ये बर्बाद ऩज़ारे
मजबूर है ज़िन्दगी आम मुफलिसी के अँधियारों में ,
थिरकता है सुकून केवल यहाँ सत्ता के गलियारों में ,
उठता है जब कभी शोर गरीबी के कुचले पैमानों में ,
छिपती है कातिल नीयत कहीं शराफत के मैखानों में ,
मरती है जनता रोज़ तड़प उम्मीद के झूठे वादों में ,
भटकता है मेरा ये देश हमदर्दी में लिपटे छलावों में ,
जलता है वजूद –ए- हिंद यहाँ अपने ही मकानों में ,
सिसकती है सोने की चिड़िया बर्बाद इन नज़ारों में.......
लेखक-अंकुर सहाय
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