Thursday, 28 February 2013

“रवी भाटिया” ले कर आ रहे हैं “टू लिटिल इंडियन्स”


स्टेनली का डब्बा,चिल्लर पार्टी और आई ऍम कलाम जैसी फिल्मो ने जिस तरह लोगो को मनोरंजन के साथ-साथ एक सन्देश भी दिया है, अब उसी की तर्ज़ पर निर्देशक “रवी भाटिया” ले कर आ रहे हैं “टू लिटिल इंडियन्स” जो हमारे समाज को एक नयी सकारात्मक सोंच देगी |

Director - Ravi Bhatia






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8 मार्च को STOP ACID ATTACKS ऑनलाइन पोर्टल का शुभारम्भ



मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को STOP ACID ATTACKS की वेबसाईट को प्रसारित किया जाएगा ,यह जानकारी एसिड सर्वाइवर की मदद के लिए लम्बे समय से कार्य कर रहे आलोक दीक्षित ने दी| उन्होंने बताया की मार्च को हिंदी भवन के सभागार में एसिड सर्वाइवर की मदद के लिए एक वेब पोर्टल लांच करेंगे जो कि केवल और केवल एसिड सर्वाइवर्स की जानकारी एकत्र करेगा और इसके जरिये हम पीड़ितों और समाज के बीच एक ब्रिज का काम करेंगे। आलोक ने बताया की हमारी मांगे इस अभियान के जरिये क्या है -

Stop Acid Attacks अभियान के जरिये हमारी मांगें- 

पीड़ित महिलाओं को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाए और इलाज का सारा भार सरकार उठाए। 
तेजाब के हमलों की घटनाओं से निबटने के लिए नया कानून बने। भारतीय दंड संहिताभारतीय साक्ष्य कानून और अपराध प्रक्रिया संहिता में भी पर्याप्त संशोधन हो। 
जांच अधिकारी अपनी पंद्रह दिनों के भीतर हीं जांच पूरी करें। ऐसा न करने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही हो। 
इन केसेज को फास्ट ट्रैक सुनवाई करके तीन महीनों के भीतर निपटाया जाए। 
इन घटनाओं को रेयरेस्ट आफ द रेयर मानते हुए अपराधी को उम्र कैद की सजा का प्रावधान हो। 
इन मामलों में पुनर्वास की कठिन समस्या को समझते हुए सरकार पीड़ित के लिये सरकारी नौकरी और रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था करे।

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Tuesday, 26 February 2013

कमांडो करेगा रियल स्टंट



  अक्सर बॉलीवुड की फिल्मों से लोगो को शिकायत रहती है कि यहाँ एक्शन फिल्मो में एक्टर खुद स्टंट नहीं करते बल्कि किसी भी मुश्किल स्टंट के लिए अपने बॉडी डबल का प्रयोग करते हैं, पर "विद्युत् जमवाल" की आने वाली फिल्म "कमांडो" इन सब बातो को नकार देगी जो मार्च में दर्शकों के सामने आएगी ।
  फिल्म में वादी में कूदने वाले स्टंट के अलावा "विद्युत्" ने सारे स्टंट खुद ही किये है जैसा की फिल्म के ट्रेलर में बताया भी गया है, फिल्म में स्टंट इतने बेहतरीन है कि अभी तक ऐसे स्टंट बॉलीवुड में शायद ही किसी ने किये होंगे । गौरतलब है की "विद्युत्" इससे पहले "जॉन अब्राहम" के साथ फिल्म "फ़ोर्स" में खलनायक के रूप में नज़र आ चुके हैं जहां उन्हें अपने  दमदार अभिनय के लिए खूब तारीफे बटोरी थीं । 
  अब देखने वाली बात ये होगी की इस फिल्म के जरिये "विद्युत्" दर्शको के दिलो में अपनी किस प्रकार की छवि बनाने में कामयाब होते है, क्यूंकि इससे पहले भी कई अभिनेताओं ने कई बेहतरीन स्टंट करके अपनी एक माचो इमेज दर्शको के सामने रखी है । 
 
नीचे क्लिक करके देखें कमांडो का ट्रेलर

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Monday, 25 February 2013

आखिर तुम ही बताओ "मै तुमसे प्यार क्यों करूँ ?"


मै तेरा ऐतबार क्यों करूँ, तेरा दीदार क्यों करूँ?
तुम मेरी सारी हसरतों का खून करते हो,
तो बताओ "मै तुमसे प्यार क्यों करूँ ?"

तू साथ छोड़ देगा मेरा, दुनियादारी के खौफ से,
तू ही बता, मै तेरा इन्तजार क्यों करू ?

मेरे दिल का ये खौफ,बस तू ही मिटा सकता है,
पर तू आएगा इस बात पर विश्वास क्यों करूँ ?

दिल कहता है हर पल, तेरी हर याद के बाद
कि इन लम्हों को यूँ तुझ पर, बर्बाद क्यों करूँ?

दिल तो बच्चा है जी, कुछ भी कहता है जी,
इस नादां दिल की बात का ऐतबार क्यों करूँ?

आखिर तुम ही बताओ "मै तुमसे प्यार क्यों करूँ ?"

Written By- Swati Gupta

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Saturday, 23 February 2013

वो खुदा तू खुद भी हैरान होगा शायद।



ऐ खुदा तू खुद भी हैरान होगा शायद।
कि तेरी बनाई दुनिया में ये क्या हो रहा है?

ये जमीं खामोश है और आसमां रो रहा है,
तेरा बनाया हुआ प्यार बदनाम हो रहा है।
वो सिसक-सिसककर दम तोड़ रहा है किसी की आगोश में,
जो तेरी छाँव में पला था, वो जलकर राख हो रहा है।
 

तू देखता ही रह ऊपर बैठकर तमाशा,
कि किस कदर तेरे प्रेम का अपमान हो रहा है।
सब मिशालें, सब परिभाषाएं प्रेम की ख़ाक हैं मेरे सामने,
कोई पवित्रता नहीं इसमें, ये नापाक हो रहा है।
 

दिल का हर टुकड़ा अब, जख्म देता है इस रूह को,
क्यों बनाया है तूने दिल, हर दिल में सवाल हो रहा है।

 
Written By- Swati Gupta

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Friday, 22 February 2013

हिन्दू होने पर नहीं इंसान होने पर करो गर्व



आजकल फेसबुक पर हिन्दुओं की खोज चल रही है? इसके लिए हिन्दुओं को ललकार कर या कहें कि जोर देकर कहा जा रहा है, अगर आप हिन्दू हैं तो इस फोटो को लाइक करें. जिस पर लिखा रहता है, हमे हिन्दू होने पर गर्व है. देखते हैं कि फेसबुक पर कितने हिन्दू हैं. ये सब देखकर ऐसा लगता है, लाइक कर दो, नहीं तो हम हिन्दू नहीं रहेंगे. समझ नहीं आ रहा ये अभियान क्यों चलाया जा रहा है है? क्या इसे लाइक करके ही हिन्दू होने की पुष्टि होगी? क्या ये डर तो नहीं सता रहा कि कहीं हिन्दू फेसबुक पर अल्पसंख्यक न हो जाएँ? समझ नहीं आ रहा ये फेसबुक पर गोलबंदी क्यों चल रही है? दिमाग इतना खुराफाती है कि ये आर के डबल एस की थ्योरी लग रही है? चुनावी साजिश की भी बू आ रही है. कहीं ये गोलबंदी मोती के लिए तो नहीं की जा रही. खैर जो भी हो मेरे देखे जाने तक करीब ३ हज़ार ने ही हिन्दू होने की पुष्टि की थी. यानि कुछ लोगों के लिए ये अभी हिन्दुओं का छोटा सा समूह जो हिंदुत्व की बात करता है, और वो इस समूह को और बड़ा करना चाहते हैं. 
जहां तक गर्व की बात है? तो पहले हम इंसान होने पर क्यों न गर्व करें? धर्म पर ही पहले क्यों गर्व किया जाए. क्यों गर्व करूँ ? मै भी हिन्दू घर में ही पैदा हुआ हूँ, क्या इसीलिए गर्व करूँ? क्या इसीलिए चिल्लाऊ कि मुझे हिन्दू होने पर गर्व है. मुझे तो गर्व से ज्यादा यहाँ के जातिवाद और महिलाओं की स्थिति, धर्म के नाम पर औंर किलिंग और कु-प्रथाओं को को देखते हुए शर्म भी बहुत आती है, तो क्या लिखूं? मुझे हिन्दू होने पर शर्म है?

लेखक - आशीष तिवारी 

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Thursday, 21 February 2013

कुछ इनसे भी सिखिये


"खेलोगे कुदोगे बनोगे खराब,पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब" इस लाईन को मैं बचपन मे कई बार दुरदर्शन पर एक विज्ञापन मे हमेशा सुनता था. अगर कुछ साल पिछे जाऊ तो लगभग पूरे भारत के लोग इस बात को मानते थे. फिर धीरे-धीरे स्थिती बदलती गई और एक खेल ने तो इस लाईन को पूरा ही बदल दिया.इस खेल का नाम है “क्रिकेट”. क्रिकेट की शुरुवात तो इंग्लैड मे हुई थी.परंतु अगर इसे भारत का अनौपचारिक राष्ट्रीय खेल कहा जाये तो गलत नही होगा.

1983 मे भारत ने जब कपिल देव की कप्तानी मे विश्व कप जीता तो इस देश मे क्रिकेट की एक लहर सी दौड गई. हर किसी का सपना क्रिकेटर बनने का था और इसी सपने को कही ना कही अपने दिल मे संजोकर चार ऐसे क्रिकेटर भारत के लिये खेले जिन्होने क्रिकेट जगत मे तो अपना नाम किया ही साथ ही अपनी खूबियो से हर किसी को खेल और बाकी क्षेत्रो मे आगे बढने का एक जज्बा भी दिया.

चलिये देखते है इन क्रिकेटर की उन खूबियो को जिनसे हम बहुत कुछ सिख सकते है.


असफलता से सफलता की बीच की दूरी मे सबसे पहले हमे असफल होने के डर निकालना पडता है.डर को दूर भगाना आसान नही होता है.किस तरह इस डर को दूर भगाये ये आप क्रिकेट के भगवान सचिन तेंडुलकर से सिख सकते है. 15 नवंबर 1989 को टेस्ट क्रिकेट मे डेब्यू करने वाले सचिन को चौथे टेस्ट मे वकार यूनिस की एक गेंद नाक पर लगी थी.सचिन की नाक से काफी खून निकल रहा था..दुसरे छोर पर उस वक्त नवजोत सिह सिद्धू खडे थे.इस बात का जिक्र करते हुये वो कहते है “मुझे उम्मीद नही थी के वो उठ कर वापस खेलेगा. मै दुसरे छोर पर वापस जाने लगा तभी मैंने सुना मै खेलेगा, ये शब्द सचिन के थे.” सचिन ने डर को दूर भगाया और खडे हो गये वकार यूनिस की तेज तर्रार गेंद को खेलने के लिये. उन्होने अगली ही गेंद पर एक शानदार स्ट्रेट ड्राईव लगाकर चार रन बनाये थे. उस दिन अगर सचिन अ‍गर डर कर सफलता की ओर बढते अपने कदमो वापस ले लेते तो शायद वो आज दुनिया के महान खिलाडी नही बनते.सचिन से हमे सिखना चाहिये के सफलता की मंजिल पर हमेशा निडर होकर आगे बढना चाहिये.सचिन के लिये सिर्फ एक खेल नही जीने का एक जरिया है.ये बात सचिन की इस खेल प्रति पूर्ण निष्ठा को बताती है.

जिस तरह सिक्के के दो पहले होते है ठीक उसी तरह हर बात के भी दो पहलू होते है एक सकारात्मक और दुसरा नकारात्मक. ये हम पर निर्भर करता है के हम जिंदगी मे किस पहलू को चुन कर आगे बढते है.कई बार हम असफल होने पर चीजो के अभावो की बात करते है. हमारे पास ये किताब नही थी,हम बिमार थे ऐसे कई बहाने स्टूडेंट्स कम नबंर आने पर बनाते है.परंतु अगर हम सकारात्मक सोच के साथ आगे बढे तो हमे ऐसे बहानो की जरुरत नही पडेग़ी.अभावो को कैसे सकारात्मक सोच के साथ हम अपनी ताकत मे बदल सकते है.


इसका उदाहरण भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने हमारे सामने पेश किया है. गांगुली कलकत्ता(अब कोलकाता) के जिस मैदान मे प्रेक्टिस करते थे वहा पर लेग साईड मे लोगो के घर की खिडकीया खुलती थी. इसी कारण उन्हे हर शाट आफ साईड मे मारने पडते थे.इसके कारण गांगुली आफ साईड मे तो काफी स्ट्रांग हो गये परंतु लेग साईड उनका थोडा कमजोर रहा. परंतु गांगुली ने अपनी लेग साईड की कमजोरी के बारे मे नही सोचा और अपनी आफ साईड की ताकत को लेकर आगे बढते रहे. अपने पहले ही दौरे पर इंग्लैड के खिलाफ गांगुली ने लगातार दो टेस्ट मे शानदार दो शतक लगाये.गांगुली को पूरा क्रिकेट जगत आफ साईड का भगवान कहता है.गांगुली अगर पहले ही ये सोच लेते के मै लेग साईड मे कमजोर हू तो शायद ही वो कभी इतना क्रिकेट खेल पाते.


सफलता पाने के लिये जो सबसे अहम कुंजी है वो है मेहनत.मेहनत करके आप किसी भी क्षेत्र मे सफल हो सकते हो. मेहनत से किस तरह आप अपने आप को महान बना सकते हो इसका उदाहरण देखने के लिये हमे भारतीय क्रिकेट टीम की “दिवार” रह चुके, “मिस्टर डिपेंडेबल” से सिखना होगा. सचिन,सौरव और द्रविड मे से सिर्फ द्रविड ही ऐसे खिलाडी है जिनके पास सचिन और सौरव जितना टेलेंट नही था.द्रविड ने अपनी मेहनत,लगन और धैर्य के जरिये अपने आप को इन दोनो महान खिलाडीयो के स्तर तक पहुचाया है. हम चाहे कितनी भी तरक्की कर ले पर आगे बढते रहने के लिये मेहनत हमेशा करनी होती है.इसका जीता जागता सबूत है राहुल द्रविड.शुरुवात मे द्रविड को सिर्फ टेस्ट बल्लेबाज़ माना जाता था. परंतु उन्होने अपने खेल पर मेहनत की और एकदिवसीय क्रिकेट मे नबंर 3 की पोजिशीन पर खेलते हुये भारत को कई मैचो मे जीत दिलाने मे अहम भुमिका निभाई. जब टीम को विकेट कीपर की जरुरत पडी द्रविड ने विकेटकीपिंग की,जब ओपनर की जरुरत पडी ओपनिंग की.अपने आप को हर रोल मे ढाल लेने की इस खूबी से हमे ये सिखना चाहीये के किस तरह हमे हर परिस्थिती के अनुसार अपने आप को ढाल लेना चाहीये.

अब तक हमने भारतीय क्रिकेट टीम के महान बल्लेबाजो के बारे मे बात की और देखा के उनकी खूबियो से हम काफी कुछ सिख सकते है.परंतु अगर अंत मे हम भारत के जुझारु और आखिर तक हार ना मानने वाले गेंदबाज़ के बारे मे बात ना करे तो शायद ये लेख अधुरा रह जायेगा.


मै बात कर रहा हू भारत की ओर से सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले अनिल कुबंले की, जम्बो जी हा इस नाम से मशहूर इस लेग स्पिनर ने जब क्रिकेट खेलना शुरु किया तो सबने कहा के इसकी गेंद मे स्पिन काफी कम है और ये तेज़ गती से गेंद फेकता है.परंतु कुबंले इन सब बातो से परेशान नही हुये.बेशक उनकी गेंदो मे मुरली और वार्न जैसी स्पिन नही थी.पर उनकी गेंदबाजी की लाईन और लेंथ एकदम सटीक रहती थी.अनुशासन और एक्रागता का इससे अच्छा मेल शायद ही कही देखने को मिलेगा.अनिल कुबंले का आखरी दम तक मैदान मे जीत के लिये कोशिश करने का उनका जज्बा उन्हे कई खिलाडीयो से अलग करता था.वेस्टइंडीज मे जबडा टूट जाने के बाद मैदान मे आकर ब्रेन लारा का विकेट लेना हो या श्रीनाथ के साथ बेंगलौर(अब बेंगलुरु) मे 52 रन की मैच जिताऊ साझेदारी हो.कुबंले का आखिर तक हार ना मानने का जज्बा लाजवाब था.इस जज्बे से कुबंले हमेशा ये सिखाते थे के अगर आप मन मे ठान लो तो हर मुश्किल डगर आसान हो जाती है.
इन चारो खिलाडीयो मे जो खूबिया है उसे आप सिर्फ अपनी स्टूडेंट लाईफ मे ही नही,बल्कि जिंदगी के हर पहलू मे अपना सकते है.चारो खिलाडी की हर खूबी हमे हर कदम पर कैसे मुश्किलो से पार पाना है ये सिखाती है.वैसे तो कई ऐसे लोग है जिनसे हम सफल होने के गुर सिख सकते है. परंतु क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो भारत मे सबसे ज्यादा देखा और खेला जाता है और ये चारो खिलाडी पिछ्ले एक दशक से भी ज्यादा वक्त से मैदान पर खेल रहे थे.जिसमे सचिन अभी भी टेस्ट क्रिकेट खेल रहे है.हमे सिर्फ इनके अच्छे प्रदर्शन पर खुश नही होना है ना ही इनके खराब प्रदर्शन पर अपना गुस्सा जाहिर करना है. हमे ये सिखना होगा के कैसे और क्यो ये इतने महान बने और हर बार अपने स्तर को बढाते ही चले गये.

By - Chirag Joshi

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Wednesday, 20 February 2013

पुलिस कारनामा भागो भागो पुलिस आई ,पुलिस आई ...........



भागो भागो पुलिस आई ,पुलिस आई ...........आपने किसी चोर के मुंह से तो ये बात सुनी होगी पर आजकल हर आम आदमी यही कह रहा है। जिसकी रक्षक लोग शायद पुलिस को ही कहते हैं। पुलिस की बर्बरता आजकल हर तरफ नजर आ ही जाती है। वो दरअसल बात ये है न निर्दोष भीड़ और परेशान आदमी पर लाठी बरपा के काबू पाना काम है इनका। अब आप तो समझदार हैं ही क्या समझाए आपको।
इसके द्रश्य अबतक हमने केवल टेलीविजन पर ही देखे थे पर आज सामना भी हो गया। दरअसल बात है कानपुर नगर की, जहाँ चौराहे की भीड़ और जाम को नियंत्रित करते-करते पुलिस कैसे खुद अनियंत्रित हो गई इसका नजारा मैंने देखा।
चौराहे पर एक स्कूटर सवार अपने स्कूटर पर कपडे के कुछ गत्ते लेकर निकल रहा था कि एक पुलिसकर्मी ने उसे रोक लिया और मै शायद दूर खड़ी उनके इशारों को समझने की कोशिश कर रही थी। काफी मशक्कत के बाद मै केवल इतना ही समझ पायी कि स्कूटर पर सवार वह कोई दुकानदार था जो उनसे लगातार उसे छोड़ने की विनती कर रहा था और पुलिसकर्मी लगातार अपने तेवर चढ़ा रहा था। बदले में स्कूटर सवार को मैंने उसे दो सौ-सौ की पत्तियां देते देखा। उस बेचारे का तो दिन हो गया। छोटे दुकानदारों की दिन भर की मशक्कत के बाद कमाई ही इतनी होती है। बात यही ख़तम हो जाती तो कोई बात नहीं थी। पर इसके बाद का नजारा काबिले तारीफ था। बगल से एक नीलीबत्ती वाली गाड़ी निकली जिसकी सीट पर शायद शराब की बोतलें रखी थी। गाडी को रोकने की मजाल किसमे थी उल्टा जनाब सलाम ठोके खड़े थे। गाडी गुजर गई और मै वही खड़ी अपने देश के जाबाज पुलिसकर्मी की पीठ मन ही मन ठोकती रही।  मैंने कानून की किताबें तो जादा नहीं पढ़ी पर इतना तो जानती ही हूँ कि ये जो हुआ था वो कानून की भाषा में भी गलत था। पर काश इन्हें कोई मानवता की किताब पढ़ा पाता। अब क्या बताएं इन्हें तो बीच सड़क ..............खैर! अपशब्दों का प्रयोग मै बिलकुल नहीं करुँगी। भई .. ये लोग अपनी गरिमा को बेशक भूल जाएँ पर मै अपनी गरिमा बनाये रखूंगी।


Written By- Swati Gupta

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ये तो सबसे बड़े नेता है भाई......!



पहचानिए जरा किसकी बात हो रही है। अजी बात हो रही है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश यादव जी की। महोदय जी ने 2013-2014 का बजट पेश क्या किया जनता जनार्दन के तो होश उड़ गए है। जनता चकराई हुई है। वो बात जरा ये है जबसे महोदय मुख्यमंत्री बने है तबसे इतने वादे इतने वादे कि बस पूछो मत ... पर अब चकराना तो लाजमी है आखिर ये वादे पूरे भी तो होते दिखे कहीं।
बजट के कुछ पहलुओं पर नजर फिरा ही ली जाए। प्रस्तावित बजट में किसानो पर उपकार ये किया गया है कि उन्हें शायद अब कर्ज सस्ता मिलने लगेगा। बेचारा किसान कर्ज लेकर जिन्दगी भर उसी कर्ज के बोझ में मर भी जाएगा क्योंकि बजट में अनाज भंडारण की कोई व्यवस्था नहीं की गई है और मंदी सुधारने की कोई भी नीति नहीं दिखी तो अब बेचारे किसान का भला कैसे होगा ? अखिलेश जी अगर वृद्ध किसानो की पेंशन पर थोडा सा भी ख्याल कर लेते तो शायद अच्छा रहता।
बजट में बेरोजगारी भत्ते पर भी चर्चा की है अखिलेश जी ने। पर शायद उन्हें ये कोई बता पाता कि लोगो को रोजगार चाहिए कोई बेरोजगारी भत्ता नहीं। प्रदेश में लगभग 72,825 शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पर पिछले दो साल से राजनीति चल रही है पहले बसपा सरकार अब सपा सरकार। इस भर्ती प्रक्रिया के नाम पर करोड़ों रुपया सरकार अन्दर कर चुकी है उम्मीदवार लगातार परेशान हैं। पर सरकार इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। सरकार अगर बेरोजगारी भत्ता बाटने के बजाये बेरोजगारी की समस्याओं के निवारण पर ध्यान दे तो शायद सच में मेरा उत्तर प्रदेश एक उत्तम प्रदेश बन जाए।
बजट में थोड़ी कृपा गंगा माँ के ऊपर भी दिखाई गई है रिवर फ्रंट डेवलप्मेंट योजना और सिवरेज के लिए 70 करोड़ रुपये खर्च होगे। अब ये तो सभी जानते है कि आज तक करोडो रुपया गंगा माँ के ऊपर खर्च हो चुका है और गंगा माँ और मैली ही हुई हैं। कही ऐसा न हो फिर से जनता का 70 करोड़ रुपया गंगा माँ की धारा में प्रवाहित कर दिया जाए और गंगा माँ रोती ही रह जाए।
अब गंगा माँ रोए या न रोए उनकी संताने यानी कि उत्तरप्रदेश के वासी अपनी किस्मत पर रोते ही नजर आने वाले हैं क्योंकि वादे तो अनेक है पर पूरे होने में जरा खेद है। हाँ ये सोच के दिल को दिलासा  दिया जा सकता है कि मंत्रियों का तो काम ही है वादे करके मुकर जाने का।

Written By- Swati Gupta

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Monday, 18 February 2013

शीला ने पीएम से कहा दिल्ल्ली पुलिस सुरक्षा देने में सक्षम नहीं



दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने फिर एक बार दिल्ली पुलिस को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है उन्होंने पीएम को चिट्ठी लिखकर कहा की १६ दिसम्बर को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद भी पुलिस अभी तक दिल्ली की महिलाओं को सुरक्षा देने में असफल रही है १३ फरवरी को लिखे पात्र में शीला ने प्रधानमन्त्री से कहा कि सुरक्षा आयोग क़ानून और व्यवस्था बनाने में दिशानिर्देश तय करता है उसके सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये | पत्र में दिल्ली पुलिस कि आलोचना करते हुए उन्होंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार के इस्तीफे कि भी मांग कि थी, उन्होंने इस पर भी खेद जताया कि पुलिस के कामकाज पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है, क्यूंकि यह गृह मंत्रालय के सीधे नियंत्रण में है |
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दिल्ली पुलिस दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध के मामलो पर रोक लगाने में नाकाम रही है मगर शीला दीक्षित को इस बात का भी बेहद अफ़सोस है कि दिल्ली पुलिस उनके नियंत्रण में नहीं है |

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Sunday, 17 February 2013

जलेबी खायी तो समझो शादी पक्की



जलेबी देने का मतलब प्रणय निवेदन। शायद ही यह बात किसी को समझ में आए, मगर सच है। क्या कोई उलझी सी जलेबी भी किसी की प्यार की उलझन को सुलझा सकती है जी हां, यदि गौंड समाज का ठाठिया उत्सव हो तो समझ लीजिए कि जलेबी की आड़ में एक प्रेम कहानी परवान चढ़ रही है। यूं तो किसी को जलेबी खिलाना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन आदिवासियों और उनमें भी खासकर गौंड समाज में यदि कोई नौजवान किसी कन्या को जलेबी दे तो इसका मतलब है कि वह लड़की को अपना प्रणय प्रस्ताव भेज रहा है और अगर लड़की उसे खा ले तो समझ लेना चाहिए कि लड़की ने उस प्रणय निवेदन को स्वीकार कर लिया है। 
दरअसल इस समाज में प्रेम की भाषा समझने के बाद लड़के को उस लड़की को भगा ले जाना होता है और फिर बज उठती है शहनाई। एक बार भाग जाने के बाद ऐसे प्रेमी युगल को दोनों पक्षों के परिजनों की स्वीकृति मिलना लाजिमी होती है और फिर इनके ब्याह की रस्म पूरी कर दी जाती है।


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Thursday, 14 February 2013

द्रोपदी यदि पांचाली है तो फिर यह कौन?



महाभारत काल में पाण्डवो की पत्नि द्रोपदी को पांचाली कहा जाता था। इसका कारण यह था कि द्रोपदी के पांच पति थे, पर देश के हृदय प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर सटे एक गांव का नजारा कुछ अलग ही है।
कन्याओं की कमी के चलते यहां एक ही परिवार के सारे भाईयों से शादी करती है दुल्हन! जी हां यह सच है। इस गांव में एक दुल्हन के आठ पति हैं।
भारत में एक ऐसी जगह जहां एक बड़ी अजीब प्रथा चली रही है। यह प्रथा है मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा से लगे मुरैना कि, जहां एक दुल्हन एक ही परिवार के भाइयों से शादी करती है।
शादी के बाद वो बारी बारी से उन पुरुषों के साथ रहती है। सुनने में ये बड़ा अटपटा लगेगा, पर ये सच है।
ऐसा रस्म या खुशी से नहीं बल्कि मजबूरी में किया जा रहा है। यहां बसे एक जाति एवं धर्म विशेष के लोगों में लड़कियों की कमी के चलते इस गांव के लोगों ने ये नियम बनाया है।
इसके तहत गांव के जिस भी घर में लड़कों की संख्या एक से ज्यादा है वे सभी मिलकर सिर्फ एक ही लड़की से शादी करेंगे।
इसके चलते गांव के लगभग सभी घरों में एक ही बहू है जबकि उसके पतियों की संख्या एक से ज्यादा है।
यदि परिवार का कोई भाई अकेले शादी कर दुल्हन लाता है तो उस पर उसके भाइयों का भी बराबर का हक होगा।
उनके अनुसार पूरे गांव में गिने चुने परिवार ही ऐसे हैं जिनमें किसी लड़की का एक ही पति है। वरना पिछले कुछ सालों में जिनती भी शादियां हुई हैं उनमें हर लड़की के एक से ज्यादा पति हैं। कई लड़कियां तो ऐसी हैं जिनके आठ पति भी हैं।

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Wednesday, 13 February 2013

तो क्या अब संसद में गूंजेगे हंसी और ठहाके



राजू श्रीवास्तव जो की किसी भी मुद्दे को अपनी बेहतरीन नजरिये के जरिये अभी तक मजाकिया बनाते आये है अब वो कानपूर से समाजवादी पार्टी के लिये लोकसभा से चुनाव लड़ेंगे हालांकि पहले भी कई बार उन्हें कांग्रेस की तरफ से ऐसे ऑफर मिल चुके है पर उन्होंने समाजवादी पार्टी को ही अपनी राजनितिक शुरुवात के लिये चुना है, एसपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रामगोपाल यादव ने बताया कि पार्टी ने अपने लोकसभा प्रत्याशियों की एक और सूची जारी की हैजिसमें कानपुर की महत्वपूर्ण सीट पर राजू श्रीवास्तव को उम्मीदवार घोषित किया गया है |

गौरतलब है की राजू कानपूर के ही रहने वाले है और उन्होंने यहाँ अपने बहुत कठिनाई के दिन गुजारे है जब की वो काम की तलाश में थे अब जब राजू कानपूर से चुनाव लड़ेंगे तो उनका केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से मुकाबला होने की प्रबल सम्भावना है | देखने वाली बात अब ये होगी कि जीवन की छोटी-छोटी बातों से हास्य को जन्म देने वाले राजू राजनीति में क्या कमाल दिखा पाते है, हालांकि राजू एक प्रसिद्ध हास्य कलाकार जरुर हैं पर ये जरूरी नहीं की हास्य की दुनिया की तरह ही राजनीती में भी उनका जादू चल पाये |

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Aaron Swartz - The Robin Hood



The world is a poorer place with the death of Aaron Swartz, the 26-year-old computer genius and zealous advocate of free public access to knowledge and content on the Internet. Among other things, he was a Robin Hood of modern times, who fervently believed that if information is power, then that power should be freely available to people across the globe. And if that meant freeing up, by whatever means, the information kept behind pay walls, so be it. But the methods the digital activist adopted were not always in line with law. If downloading 4.8 million articles from the digital library, JSTOR in order to distribute them freely was not legally right, the prosecution’s steely determination to use a sledgehammer to punish him was completely wrong. In the end, this overkill snuffed out the life of a brilliant young man. But even in death, Swartz has achieved something truly remarkable — he has galvanized the scientific community into realizing the importance of free access to academic work. The outrage by scientists has manifested itself in several ways, one of which perfectly reflects his ideals. Opposing the “ privatization of knowledge,” researchers have begun sharing their copyright-protected work on Twitter as a tribute to Swartz, using the hash tag #PDF tribute. While it perfectly resonates with his agenda, it may not be legally tenable to do this for long, unless the copyright rests with the authors. Hence there is a need to channel the emotion of scholars to finding a permanent solution. As Michael Eisen, co-founder of the Public Library of Sciences (PLoS) tweeted, “real #PDF tribute shouldn't be putting your pay walled papers online, it should be never letting them go behind a pay wall again.”
In a parallel development, with nearly 60,000 petitions, the U.S. administration is coming under increasing pressure to quickly consider providing open access to all papers arising from taxpayer-funded ­ research. Currently, only the National Institutes of Health (NIH) has sucha policy in place. The least the U.S. government can do to mitigate the indignation is by quickly acting on the pending Federal Research Public Access Act, that would make ‘green open access’ mandatory for all federally-funded research. Moreover, other countries have already instituted similar policies. For instance, starting this April, all papers arising from Research Councils UK funding will perforce be ‘gold open access.’ Effective January 1, 2013, all results of research funded by the Australian Research Council ­ will become open access within 12 months of publication. These policies will not set free the locked-up results, but will at least prevent future work from hiding behind pay walls.


By-Sumit Sharma(Writer is a student from Delhi University)

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