Friday, 21 March 2014

जन्मदिन / मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां (21 मार्च)

                                                                       
     
ज़ुल्मी काहे को सुनाई ऐसी तान रे !
भारतीय शास्त्रीय संगीत के युग-पुरूष, शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की हरएक सांस संगीत को समर्पित थी। बिहार के एक छोटे से कस्बे डुमरांव में जन्मे खां साहब ने बनारस को अपनी कर्मभूमि बनाई और आजीवन संगीत में मुक्ति की तलाश करते रहे। इस मुक्ति की खोज में वे शादी-ब्याह की महफ़िलों से लेकर संगीत के अंतरराष्ट्रीय मंचों तक शहनाई बजाते रहे। काशी विश्वनाथ मंदिर के वे अधिकृत शहनाई वादक थे। हिंदी फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' और 'स्वदेश' तथा सत्यजीत रे की बंगला फिल्म 'जलसाघर' में भी उन्होंने शहनाई का जादू बिखेरा था। फिल्मकार गौतम घोष ने उनके संगीत की अंतर्दृष्टि का स्पर्श करने वाली एक बेहतरीन फिल्म 'meeting a milestone' बनाई थी। अपनी तमाम उपलब्धियों के बावज़ूद खां साहब अपनी संगीत-साधना से संतुष्ट नहीं थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था - 'अभी सच्चा सुर लगा ही कहां है ? उसी की तलाश में तो हम इतने बरस से बजा रहे हैं । जब सच्चा सुर लगा जाएया तो समझिएगा कि हम पहुंच गए बाबा विश्वनाथ की शरण में।' पता नहीं शहनाई के सुर मृत्यु के बाद उन्हें कहां तक ले गए, लेकिन हमारे दिलों की गहराई में तो वे कब के पहुंच गए थे। उनकी निश्छल मुस्कान, उनकी फ़कीराना ज़िंदगी और सुरों के प्रति उनकी दीवानगी आने वाली संगीत पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी। उनकी जन्मतिथि पर हमारी हार्दिक श्रधांजलि !

                                                                  लेखक- ध्रुव गुप्ता 

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Monday, 17 March 2014

4th Delhi International Jazz Festival 2014 ( Pre Event - Press Release)

New Delhi, March 16, 2014:  Delhi International Jazz Festival invites you to it's 4th successful consecutive year,  Organised by the Indian Council for Cultural Relations (ICCR) in which prominent bands around the world is featuring from March 28th - 30th 2014.
The festival will be held at Nehru Park, Chanakya Puri, New Delhi, and is the largest ever jazz festival in the country, with performances across three days by prominent Jazz Artists
After three fantastic seasons of unparalleled success in Delhi, the panel has decided to take advantage of new opportunities by adding new Bands around the world. This year, you will still see your favourite elements of Jazz world: Ari Roland Quartet (USA), Smarton Trio (Hungry), Black Slade (Delhi), Tres Butacas (Colombia), Obara Quartet (Poland), Mina Agossi Trio (France), Joe Alvarez / Trident Jazz Trio (Mumbai), PJ Perry (Canada), Modern Han (Korea), Ximo Tebar and IVAM Jazz Ensemble (Spain) and Drift (Indian group).
Conceived by the ICCR in 2011 as a "tool of cultural contact" spanning Asia, Africa, North America and Europe, the festival weaves together the message of music and culture. The festival will be held in the luxuriant green vicinity of Nehru Park with enthrall music playing under the stars, to euphoric audiences and the best part: entry is free to public.  
For Further details please visit :- www.delhijazzfestival.com 

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Wednesday, 12 March 2014

नक्सलियों के आगे लाचार क्यों हैं सरकार और पुलिस ?

                                                               


छत्तीसगढ़ के सुकमा में एक और नक्सली हमले के में सी.आर.पी.एफ के लगभग दो दर्जन जवानों के मारे जाने की दुखद खबर आ रही है। पहले भी ऐसी ख़बरें आती रही हैं। हमारी सरकारों को इनसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। शहीदों के परिवारों को मुआवज़े की रक़म की घोषणा होगी, दो-चार दिन जंगलों के ऊपर हेलीकाप्टर उड़ेंगे, कॉम्बिंग ऑपरेशन का नाटक खेला जाएगा और फिर शांति से अगले हमले का इंतज़ार शुरू हो जाएगा। हत्यारे नक्सलियों के आगे ऐसी लाचार क्यों हैं सरकार और पुलिस ? त्रासदी यह है कि नक्सल समस्या के चार-पांच दशक और हज़ारों हत्याओं के बाद भी हमारी सरकारें यह तय नहीं कर पाईं हैं कि यह सामाजिक गैरबराबरी से उपजी राजनीतिक समस्या है या खालिस आपराधिक गिरोहों का आतंक। इसी अनिर्णय के कारण देश के इस सबसे बड़े आतंकी संगठन को न तो आतंकवादी माना गया और न उसके ख़िलाफ़ खुले मन से कोई निर्णायक लड़ाई लड़ी गई। सरकार के अनिर्णय के पीछे हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी मित्रों की बड़ी भूमिका है। नक्सलवाद को गौरवान्वित करने वाले इन मित्रों का ज्ञान ज़मीनी नहीं, किताबों पर ज्यादा आधारित है। बिहार के कई नक्सल प्रभावित जिलों में हासिल अपने व्यक्तिगत अनुभवों और कई नक्सली नेताओं से पूछताछ के आधार पर मैं आप मित्रों के लिए नक्सलियों के बारे में कुछ बहुप्रचलित भ्रमों का निवारण करना चाहूंगा। मुझे पता है कि कुछ लोगों को यह नागवार गुज़रेगा, लेकिन सच तो सच ही होता है !
1. यह आम धारणा है कि नक्सलवादी शोषक सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध युद्धरत हैं। नक्सली आंदोलन के आरंभिक दिनों में शायद ऐसा रहा हो, आज की हकीकत यह है कि वर्गसंघर्ष की आड़ में यहां अपराधियों और लूटेरों के बड़े-बड़े समूह कार्यरत है। ये समूह स्थानीय आदिवासियों की मदद से जंगलों, पहाड़ों और खेती के लिए उर्वर जमीनों पर अपना वर्चस्व स्थापित करते हैं। उसके बाद आरंभ होता है वन पदाधिकारियों, कीमती लकड़ी और बीड़ी पत्ते के ठेकेदारों, खनन कार्य में लगे पूंजीपतियों, सड़क या भवन निर्माण में लगी कंपनियों, बालू तथा पत्थर के ठेकेदारों और इलाके के बड़े किसानों से रंगदारी उगाहने का अंतहीन सिलसिला। लूटपाट की सुविधा के लिए उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र को एरिया और जोन में बांट रखा है। एक-एक नक्सली जोन की कमाई करोड़ों में है। यह मत सोचिए कि यह कमाई क्षेत्र के आदिवासियों की शिक्षा, रोजगार और कल्याण पर खर्च होता है । इसका आधा हिस्सा आंध्र प्रदेश और बंगाल में बैठे नक्सलवाद के आकाओं को भेजा जाता है और आधा स्थानीय नक्सलियों के हिस्से आता है।
2. यह आम धारणा है कि नक्सलवाद के बैनर तले आदिवासी अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है। शायद लोगों को पता नहीं कि उगाही और हमले की रणनीति स्थानीय लोग नहीं, महानगरों में बैठे उनके आक़ा तय करते हैं। किसी जोन में नेता और हमलावर दस्ते के लोग आमतौर पर स्थानीय नहीं होते, बाहर से भेजे जाते हैं। हर जोन में ऐसे 10 से 20 लोग बाहर से पोस्ट किये जाते हैं जिनपर निर्णय और कार्रवाई की ज़िम्मेदारी होती है। स्थानीय लोगों की भूमिका महज़ हमलों के वक़्त दस्ते की संख्या बढ़ाने, नक्सलियों के हथियार ढोने और छुपाने, दस्तों के लिए आसपास के गावों से भोजन जुटाने और उनकी हवस के लिए अपने गांव-टोलों से लडकियां भेजने तक सीमित है। इतनी सेवा के बदले उन्हें सौ-पचास रूपये और कभी-कभी किसी किसान की जमीन पर कब्ज़ा कर खेतीबारी का आदेश मिलता है। किसी ऑपरेशन के बाद नक्सली नेता तो कुछ समय के लिए बड़े शहरों में छुपकर एय्याशी करते हैं, पुलिस के दमन का शिकार स्थानीय आदिवासियों और दलितों को होना पड़ता है। यह सही है कि सरकारों ने अपने विकास कार्यक्रमों में कुछ हद तक आदिवासियों की उपेक्षा की है, लेकिन उनकी दुर्दशा में सबसे बड़ा योगदान नक्सलियों का है। उन्होंने अरसे से जंगलों में प्रशासन और विकास एजेंसियों का प्रवेश बंद कर रखा है। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा बनाए गए अधिकांश सड़कों, पुल-पुलिया, स्कूलों और सामुदायिक भवनों को उड़ा दिया गया है। आदिवासी अगर पढ़-लिख और विकसित हो गए तो नक्सलियों की गुलामी कौन करेगा ?
3. ज्यादातर लोगों का मानना है कि नक्सलवाद एक राजनीतिक विचारधारा है जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा लेती है। मित्रों, आप भ्रम में हैं। यदि इनका कोई विचार है तो वह कागजों में होगा। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर चुनाव के पहले ये लोग चुनावी वहिष्कार का नारा और कुछ छिटपुट घटनाओं को अंजाम देकर अपनी क़ीमत बढ़ाते हैं और फिर सबसे ज्यादा कीमत देने वाले किसी उम्मीदवारके पक्ष में फतवे ज़ारी करते है, चाहे वह कितना बड़ा शोषक और अनाचारी क्यों न हो। आंकड़े एकत्र कर के देख लीजिये कि कितने सामंतों और पूंजीपतियों के विरुद्ध नक्सलियों ने हिंसात्मक कारवाई की है। आपको निराशा हाथ लगेगी। इनकी नृशंस हिंसा के शिकार हमेशा से निहत्थे ग्रामीण, गरीब सिपाही तथा छोटे किसान-मज़दूर ही होते रहे है।

वक़्त आ गया है कि हमारी केंद्र और राज्यों की सरकारें नक्सलियों के प्रति अपना ढुलमुल रवैया छोड़ें और उन्हें आतंकी मान कर उनके ख़िलाफ़ एक निर्णायक जंग की शुरूआत करें। मैं नक्सलियों के हमदर्द देश के बुद्धिजीवी मित्रों से भी अनुरोध करूंगा कि वे स्वप्नलोक से बाहर निकलें और आदिवासियों का शोषण करने वाली व्यवस्था तथा उनका इस्तेमाल करने वाली बर्बर अव्यवस्था दोनों का एक साथ प्रतिकार करें !



                                                 लेखक - ध्रुव गुप्ता 

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Tuesday, 4 March 2014

कानपुर मे तोड़ी गयीं डॉक्टरों की हड्डियाँ

                                                                               


कानपुर मे पुलिस और मेडिकल छात्रों के बीच हुई झड़प के बाद अब ये लड़ाई एक विकराल रूप ले चुकी है जिसका खामियाजा मरीजों को उठाना पड़ रहा है जो अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकाने को मजबूर हैं, इस लड़ाई के फलस्वरूप अभी तक लगभग 19मरीज़ जान गवां चुके हैं |
शनिवार को कानपुर के एक पेट्रोलपम्प पर मेडिकल छात्रों और विधायक इरफ़ान सोलंकी के बीच मामूली विवाद पर झड़प हो गयी, जिसके बाद मेडिकल छात्रों के अनुसार विधायक ने पुलिस को आदेश देकर मेडिकल कॉलेज के अंदर घुसकर छात्रों और डॉक्टरों को बेरहमी से पीटा साथ ही कई छात्रों को उठा कर भी ले गये जिन पर पुलिस ने आतंकवादी होने का इलज़ाम लगाकर जेल मे डाल दिया | विधायक ने सफाई देते हुए कहा की छात्रों ने उनपर जानलेवा हमला किया जिससे उनके सर पर चोट आयी और 9 टाँके लग गये जबकि एक न्यूज़ टीवी शो पर विधायक के सर की चोट अचानक तीन दिन मे ही गायब हो गयी थी |
अब डॉक्टरों की मांग है की पकड़े गए छात्रों को सभी आरोपों से मुक्त कर छोड़ा जाए, विधायक को निलंबित किया जाए, दोषियों पर कार्यवाही हो और मामले की निष्पक्ष जांच करायी जाए | कानपुर के डॉक्टरों के समर्थन मे देश के और भी डॉक्टर आ गये है साथ ही कुछ राजनीतिक पार्टियां भी उनका समर्थन कर रही है पर अभी तक इस मुद्दे का कोई हल निकलता नज़र नहीं आ रहा है |

इस मामले का निपटारा चाहे जब भी हो, पर ये कहना गलत नहीं होगा की जब तक ये मामला निपट नहीं जाता तब तक कानपुर मे किसी को मरीज बनने की इजाज़त है |

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Monday, 3 March 2014

'बिग सैल्यूट' टू जादव मोलाई


                                                              

ये हैं असम के 47-वर्षीय जादव मोलाई पायेंग बेगान ! क़रीब 30 साल पहले 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने गांव के आसपास करीब डेढ़ हजार एकड़ बंजर, बालू से भरी ज़मीन पर वृक्षों और जल के अभाव में सैकड़ों सांपों को लगातार मरते हुए देखा था। एक दिन उन्होंने खुद से एक वादा किया कि वे अपना जीवन देकर भी इस बंजर ज़मीन को सांपों और दूसरे पशुओं का अभयारण्य बनायेंगे। तब से आज तक उन्होंने अपने जीवन में बस एक ही काम किया - बंजर में पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना। पिछले 30 सालों में उन्होंने हज़ारों पेड़ लगाए और अपने लगाए पेड़-पौधों की परवरिश बच्चों की तरह की। आज वे डेढ़ हजार एकड़ में फैले अपने घने जंगल में सांपों और दूसरे वन्य जीवों - बाघों, हाथियों, हिरणों, गैंडों और पक्षियों के साथ रहते हैं। अपने जीवन से बेहद संतुष्ट और हरियाली को समर्पित ! यह विराट काम उन्होंने अकेले दम पर किया है। वन विभाग के लोग 2008 में तब सामने आए जब जंगल लगाने का काम पायेंग ने पूरा कर लिया था। तब असिस्टेंट कंजरवेटर ऑफ़ फारेस्ट गुनिन सैकिया ने उनके बारे में लिखा - 'हम पायेंग के महान कार्य को देखकर हैरान हैं ! वह 30 साल तक अपने जनून को पूरा करने में लगा रहा। वह किसी दूसरे देश में होता तो उसे राष्ट्रीय नायक का दर्ज़ा प्राप्त होता।' कुछ अरसा पहले एक अंग्रेजी अखबार में यह वृत्तांत छपने के बाद दुनिया भर के पर्यावरण और वन प्रेमियों का ध्यान पायेंग ने आकर्षित किया।
देश के असली महानायक पायेंग को हम सबका एक 'बिग सैल्यूट' तो बनता ही है, और एक मौका भी कि इस पृथ्वी को थोड़ा और खूबसूरत बनाने का एक वादा हम ख़ुद से भी करें।

                                             लेखक - ध्रुव गुप्ता 

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