स्त्री अस्मिता पर उठते प्रश्न
साल का अंत आते-आते देश में महिला की अस्मिता और सुरक्षा पर बढ़ते हमलों का प्रश्न अखिल भारतीय जनाक्रोश का विषय बन गया। देश का हर सोचने-समझने वाला व्यक्ति शर्मसार है और महिला भी इंसान है का नारा देश के हर कोने में गूंज रहा है। अब समाज के सामने लाखों सवाल मुंह बाए खड़े हैं- आखिर आधुनिक युग में औरत को क्यों केवल भोग की वस्तु के रूप में देख जा रहा है? क्यों हजारों महिला-पक्षधर कानूनों के बनने के बाद भी महिलाओं पर हिंसा बढ़ेगी ही? क्यों महिलाओं के बढ़ते कदमों को समाज बर्दाश्त नहीं कर पा रहा? आज संयुक्त राष्ट्र को कहना पड़ रहा है कि महिलाओं पर हिंसा को खत्म करने के लिये सभी को एकताबद्ध होना होगा। इस पर विशेष अभिज्ञान लिया गया और 2013 में महिलाओं की स्थिति पर बने आयोग का 57वां अधिवेशन न्यूयार्क में होगा, जिसमें महिलाओं और लड़कियों पर हर प्रकार की हिंसा का खत्मा अहम मुद्दा बनेगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा- बलात्कार और महिलाओं पर अपराध की घटनाओं में जो भयानक इजाफा हुआ है, वह देश-विदेश में गंभीर चिंता का विषय बना है। एशियन मानवाधिकार संगठन ने कहा कि महिला को बराबर का हक देना और महिलाओं पर हिंसा को अपराध की श्रेणी में शामिल करना अब तक व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सका है। महिलाओं पर हिंसा को परंपरा और धर्म वैधानिकता प्रदान करते हैं- इस वजह से एशिया को बदलने की महिलाओं की योग्यता व क्षमता कमजोर होती है।
पिछले वर्ष के एनसीआरबी के आंकड़े बता रहे थे कि महिलाओं पर हो रहे अपराधों में इजाफा हुआ है और पश्चिम बंगाल व आंध्र प्रदेश, जहां लोग परंपराओं के काहिल हैं, पहले और दूसरे नंबर पर थे, पर इन राज्यों की सरकारों या केंद्र सरकार ने कोई ऐसे कदम नहीं उठाए जिनको देखकर लगे कि अब इन अपराधों को रोकने का प्रयास किया जाएगा। बलात्कार के मामले मध्य प्रदेश से सबसे ज्यादा आए थे और घरेलू हिंसा के मामले तमिलनाडु से, 40 प्रतिशत आये हैं। मेगा शहरों में दिल्ली, बेंगलुरू और हैदराबाद में महिलाएं अत्यंत असुरक्षित रही हैं। इसके अलावा इस वर्ष हरियाणा ने सामूहिक बलात्कार के इस वर्ष हरियाणा बलात्कार के रिकार्ड माह में 19 कांड है, रिकार्ड तोड़ दिये जब एक माह में 19 कांड हो गए जिनमें ज्यादातर लड़कियां नाबालिग थीं। पर जिस रफ्तार से महिलाओं पर हिंसा बढ़ रही है, सरकार और संस्थाओं की प्रतिक्रिया बहुत ही क्षीण है। महिला आयोग शक्तिहीन है। यूनियन केबिनेट बलात्कार कानून में परिवर्तन कर धारदार बनाने के लिये भारतीय दंड संहिता और अपराध संहिता में संशोधन के मामले को लटकाई हुई है; पर यौन हिंसा के सवाल को लिंग निरपेक्ष बनाने की कोशिश जारी है, जिस पर तमाम महिला संगठनों ने विरोध दर्ज किया है।
अजय शुक्ला
रफ़्तार लाइव
Labels: blog


0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home