इस जघन्य काण्ड के बाद मानो दिल्ली क्या पूरा देश महिलाओं की सुरक्षा को संवेदनशील तरीके से देखने लगा और इसके लिये कई नियम,क़ानून और सुविधाओं का भी जन्म हुआ |
  १९ तारीख को जैसे ही “गुडिया” के साथ हुए बलात्कार का मामला सामने आया वैसे ही पता चल गया कि बनाये गये सभी नियम,क़ानून और सुविधाएँ खोखली हैं तो फिर से इस तरह के दुआओं और कैंडल मार्च से क्या फायदा होने वाला है | ये किस गृह के प्राणी हैं जो स्त्री को इस तरह नोचते-फाड़ते है जिस तरह कसाई मरे हुए जानवर को भी नहीं काटता होगा, ऐसे प्राणी किसी भी तरह कि दया के हकदार नहीं होने चाहिये जो एक पाँच साल कि बच्ची के साथ भी हैवानियत का गन्दा खेल खेलने से भी संकोच नहीं करते हैं |
  हम जानते हैं कि हम पशु से इंसान बने हैं मगर हमे ये सुनिश्चित करना होगा कि हम ऐसे कुकृत्यों के द्वारा वापस पशु न बन जायें, ये वक्त अब सिर्फ देश कि परिस्थितियों पर विचार करने का नहीं रहा, जब अपराध अपने चरम पर है और प्रशाशन भी उनको दिमागी बीमार के नाम पर उनको छिपाने या उनसे अपना दामन बचाता दिख रहा है , शायद वक्त की यही दरकार है कि हम इन दरिंदों के प्रति “महात्मा गांधी” के पगचिन्हो पर न चल कर “भगत सिंह” की नजरों से इन्साफ का तरीका अपनायें वरना अब वो दिन दूर नहीं, जब बड़े-बुजुर्ग हमारी माताओ-बहनों को “सदा सुखी रहो” के आशीर्वाद की जगह “सदा इज्ज़त सलामत” रहने का आशीर्वाद देते नज़र आयेंगे |

Labels:

Friday, 19 April 2013

ह्रितिक के पास है काम की भरमार

ह्रितिक बॉलीवुड के उन कुछ चुनिन्दा कलाकारों में से है जो कम से कम मगर बेहतरीन कहानियों पर फिल्म करने में यकीं रखते है पर आने वाले समय में ह्रितिक के पास एक के बाद एक फिल्मो की कतार लगी हुई है । 
   कृष-3 की रिलीज़ के बाद भी ह्रितिक रोशन के पास काम की भरमार लगी हुई है, सबसे पहले तो ह्रितिक अपनी बहुप्रतीक्षित फिल्म कृष-3 को पूरी करने में जी जान से लगे हुए है उसके बाद वो फिल्म  बैंग-बैंग में नज़र आयेंगे जो २ ०  में आयी टॉम क्रूज़ की फिल्म नाईट एंड डेज की रीमेक होगी, इस फिल्म में उनके साथ कटरीना कैफ नज़र आयेंगी । 
   इन दोनों फिल्मो के बाद ह्रितिक शेखर कपूर की फिल्म पानी में नज़र आयेंगे जो भविष्य में पानी की कमी पर आधारित होगी । इसके बाद वो फिल्म शुद्धि में नज़र आयेंगे जो धर्मा प्रोडक्शन में करन मल्होत्रा के निर्देशन में बनेगी जो ह्रितिक के साथ पहले भी अग्निपथ में काम कर चुके हैं । 
  ह्रितिक की आने वाली सारी फिल्मे पहले से ही किसी न किसी वजह से चर्चा में हैं और ये सभी फिल्मे पहले से ही किसी हिट फिल्म की तरह चर्चा में आ गयी है, देखते हैं ये फिल्मे ह्रितिक के लिए क्या ख़ास लेकर आती हैं 

Labels:

दिल्ली में फिर हुई जघन्यता की सारी हदें पार


दिल्ली में लगातार हो रहे अपराधों में एक और बेहद जघन्य अपराध जुड़ गया है, जब गाँधी नगर इलाके में एक पाँच साल की बच्ची के साथ बंधक बनाकर दो दिन तक बलात्कार किया, साथ ही उसे कई तरह की शारीरिक यातनाएँ दी जो अति बर्बर है लड़की की मेडिकल जांच में लड़की के अंदर से मोमबत्ती के टुकड़े और एक २०० मिली की बोतल निकाली गयी है, अब लड़की की हालत बेहद नाजुक बतायी जा रही है | लड़की कि हालत ज्यादा नाजुक होने कि वजह से उसे एक से दूसरे अस्पताल भेजा जा रहा है |
दूसरी तरफ इस मामले में एक और बेहद संजीदा मसला तब सामने आया जब बच्ची के पिता और परिजानो ने दिल्ली पुलिस पर ये आरोप लगाया कि उन्होंने बच्ची मिलने के बाद केस दर्ज कर कार्यवाही करने के बजाये उनसे २ हज़ार रूपये ले कर मामला रफा-दफा करने को कहा और साथ ही मीडिया से भी बात करने को माना किया | साथ ही परिजानो का ये भी आरोप है कि अगर पुलिस ने उनकी बच्ची को ढूंढने में फुर्ती दिखाई होती तो आज उनकी बच्ची सही सलामत हासिल हो सकती थी |
 सवाल अब ये उठता है कि जहाँ दिल्ली में सरकार इस वक्त महिलाओं कि सुरक्षा के लिये रोज नयी तरकीबें और सुविधाएँ इजात कर रही है वहाँ पुलिस का ये रवैया जनता पर क्या प्रभाव डालेगा, क्या अब देश की राजधानी की पुलिस इस लायक नहीं कि उस पर किसी प्रकार का भरोसा किया जा सके । 

Labels:

Tuesday, 16 April 2013

IPL Week 1: Bowler’s Dominated




In India it is the second cricketing event for which every Indian Cricket fan waits for a whole year. When bollywood Shahanshah Amitabh bachchan came in KBC, at 9PM traffic on road becomes very less and same goes for this cricketing event named IPL (Indian Premier League). It was started 5 years ago with the aim of finding new players for Indian Cricket and it not only helped Indian Cricket, it helped other countries also. Shane Watson, Yusuf Pathan, Ambati Rayadu, Sunil Narine are the findings of IPL.
When IPL starts its journey in 2008 no one ever thought that this would come so far .First three season of IPL were wonderful. But in its fourth season its rating went down and everyone thought that this would be the end of this most happening cricketing event of India. In year 2011 its TV rating also dropped and people started blaming that number of matches should be cut down for its existence.
We can’t get everyday according to our will, there are days when we have to work hard to get ourselves on track. Same theory apply for IPL also, it started on a high node and than in between faced problems and now it again coming back to its glory.
This year on 3rd April 2013 it started its journey. First match was between KKR and DD. Both started from where they left last year. KKR was last year champion and DD performed in the same way as they played in last year’s semifinal. KKR beat DD easily in the first match and showed that they will play this tournament as defending champions.
In the first week of IPL bowlers dominated the game, out of 10 matches fate of 9 matches were decided by bowlers. Whether its Kevin cooper for RR or Vinay Kumar for RCB, this IPL had felt the heat from bowlers in its first week. It was a bowler’s week, except the 10th match between MI and DD in which Dinesh Karthik and Rohit Sharma decided to get some respect for the community of batsmen.
Both of them played brilliant inning and first time in this IPL score of any team went above 200. The pitches were also helped bowlers and IPL-6 got its first superover in its first week. In 7thmatch between Sunrisers and RCB, at the end of the 20th over’s score of both team stayed on 130. In the superover Cameron White hit two huge sixes and Sunrisers scored 20 in their Supeover, in reply RCB able to score 15 runs. Dale Styen bowled a phenomenal superover otherwise 21 runs in 1 over was not a huge target for Gayle, who managed to hit only one six in that over.
In the first week of IPL Chris Gayle showed that he was ready to demolish the confidence of bowlers in this IPL. His inning of 93 off just 45 balls was one of the best he played till now in IPL. He was using a strategy which he initiated in last IPL , he remained unagitated and compose in few first over and when he get used to the conditions. He changes his gears very quickly and when batsmen like Gayle stayed on the wicket than it’s very difficult to get escape from their brutal hitting.
The most surprising thing about this week is that one of the strongest team in the IPL is at the bottom of the table and has no win registered in their account.
This was a bowlers dominating week and this increases the interest of crowd and cricket lovers in this IPL. Let’s hope that there will be more drama and excitement in coming week.

Sports Editor
RaftaarLive

Labels:

Monday, 15 April 2013

मेरी आँखों को इतना रुलाने का शुक्रिया।



मेरी ऐसी तो  तुझसे कोई चाह न थी लेकिन,
इस दर्द से मेरे दिल को दुखाने का शुक्रिया।
ऐसे ख्वाब कभी पले तो नहीं थे इस दिल में,
पर इस दिल को ऐसे सपने दिखाने का शुक्रिया।
चाहत हुई कि हर सपना सच की स्याह बने,
पर इन सपनों को कांच की तरह बिखराने का शुक्रिया।
रौशनी से डर लगता है, जगमग जहाँ ये चुभता है,
मुझे अंधेरों में इतना बसाने का शुक्रिया।
भीड़ में भी अब मुझे ये शहर अकेला लगता है,
इस दिल को इतना तन्हा बनाने का शुक्रिया।
जिन्दा है पर जिंदगी नहीं,ये हाल है जिंदगी का,
ऐसी जिंदगी को मुझसे मिलाने का शुक्रिया।
मेरी कलम कांपती है अब इन कागजों पर चलने से,
लिखावट भी धुल जाती है इन आंसुओं के घुलने से,
मेरी आँखों को इतना रुलाने का शुक्रिया।

Written By - Swati Gupta

Labels:

Saturday, 13 April 2013

सुविधायें ही होती है असुविधा का कारण

दूर तक अन्धकार छाया हुआ है कुछ भी स्पष्ट नजर नही आ रहा है ऐसा लग रहा है ,जैसे मै और वक्त एक ऐसी जगह आ कर रूक गये है जहाँ से कोई सुगम रास्ता नजर नही आ रहा है 
  कहते है गुजरा हुआ वक्त हमेशा अच्हा होता है मगर कभी-कभी गुजरे हुए वक़्त में हमने कुछ ऐसी गलतियाँ की होती है ,जिसकी वजह से हम उसे भुलाना ही बेहतर समझते है, पर अच्हा वक्त ही कम समय के लिये होता है उसके विपरीत चुभने वाली यादे देकर जाने वाला वक़्त हमेशा के लिए एक ऐसा दर्द देकर जाता है जो सिर्फ सहन किया जा सकता है मिटाया नही जा सकता । 
 आज दिन कुछ पहले जैसे नही, या फिर दिन पहले जैसे ही है पर मै शायद पहले जैसा नही ,लगता है गर्मी की काली रातों के बाद सर्दी की खिली हुई धूप निकली थी और फिर से ये भीषण गर्मी की रात सामने है । 
दुनिया को सच मे हँसा देने वाले व्यक्ति की शायद सबसे बड़ी कमजोरी ये होती है की वो खुद रो कर अपना गम हल्का नही कर सकता ,हँसते -हँसते वो इस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ उसके अपने आसूँ भी उसका साथ देने से इनकार कर देते है 
किसका दोष ,कौन जिम्मेदार विपरीत परिस्थितियाँ किसे दोषी बनाऊ ,शायद दोषी अनुकूल परिस्थितियाँ ही होती है जो मनुष्य इतनी सुविधायें प्रदान कर देती है कि वो अपने जीवन में असुविधाओं के यथार्थ धरातल से कोसों दूर होता जाता है और अंततः ऐसे स्थान पर जाकर विराजमान हो जाता है जहां वो सुविधाओं का सम्राट तो बन जाता है पर जीवन का फ़क़ीर हो जाता है । 

Labels:

Friday, 12 April 2013

यूपीए सरकार सत्ता में अब तक मेरी वजह से : नितिन गडकरी

  भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके नितिन गडकरी ने अपने होमटाउन में एक प्राइवेट पार्टी के दौरान एक खुलासा कर सभी को चौक दिया और सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है, उन्होंने कहा की एक प्रभावशाली नेता ने उनसे यूपीए सरकार को गिराने में मदद मांगी थी मगर मैंने मन कर दिया था । 
  गडकरी ने कहा जिस नेता ने उनसे पार्टी गिराने में मदद मांगी थी वो इतना प्रभावशाली है की वो अकेले ही पार्टी गिराने में सक्षम है लेकिन गडकरी ने सरकार न गिराने के पीछे का कारन नहीं बताया न ही ये बताया की उस नेता ने उनसे कब संपर्क किया था और गडकरी ने उस नेता का नाम बताने से भी किनारा कर लिया । 
  गौरतलब है कि गडकरी 2014 में नागपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं और करप्शन के आरोप लगने के बाद अचानक भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी छिन जाने से आहत गडकरी लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय राजनीति में जबरदस्त एंट्री चाहते हैं ।   

Labels:

Wednesday, 10 April 2013

दर्द चुपके से सहना यूँ सीखा है उनसे

नम निगाहों में रहना यूँ सीखा है उनसे,
दर्द चुपके से सहना यूँ सीखा है उनसे।

दर्द आँसू यूँ बनकर छलक से रहे हैं
दिल थामे हैं लेकिन तड़प से रहे हैं।
मैंने गिरकर संभलना यूँ सीखा है उनसे
दर्द चुपके से सहना यूँ सीखा है उनसे।

जो कदम बढ़ रहे थे वो थम से गए हैं
हम मंजिल से पहले ही रुक से गए हैं।
दूर मंजिल को तकना यूँ सीखा है उनसे
दर्द चुपके से सहना यूँ सीखा है उनसे।

मेरे ख्वाबों की तस्वीर सच बना दो रे कोई
मेरी मोहब्बत से मुझको मिला दो रे कोई।
सब दुआओं में कहना यूँ सीखा है उनसे
दर्द चुपके से सहना यूँ सीखा है उनसे।
Written By- Swati Gupta

Labels:

Tuesday, 9 April 2013

मोदी की हुयी भाजपा


भारतीय जनता पार्टी ने पार्टी के नवनियुक्त अध्यक्ष राजनाथ सिंह के नेतृत्व में अपनी नई संसदीय बोर्ड टीम घोषित कर दी है ,आगामी लोकसभा चुनाव में नैया पार लगे कि या नही ये तो तय समय ही बता पायेगा सन १९८० में संगठित भाजपा अपनी मुख्य विचारधारा हिंदुत्व और हिन्दुराष्ट्रवाद की छवि को भुनाने को तत्पर्य इस बार इसलिए उसने अपनी नई संसदीय टीम में आक्रामक हिन्दुत्ववादी चेहरों को अहमियत दी है | एक बात और दिलचस्प है कि ६ साल पहले मोदी को पार्टी के संसदीय बोर्ड से राजनाथ ने ये कहते हुए बाहर कर दिया था कि कोई अन्य  मुख्यमंत्री बोर्ड का सदस्य नही है | मगर इस बार संसदीय बोर्ड में तो मोदी वापसी हुई है ,उन्हें केन्द्रीय चुनाव समिति में भी जगा मिली है |

मोदी को अहमियत मिलने की ख़ास वजह यह है भी हो सकती है कि पार्टी में ऐसे काफी लोग है जो अगले आगामी लोकसभा चुनाव में उन्हें प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार रूप में पेश करना चाहता है ,इसलिए राजनाथ सिंह के लिए यह अनदेखी कर पाना मुश्किल रहा होगा ,इसी के साथ मोदी के करीबियों पर भी मेहरबानी कि कोई कोताही नही छोड़ी गयी ,अमित शाह मोदी के खासम -खास कहे जाने वाले गुजरात के  पूर्व  गृह राज्यमंत्री को महासचिव बनाया गया है ,अमित शाह के ऊपर सोहाराबद्दीन फर्जी मुठभेड़ काण्ड साजिश रचने के आरोप के कारण मंत्रिमंडल से हटाना और जेल जाना पड़ा था |शाह अभी जमानत पर बाहर हैं , राजनाथ सिंह इस चेहरे को शामिल कर पार्टी के किस -चाल और चरित्र का परिचय दिया है ?

पिछले लोकसभा चुनाव में अल्फसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने वाले वरुण गाँधी को महासचिव बनाया गया है | दूसरी ओर जसवंत सिंह ,यशवंत सिन्हा और रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं को इस संसदीय बोर्ड से दूर रखा गया है | कहीं ये मोदी का पार्टी के अन्दर बढ़ता कद तो नही है पर नई टीम की  पहली अग्नि परीक्षा कर्नाटक होगी ,हाल ही में हुए कर्नाटक के नगर निकाय चुनाव में पार्टी को मुह की खानी पड़ी है ,क्या मोदी कर्नाटक की बाज़ी पलट सकते हैं ? कर्नाटक के नतीजे अगले आम चुनाव में सिर्फ भाजपा कि सम्भावनाएं बल्कि मोदी की दावेदारी को भी प्रभावित कर सकते हैं वही पार्टी  के निवर्तमान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह पार्टी के नाथ सिद्ध होंगे ये देखना  भी रुचिकर होगा पर पार्टी को चुनाव के समय नाथ की नही दीनानाथ की जरूरत होती है और लोकतांत्रिक मिजाज में कुछ भी कहना अतिश्योक्ति होगा क्योंकि अंतिम निर्णय जनता पर निर्भय करता है |     

Labels:

Sunday, 7 April 2013

दिल्ली में नेताओं पर करोड़ों का कर्ज।



जी हाँ, आपको जान कर हैरानी होगी कि दिल्ली में 3346 नेता बकायेदार हैं और किस चीज के लिए? अरे उसी चीज़ के लिए जिसके बारे में आम आदमी सोच भी नहीं सकता।
जी हाँ, एक न्यूज़ चैनल के खुलासे से खबर मिली है कि दिल्ली में नेताओं के बंगले पर पहुँचने वाली बिजली और पानी का बिल बेचारे गरीब नेता जी चुका नहीं पा रहे हैं। हस्तियाँ कोई छोटी बड़ी नहीं हैं इन दिग्गजों के नाम सुनिए जरा। श्री लालू प्रसाद यादव पर 2,72,031 रूपए के बिल के बकायेदार है। राम विलास पर 1,18,542 रूपए, जगदीश टाइटलर पर 7,91,886 रूपए, वैन्केटस्वामी पर 11,39,667 रूपए, राजनाथ सिंह पर 2,80,581 रूपए बकाया हैं। इसके ऊपर की और बड़ी खबर ये है कि NDMC ने चुनाव का टिकट मिलते समय इन्ही नेताओं पर no dues दर्शाया था। जवाबदेही पर कहा गया कि हो सकता है कि कोई गलती हो गई हो। अब इन्हें कोई तो समझाओ कि भई गलती एक के साथ होती है हर एक के साथ नहीं होती। सबके साथ की गई एक ही गलती तो कुछ और ही बखान करती है क्योंकि आम आदमी के साथ तो ऐसी गलती आप कभी नहीं करते हैं न? आम आदमी के साथ तो आलम ये है कि अगर बिल एक महीने का भी बकाया है तो बिजली और पानी की सेवा तुरंत समाप्त और तो और बिल चुकाने के महीने भर बाद भी कहिये सुविधा दुबारा न शुरू की जाय क्योंकि आप लोग तो जरा व्यस्त हैं न बकायेदार नेताओं के घर पूरी सुविधा पहुंचाने में। मुझे केवल इतना पता है कि देश का संविधान नियम कायदे क़ानून केवल आम आदमी के लिए ब्रहम्मा द्वारा लिखा गया ग्रन्थ है जिसे लाख मजबूर होने पर भी वो झुटला नहीं सकता पर सरकार के इन नेताओं के सामने ये सब केवल चंद पन्नों के सिवा और कुछ भी नहीं।

जय हिन्द।
जय भारत।

Labels:

Saturday, 6 April 2013

निर्भया का जीवन खत्म करके अपना जीवन सवारना चाहता है आरोपी विनय शर्मा


 
16
दिसंबर को हुए गैंग रेप के एक आरोपी विनय शर्मा ने फास्ट ट्रैक कोर्ट में अर्जी दाखिल कर जेल के अंदर दूध के साथ पौषक तत्वों से भरपूर भोजन के साथ- न्यूज पेपर उपलब्ध कराने की मांग की और आरोपी विनय शर्मा के वकील ने अदालत में दलील थी कि उनके मुवक्किल ने इंडियन एयरफोर्स में क्लर्क के लिए आवेदन किया था उनके मुवक्किल की 7 अप्रैल को लिखित परीक्षा होनी है जिसकी तैयारी के लिये उसे पोष्टिक भोजन और पढ़ने के लिये न्यूज़-पेपर उपलब्ध कराया जाये | मामले की सुनवाई कर रहे फास्ट ट्रैक कोर्ट के अडिशनल सेशन जज योगेश खन्ना की अदालत ने जेल में आरोपी को जेल में सही भोजन और न्यूज पेपर उपलब्ध कराने के निर्देश के साथ अर्जी जेल प्रशासन को भेजने का आदेश दिया है, हाल ही में विनय ने जेल में परीक्षा की तैयारी के लिए ट्यूटर भी उपलब्ध कराने की मांग की थी। अदालत के निर्देश पर जेल प्रशासन ने आरोपी को जेल में गाइड करने के लिए ट्यूटर उपलब्ध करा दिया था |

  16 दिसंबर को हुए जघन्य अपराध के आरोपी को जहाँ देश दुनिया सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिये कवायद कर रहा है वहीँ आरोपी विनय शर्मा अपना भविष्य सवारने की कवायद में जूता हुआ है जिससे साफ़ साबित हो जाता की उसे अपने द्वारा किये अपराध का तनिक भी पश्चाताप नहीं है, दूसरी तरफ जहाँ जेल में कैदियों को खाना सिर्फ जीवनयापन करने के लिये दिया जाता है वहाँ इस तरह की मांग को पूरा करना कितना सही है | अगर एक बार मान भी लिया जाये कि आरोपी विनय एयरफोर्स की परीक्षा में पास भी हो जाता है तो क्या वो ये नौकरी कर पायेगा, ऐसी अवस्था में तो उसकी मांगे निराधार ही हैं |
  अगर सरकार इस तरह की बेतुकी मांगो को मानेगी तो वह दिन दूर नहीं जब अच्छा खाना और न्यूज़-पेपर पाने के लिये हर कोई जघन्य अपराध को अंजाम देने लगेगा |

Labels:

Wednesday, 3 April 2013

आखिर देशभक्त पर मज़ाक क्यों


 
हाल ही में बॉलीवुड में “भारत कुमार” के नाम से जाने वाले "मनोज कुमार" ने "शाहरुख खान" पर १०० करोड़ का मानहानि का मुकदमा कर दिया, इस पूरे मामले को समझने के लिये आपको थोडा पीछे जाना पड़ेगा, बात उस समय की है जब शाहरुख खान की फिल्म ओम शांति ओम रिलीज हुई थी जिसमे एक दृश्य में मनोज कुमार पर मज़ाक किया गया था तब मनोज ने इस पर आपत्ति जताई थी और फिल्म से ये सीन हटाने को कहा था जिसे मानते हुए निर्माता "फराह खान" ने वो सीन हटा दिया था , पर ये सारा मामला फिर से तब ताज़ा हो गया जब जापान में रिलीज होने के लिये फिल्म का वो प्रिंट चला गया जिसमे से मनोज जी का सीन नहीं हटा था और मनोज कुमार को ये बात अपनी बेजत्ति लगी और उन्होंने फिल्म पर १०० करोड़ का मुकदमा कर दिया है |

   आज मनोज जी इंसाफ के लिये कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं, पर सोचने वाली बात ये है कि आखिर फिल्म निर्माता ने फिल्म में क्यों इस तरह का सीन डालकर एक देशभक्त का इस तरह का अपमान किया | जैसा कि हम जानते हैं कि मनोज कुमार ने एक समय में बहुत सी देशभक्ती को प्रेरित फिल्मे बनायीं जो आज भी समाज के लिये मिसाल बनी हुई हैं और इसी कारण ही लोगो ने उन्हें प्यार से भारत ना भी दिया था |
  आज के समय में जहाँ देश के लिये कुछ करना तो दूर सोचना भी लोगो को बेवजह लगता है ऐसे में हमेशा देशभक्ती का संदेश देने वाले कलाकार बनाना आखिर कितना जायज है, भविष्य में हर फिल्म निर्माता को ध्यान में रखना होगा की वो ऐसा मज़ाक ना करें जो किसी देशभक्त को ठेंस पहुंचाए |

Labels:

Tuesday, 2 April 2013

उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश या अपराधों का प्रदेश ?



मेरा उत्तर प्रदेश बने उत्तम प्रदेश का स्लोगन सुनने में भले ही अच्छा लगता हो लेकिन असल सच्चाई यही है कि यह प्रदेश अब अपराधों का प्रदेश बन चुका है। प्रदेश की क़ानून व्यवस्था की धच्चियां उड़ चुकी है। चोरी, डकैती, बलात्कार, दंगे जैसी घटनाएं तो इतनी आम हो चुकी हैं कि हर सुबह के अखबार में रोज की ही तरह आने वाली खबरे तो जैसे रट सी गई हैं। अपराध का वो ऊँचा सा लठ्ठा गड़ा है कि उखाड़ने की बात तो दूर सोचिये, इसे देखने के लिए ही आपकी गर्दन को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। सोमवार को जिला मुख्यालय पर आयोजित बसपा की मंडलीय बैठक में जब नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पत्रकारों से समाजवादी की बदली हुई परिभाषा को बताया तो दिल बड़ा ही गदगद हो गया कि अब तो जो जितना बड़ा अपराधी है वो उतना ही बड़ा समाजवादी है। ये भले ही राजनीति की दुनिया में पार्टियों के एक दूसरे पर कसे हुए व्यंग क्यों न हो पर बात तो एक दम सटीक कही है भई। सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल में भले ही किये गए काम से जादा बड़ी लिस्ट किये गए वादों की हो पर उससे भी बड़ी लिस्ट अपराधिक घटनाओं की है। आंकड़ो की माने तो प्रदेश में छोटे बड़े कुल मिलाकर २३ साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं। घरों में पहुँचने वाला अखबार बलात्कार, चोरी, डकैती की ख़बरों से पटा रहता है। प्रदेश के प्रतापगढ़ के सीओ की हत्या, पास के गाँव में १६ मुस्लिम परिवार के घरों को जलाये जाने की घटना, रौनापुर में थाने में थानाध्यक्ष की पिटाई की घटना, ये साबित कर देती है कि उत्तर प्रदेश सरकार में जब थाने में बैठा कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं तो भला आम आदमी की क्या औकात ? भई हम तो राम भरोसे निकलते हैं घर से।

रफ़्तार लाइव 

Labels:

आखिर कसूरवार कौन ?



देश के हालात बहुत खराब है। सोचना जरा लाज़मी है कि आखिर कसूरवार कौन ? कर्तव्यपालन का ठीकरा आखिर हम कब तक दूसरों के सर फोड़ते रहेंगे और खुद के कर्तव्यों से उन्मुक्त रहेंगे ? कोई कहता है देश का राजा खराब है कोई कहता है देश की व्यवस्था खराब है। कोई अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता?
हर कोई अपने कर्तव्यों से उन्मुक्त होकर तमाशा देखना चाहता है केवल। आखिर हम हैं क्या?
एक ऐसी गहरी नींद की जनता है जिसे जगाने के लिए अन्ना जैसे नागरिक को आना पड़ता है। जब तक वो झकझोरता है तब तक हम अपने लिए लड़ते हैं पर जैसे ही वह शांत होता है हम भी चिर निंद्रा ले लेते हैं।
महिलाओं की स्थिति हमें तब समझ आती है जब कोई दामिनी सामने आती है। हमारी अंतरआत्मा अचानक चेतती है और हम हजारों मोमबत्तिया लेकर खड़े हो जाते है। और मोमबत्तियां खत्म होने के साथ की हमारी आँखों के सामने फिर से वही अँधेरा छा जाता है।
पुलिस और उनकी आदर्श पुलिस व्यवस्था हमें केवल उन ३ घंटों तक समझ आती है जब तक हमारे सोफे के सामने रखे टेलीवीज़न पर सिंघम जैसी कोई फिल्म चल रही होती है। और ३ घंटे के बाद हम फिर रास्तों पर छोटे-छोटे काम निकलवाने के लिए शौक से २० से १०० की पत्तियां इनके हाथों में थमाते नजर आते हैं और ये लेते हैं। ये लेते नहीं है जनाब हम देते हैं और फिर इन्ही को दोष भी देते हैं। जबकि गुनेहगार हम हैं। क्योंकि ये लेते हैं क्योंकि हम देते हैं।
नेता जी के भाषण और सुधार सम्बन्धी वादे मंच पर चलते रहते हैं और हम ताली बजाते रहते हैं और आकर सो जाते हैं। सरकार के ५ साल पूरे हो जाते है पर एक भी वादा पूरा होता नहीं दिखाई देता। जानते है क्यों ....? क्योंकि इन्हें सुनाना अच्छा लगता है और हमें सुनना अच्छा लगता है। सरकार जवाब नहीं देती क्योंकि देश की 1,241,491,960 करोड़ जनता सवाल नहीं करती।
हमारे समाज की कुरीतियाँ, कुप्रथाएँ, दोष, समस्याएँ हमें केवल तब और तब तक दिखाई देती हैं जब तक सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रम हमारे आँखों के सामने चलते हैं और फिर लम्बे समय तक ये सारे मुद्दे हमारे आँखों के सामने पड़े रहते हैं और हम अंधे बनकर खड़े रहते हैं। इन साड़ी बातों के बावजूद हम कर्तव्यपालन का ठीकरा दूसरों के सर फोड़ते रहते हैं।
देश जितना दूसरों का है उतना ही हर एक नागरिक का भी है  हम हमेशा आँख वाले अंधे बने रहे तो कभी समझ नहीं पायेंगे कि आखिर कसूरवार कौन ?
जय हिन्द।
जय भारत।
Written By- Swati Gupta

Labels: