Friday, 31 May 2013

पोटली


इस समतल पर पॉव रख
वो चल दी है आकाश की ओर
हवाओं का झूला और
घाम का संचय कर
शाम के बादलों से निमित्त रास्ते से
अपने गूंगेपन के साथ
वो टहनियों में बांधकर
आंसूओं की पोटली ले जा रही है
टटोलकर कुछ बादलों को
वो सौंप देगी ये पोटली
फिर चली आयेगी उसी राह से
फडफडाती आंखों की चमक के साथ
इसी उम्मीद में कि अब इन शहरों में
बारिसों का शोर सुनाई नहीं देगा
लोग उत्साहित होंगें पानी के सम्वाद से
क्योंकि भरे हैं अब भी
दुख उसी पोटली में
जो बादलों ने सम्भाल रखी है

दीप्ति शर्मा

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Wednesday, 29 May 2013

Aam Aadmi Party releases first shortlist for Delhi Polls


After lots of speculation the much awaited first shortlist of Arvind Kejriwal led Aam Aadmi Party(AAP) for the upcoming Delhi Assembly election to be held in November this year was released here in Delhi today. The list for a total of 12 assembly constituencies was released by Arvind Kejriwal himself at a press conference at the Constitutional Club, Delhi. Addressing the press meet, Arvind said that, “A total of 106 persons had initially applied for candidature and a candidate screening committee was being constituted co-chaired by Manish Sisodia and Sanjay Singh”. He further added that, “The prime objective of the screening committee was to investigate about the social background of the candidates and ensure that they don’t have any past criminal records or allegations. The screening committee also ensured that no two candidates from the same family get enlisted”.

Among the 106 applied the screening committee selected a total of 44 candidates and the popular faces that flashed were of AAP national executive members Shazia IIlmi, from the R.K. Puram and Manish Sisodia from Patparganj constituencies. Briefing further about the candidates and the selection procedure Kejriwal said, “We have candidates from varied professional backgrounds including IIT engineers, lawyers, journalists, former defense personnel etc. and the most interesting part is that the shortlist also consists of some former congress and BJP workers, whose screening was done with utmost care to ensure that they previously maintained a spotless social background and were not being chased out by their respective parties for unethical work.”

From each constituency there are 3-5 probable candidates and the complete list will be on the official website of AAP for 15 days and Arvind asked the people to have a glance at the names appearing in the list and inform AAP if there’s any information or records that unfit them for candidature with proper evidence. If credible evidence of any wrong doing is received against any of the candidates, their names will be taken off the shortlist. It is to be noted that AAP had disclosed in its candidate selection process a few weeks back and after 15 days from now there would be debate among the candidates in their respective constituencies and lastly the final candidate would be selected on the basis of preferential voting by the active volunteers of that particular region.

Replying to media queries Arvind quoted that, “The final list of the first short list would come up by 15th June’2013 and within the next one week from now the second short list is likely to be announced and the final process is expected to be completed by the end of July”

Why the final preferential voting will only be done by AAP volunteers and why the common non-volunteers are refrained from voting, is perhaps also an important question that Arvind must introspect on.

Certainly, on papers the selection procedure seems to be very much innovative and constructive one, but at the same time it’s challenging too. However, how it is actually executed and how much productive it proves to be, will be an important thing to look on in the due course of time. Lastly, how the voters actually anticipate to the process will be interesting to find out.

By - Shamim Zakaria

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Sunday, 26 May 2013

धर्म और जाति का भँवर जाल



आज मानव अपने ही बनाए उन चार धर्मों में इस कदर उलझ कर रह गया है कि वह भगवान का बनाया वह सर्वोपरी धर्म भूल गया जो है मानवता का धर्म। आश्चर्य है आज कोई इंसान यह नहीं कहता कि मैं श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं मानव हूँ। कोई मानवता के धर्मो का पालन करके एक दूसरे पर दया भाव नहीं दिखाता, बल्कि सब हिन्दू, मुस्लिम, सिख्ख, ईसाई के दायरे में सिमट कर रोज लड़ा करते हैं और एक दूसरे पर छींटाकशी किया करते हैं। इन धर्मों में सबसे पुराना धर्म कहे जाने वाले हिन्दू धर्म में पवित्र माने जाने वाले वेद और भगवतगीता तक में हिन्दू या इससे सम्बंधित किसी भी शब्द की व्याख्या नहीं दिखी। इनमे केवल मानव के विषय में चर्चा की गई और उसे उनके कर्मों के आधार पर चार वर्णों में विभाजित कर दिया गया। भगवतगीता में वर्णित है कि ब्रम्हज्ञान, विद्याएं सीखने को इच्छुक, ज्ञान का प्रसार करने वाले -ब्राम्हण। वीर एवं योद्धा, युद्ध में कभी पीछे न हटने वाला - क्षत्रिय। व्यवसाय में निपुण, धन अर्जित करने वाले - बनिया या वैश्य। बेपरवाह, मस्तमौला जीव- कल की फिक्र नहीं,मेहनत करो और खाओपियो मौजकरो-शूद्र। जो जैसा कर्म करता था उसे वैसी ही संज्ञा दी जाती थी।
मानव अपने लिए दुःख का कारण तब बना जब यही विभाजन वंश और कुल पर आधारित हो गया। अब सब उलट विद्या है। कहा भी गया है कि कलयुग में उल्टी गंगा ही बहेगी। अब ब्राह्मण- ही केवल धर्म कर्म का कार्य करे। वैश्य- व्यापार करे। क्षत्रिय- सुरक्षा और शुद्र- साफ़ सफाई। 
न जाने मानव कब अपने बनाए इस भंवर जाल से बहार निकलेगा और कब मानवता के धर्म का पालन करेगा। जब बन्दे की आत्मा उस अनंत दुनिया में पहुंचेगी तो उसे अलग-अलग अल्लाह, राम, इशु या गोविन्द नहीं मिलेगा। तब क्या ये धर्म का रक्षक नजरें मिला पायेगा उस अनत अविनाशी से?

By - Swati Gupta

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Tuesday, 21 May 2013

रणबीर को कॉकरोच से लगता है डर: दीपिका


बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पदुकोण का कहना है कि उनके दोस्त और आने वाली फिल्म `ये जवानी है दीवानी` के सह-कलाकार रणबीर कपूर मकड़ी और कॉकरोच से भी डर जाते हैं। दीपिका और रणबीर के बीच प्रेम प्रसंग मार्च 2008 में `बचना ऐ हसीनों` में साथ काम करने के बाद से शुरू हुआ था, हालांकि नवंबर 2009 में दोनों अलग हो गए थे।
दीपिका ने `ये जवानी है दिवानी` फिल्म के प्रचार कार्यक्रम में कहा कि अगर आप एक कमरे में हैं और वहां मकड़ी या कॉकरोच दिख जाए तो पक्का है कि बाकी लोग तो उसे भगाने में लग जाएंगे लेकिन रणबीर पलंग के नीचे छुप जाएंगे। ये बात मैं अनुभव से बोल रही हूं। रणबीर और दीपिका `ये जवानी है दीवानी` में साथ नजर आएंगे। फिल्म 31 मई को प्रदर्शित हो रही है

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Monday, 20 May 2013

लालू प्रसाद की पैरवी में पासवा



लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से जोरदार अपील की है। उन्होंने कहा है कि जिस तरह 2004 में सोनिया गांधी ने उनके घर आकर यूपीए-एक बनाने की शुरुआत की थी, वैसा ही कुछ उन्हें फिर से करना चाहिए। पासवान चाहते हैं कि यूपीए-दो की सरकार के चार साल पूरे होने के मौके पर जब सारे सहयोगी जुटें तो बाहरी सहयोगियों यानी उन्हें और लालू प्रसाद को यूपीए के अंदर लिया जाए।
उनकी मंशा सरकार में शामिल होने की नहीं है, बल्कि सिर्फ इतनी है कि बिहार में कांग्रेस उनके साथ एलायंस की घोषणा करे।
जानकार सूत्रों का कहना है कि रामविलास पासवान के लिए कांग्रेस के साथ तालमेल कोई मुश्किल नहीं है। कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी दोनों का उनके साथ सद्भाव है और उनकी पार्टी कभी भी कांग्रेस के साथ तालमेल कर सकती है। पर पासवान को पता है कि सिर्फ उनके और कांग्रेस के एलायंस से बिहार में कुछ नहीं हो सकता। बिहार में लालू प्रसाद की असली ताकत हैं।
सो, वे चाहते हैं कि कांग्रेस, राजद और लोजपा का एलायंस हो। इसी की पैरवी उन्होंने की है। वे चाहते हैं कि कांग्रेस पुरानी बातों को भूल कर पहले जैसा एलायंस बनाए। 22 मई को यूपीए-दो की सरकार के चार साल पूरे करने के जश्न के मौके पर इस बात का कुछ अंदाजा लगेगा कि उनकी अपील कितनी कारगर हुई है।

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Sunday, 19 May 2013

हिंदी की पुकार


जन जन से मिल कर 

शहर से निकल कर 

आती है सहमी सी आवाज 

की तुम मुझे बचालो! 

मुझे बचालो ! 

मुझे बचालो !

हर एक पहाड़ से टकराकर 


हर एक नदी से नाह कर 

धरती को चीर कर 

हवा सी घसीट कर 

आती है सहमी सी आवाज 

की तुम मुझे बचालो! 

मुझे बचालो ! 

मुझे बचालो !

माँ की ममता से 



किसान की क्षमता से 

व्यवसायी के व्यवसाय से 

युवा के उत्साह से 

थक हर कर 

आती है सहमी सी आवाज 

की तुम मुझे बचालो! 

मुझे बचालो ! 

मुझे बचालो !

सूर्य की किरण से 

धरती के राज-कण से 

नेताओं के आवाहन से 

इन्सान के संज्ञान से 

आती है सहमी सी आवाज 


की तुम मुझे बचालो! 

मुझे बचालो ! 

मुझे बचालो !

विज्ञानं के चमत्कार से 

ज्योतिष के उपकार से 

दानी के दान से 

विद्वान के ज्ञान से 

थक हर कर 

आती है सहमी सी आवाज 

की तुम मुझे बचालो! 

मुझे बचालो ! 

मुझे बचालो !........

राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी

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Saturday, 18 May 2013

ये वादा है मेरा


ये वादा है मेरा कि कभी सामने न आयेंगे,
पर जब दिल बहुत बैचैन हो मेरा तो खुद ही चले आना

ये वादा है मेरा कि तुझसे दूर चले जायेंगे,
पर जब दिल बहुत बैचैन हो मेरा तो खुद ही कदम बढ़ाना

ये वादा है मेरा कि कभी आंसू न बहायेंगे,
पर जब दिल बहुत बैचैन हो मेरा तो खुद ही सीने से लगाना

ये वादा है मेरा कि दुनिया से चले जायेंगे,
पर जब दिल बहुत बैचैन हो तेरा बस प्यार से बुलाना

ये वादा है मेरा कि हम लौट कर आयेंगे,
बस एक गुजारिस है कि फिर नज़रें मत चुराना

Written By- Swati Gupta

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Tuesday, 14 May 2013

क्या समाज के शिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्ति ही दे रहे हैं अन्धविश्वास को बढ़ावा ?


प्रिय पाठकों ठगी का तो जैसे भारत में व्यापार का एक दौर ही चल पड़ा है। निर्मल बाबा, सत्य साईं नाथ, आशा राम बापू जैसे कई लोगो के कोष खुलकर इस बात का बखान कर चुके हैं। ऐसा ही कुछ मामला सामने आया है स्वामी चंद्रशेखर का। इन्हें स्वामी कहना इस शब्द की अवहेलना होगी। करोडो अरबों की सम्पत्ति, सोने से लदा शरीर, सोने की सेज और सोने का सिंघासन इतने विलासी पुरुष को तो मैं धर्म के नाम पर कलंक ही कहूँगी। ये उस देश का स्वामी है जो बड़ा ही गरीब है जहाँ की लगभग आधी आबादी अपनी दो वक्त की रोटी के लिए काफी मशक्कत करती है। लेकिन मसला ज़रा गंभीर है क्योंकि ऐसे पाखंडियों के कोष भरने वाले कहीं बाहर से नहीं आते ये लोग भी हम ही हैं। पर इन लोगो को मानने वाली जनता अनपढ़, अशिक्षित हो तो कोई बात भी है, इनकी भक्ति की श्रेणी में तो भारत के महान खिलाड़ी और दिग्गजों का नाम भी शुमार है। सत्य साईं नाथ के भक्तो में क्रिकेट का भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर का नाम आया तो हाल ही के खुलासे स्वामी चंद्रशेखर के लिए अमिताभ बच्चन जी का नाम सामने आया है। 
मैं व्यक्तिगत तौर पर अमिताभ जी की बड़ी इज्जत करती हूँ। ये समाज के वरिष्ठ नागरिक है एक लेखक होने की द्रष्टि से मैं इनका बहुत सम्मान करती है मेरा ऐसा मानना है कि एक कवि और लेखक के विचार कभी आम नहीं होते वह समाज का हिती होता है। पर अगर इन जैसे समाज के आदर्श लोग ही अगर इन आडंबरों में फसे रहेंगे तो इनका अनुसरण करने वाले न जाने कितने लोग गहरे पतन की ओर बढ़ेंगे और तो और इन तथ्यों को समाज में और बढ़ावा ही मिलेगा।
खैर मुद्दा सामने आया है पर सरकार से जांच की कोई उम्मीद ही नहीं बनती पहले वो अपने मंत्रियों की ही जांच करवा ले, जैसा की मैंने बताया भारत में तो ठगी का व्यापर सा हो गया है और इस काम में सरकार भी कुछ कम नहीं है।

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Saturday, 11 May 2013

माँ


मुझे उंगली पकड़कर माँ ने चलना सिखाया है।
मैंने आज भी उसे मेरा हाथ थामे पाया है।।

चुभती हुई सी धूप में शीतल छांव जैसी है वो।
राहें कितनी भी मुश्किल हो पर राह जैसी है वो।।

जब कोई न हो साथ तब वो ही साथ देती है।
हम कितने भी अकेले हों, वो हाथ थाम लेती है।।

मै डूबूँ जब भंवर में, वो ही किनारा बनती है।
ठोकरे खाते हो हम, तो वो सहारा बनती है।।

उसके आँचल की छांव में, बड़ी ही राहत है।
उसकी ममता में एक, अजीब सी गर्माहट है।।

मैं जब सहमी सी रहती हूँ,
डरकर घर से निकलती हूँ,

वो मेरे लौटने तक दूर राहों को तकती रहती है।
उसकी माथे की लकीरें कुछ उलझती रहती हैं।।

देखकर मुझे वो राहत की सांस लेती है।
अपनी बढती उन धडकनों को, फिर थाम लेती है।।

कैसे करूँ बखान ये अलफ़ाज़ कम हैं।
उस विधाता की कलम में भी स्याह कम है।।

उसकी ममता से नहीं लगता कि वो इंसान जैसी है।
मेरे सामने वो जीती जागती भगवान् जैसी है।।

Wriiten By- Swati Gupta

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Friday, 10 May 2013

ख़ामोशी


मांग करने लायक
कुछ नहीं बचा
मेरे अंदर
ना ख्याल , ना ही
कोई जज्बात
बस ख़ामोशी है
हर तरफ अथाह ख़ामोशी
वो शांत हैं
वहाँ ऊपर
आकाश के मौन में
फिर भी आंधी, बारिश
धूप ,छाँव  में
अहसास करता है
खुद के होने का
उसके होने पर भी
नहीं सुन पाती मैं
वो मौन ध्वनि
आँधी में उड़ते
उन पत्तों में भी नहीं
बारिस की बूंदों में भी नहीं
मुझे नहीं सुनाई देती
बस महसूस होता है
जैसे मेरी ये ख़ामोशी
आकाश के मौन में
अब विलीन हो चली है ।

- दीप्ति शर्मा

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Monday, 6 May 2013

मुझे आजादी चाहिए



मैं अपने ही घर में कैद हूँ
मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए
रोती बिलखती सर पटकती रही मैं
अब मेरी आवाज को एक आवाज चाहिए
जी रही हूँ कड़वे घूँट पीकर
न मेरी राह में कांटे उगाइये
मैं अपने ही घर में कैद हूँ
मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए
पराये मेरे दुःख पे आंसू बहा रहे हैं
मेरे जख्मों पे फिर भी मरहम लगा रहे हैं
जिन्हें पाल पोसकर नाम दिया अपना
मरघट में वो ही मुझे जला रहे हैं
बिलायती बहू के जख्मों से नहीं डरती मैं
अपनों की नजरों से मरती हूँ मैं
सामर्थ मिल रही मेरे पगों को फिर भी
हर तूफान से अकेले ही लड़ती हूँ मैं
मैं अपने ही घर में कैद हूँ
मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए -

 रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी''

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Sunday, 5 May 2013

दंश



स्त्री होने का दर्द
कसिटता है
कचोटता है मन के भीतर
अनगिनत तारों को
वो रो नहीं सकती
कुछ कह नहीं सकती
बाहर निकली तो
मर्यादा का डर ,
सबसे ज्यादा घर से मिले
संस्कारों का डर
तो कभी
आलोचना का डर ,
नियमों का डर ,
कायदों का डर
जो गिर देता हैं आत्मविश्वास
फिर भी हँसती है
वो छटपटाती है और
अपने ही सवालों से घिर जाती है
हर एक दायित्व बस
उसी से जोड़कर देखा जाता है
कहा जाता है
मर्यादा में रहो
समाज की  सुनो
प्रेम ना करो
किया तो मार दी जाओगी
बस आँख बंद कर
इस सो कोल्ड समाज की
मर्यादा का पालन करो
और ये न भूलो कि
तुम एक स्त्री हो
ये समाज के रखवाले
ठेकेदार बन
चूस लेंगे खून
जीने नहीं देंगे
और कहेंगे
सहना पड़ेगा ये दंश
तुम्हें उम्रभर
क्यूंकि तुम एक स्त्री हो ।

- दीप्ति शर्मा

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Saturday, 4 May 2013

हे ! कलम और कागज़, प्रणाम तुम्हें।

उस कलम के नाम जो बिना थके और कोई सवाल किये, मुझे खुद को व्यक्त करने में, मेरी सहायता करती है और उस कोरे कागज को समर्पित, जो मेरे विचारो को, मेरी सोच को और मेरी भावनाऔ को खुद में समेट लेता है, संजो लेता है और वो भी तब तक के लिये जब तक कि वो खुद नष्ट ना हो जाये। जो मेरी हर बात को खामोशी से ध्यान लगा कर सुनता है। उस कोरे कागज़ को जिसे मेरी सोच का आइना बनने मे कोई हर्ज नहीं।

"मेरी कलम तुम, तुम मुझे,
किसी उदृश्य गुरुत्व से,
आकर्षित करती हो अपनी ओर,
और मेरी सोच को, भावो को, विचारों को,
स्याही से अपनी ,
उकेरने में कागज पर,
करती हो मदद मेरी।

और कागज तुम, तुम
बिना कोई सवाल किये,
मेरे तमाम राज़ वर्षो से,
करते आ रहे हो खुद में दफन,
मेरी बातों को,
विचलित हुए बिना,
आ रहे हो सुनते,
और ना जाने कितने लम्हों को,
कर खुद में दर्ज ,
उन्हें, कर रहें हो ,
यादो में तबदील, वर्षो से।

आभारी मैं तुम दोनो का,
और सदा रहूँगा भी,
और सदा रहूँगा भी।

हे ! कलम और कागज़, प्रणाम तुम्हें
कैसे करूँ मैं ?
धन्यवाद तुम्हारा
"
 
 
लेखक- अम्बर सक्सेना

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Friday, 3 May 2013

THE DEATH OF A DEAD MAN: An introspection



Living behind the bars for 22 long years serving a death sentence pronounced years ago and the hopes being pardoned and going back to his native country dying each day is certainly one of the most painful and dreaded trauma that one can face in his/her lifetime.

Sarabjit Singh who was convicted of terrorism and spying by Pakistani court and was tried and convicted by The Supreme Court of Pakistan for a series of bomb attacks in Lahore and Faisalabad that killed 14 bystanders, in 1990, finally took his last breathe on 2ndMay’2013 at 12:45am at the Jinnah Hospital, Lahore after he was attacked by fellow prisoners in the Central jail Lahore (Kot Lakhpat jail).

With Sarabjit’s death there’s seems to be a permanent lock on the Indo-Pak political diplomacy and round of peace talks has perhaps closed its eyes forever, further worsening the relation between the two countries..

As the name suggests PAKISTAN which signifies ‘Land of Pure’, however the course of action of this country and the way they have introspected every situation has certainly contradicted the name. Sarabjit’s case was another live and strong example of that. This is obviously not a stereotyped opinion, but certain fact clearly indicates it.

Starting from the attack on Sarabjit when in prison, reports suggest that the attack on him was carried out using bricks, sharp metal sheets, iron rods and blades. This certainly gives a big reason to think and gives birth to serious suspicion. Over the years Sarabjit has popped up as renowned figure among the world diplomats and the perhaps everyone is well aware how sensitive the matter was, so how come Pakistan didn’t even take care of the minimal security measures for Sarabjit. Moreover, it’s really shocking how fatal articles like blade, sharp metals, iron rod etc. were available for the attack.

Secondly, if we move a few steps back, after the 2001 Parliament Attack Convict, Afzal Guru was executed, Sarabjit Singh was continuously threatened, and finally he is attacked and killed. This certainly gives a huge reason to worry. Further according to the recent news after Sarabjit’s body was returned to India and a second autopsy was being conducted by a group of doctors, they were shocked to find that his vital organs like kidney, heart, stomach etc. were missing. These organs are of utmost importance to find the cause of death, but why Pakistan didn’t want India to know Sarabjit’s cause of death, only they can give the answer to it.

A British lawyer, Jas Uppal, campaigning for his release, pointed to several problems with the prosecution in the trial. Some of them were
His identity was never verified or proved in court and no forensic evidence was provided at his trial to link him to the bomb attacks. Secondly, the trial was conducted in English, whereas Sarabjit does not speak or understand English, and an interpreter was not provided.

In the past there had been numerous instances of Pakistan back stabbing India, and this one too perhaps falls in that category. An Indian prisoner is attacked and killed inside the prison, but as of now the officials themselves doesn’t have any clearly information even about the number of attackers. Though reports suggest that, two were arrested but official confirmation still waited. These certainly raise serious questions on Pakistan’s accountability and off course mentality.

Sarabjit left forever, but who is actually responsible for his death. Is it Sarabjit himself as under the influence of alcohol, he unknowingly crossed the border? Is it the government of India who could have done more to bring back Sarabjit or it is Pakistan for obvious? One is still longing for the answer.

Someone have very rightly pointed out, that death was perhaps more peaceful for Sarabjit as rather than dying each day for 22years, closing the eyes forever was far better. In Pakistan the life term imprisonment is of maximum 14 years, but Sarabjit was serving in jail for 22 long years. Certainly his hopes had died long back; it was only his body that left for the heavenly journey.

By - Shamim Zakaria

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तो समझ लेना कि ....मेरी दुआ ने छुआ है तुम्हे।



जलती हुई धूप में चलते-चलते
कोई हवा का एक झोंका तुम्हे स्पर्श करे
तो समझ लेना कि ...........मेरी दुआ ने छुआ है तुम्हे।
उन रेतीली राहों पर चलते-चलते जब पाँव जले
फिर किसी पेड़ की तुम्हे शीतल छांव मिले
तो समझ लेना कि ...........मेरी दुआ ने छुआ है तुम्हे।
जब प्यासी हो जिन्दगी और तुम्हे पीर मिले,
फिर राहत का तुम्हे ठंडा नीर मिले,
तो समझ लेना कि ...........मेरी दुआ ने छुआ है तुम्हे।
जब डगमगाए नौका न कोई सहारा मिले,
फिर किस्मत से गर तुन्हें किनारा मिले,
तो समझ लेना कि ...........मेरी दुआ ने छुआ है तुम्हे।
Written By- Swati Gupta

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Wednesday, 1 May 2013

गुलामी की तरफ बढ़ते कदम........रोको इन्हें।



भारत, एक ऐसा देश जिसने सदियों की गुलामी देखी है। इतिहास गवाह है कि इस गुलामी के कसूरवार कोई और नहीं हमारी खुद की असंतोषी प्रकृति थी। सत्ता के लालच और लोभीपन का विदेशी प्रवृतियों ने खूब लाभ उठाया। हम जात पात और छुआ छूत के नाम पर आपस में लड़ते रहे। दामाद और पुत्र ने सत्ता के लोभ में कभी पिता को मरवा दिया तो कभी पिता ने पुत्र और दामाद को। अंग्रेजों ने भारतीयों की इस लोभी प्रवृति को खूब भुनाया और हम भारतवासी अपने ही देश को गुलामी के गहरे गर्त में धकेलते रहे। ये बुराइयाँ हमें तब नजर आई जब हम अपना देश पूरी तरह खो चुके थे। आज भी हालात वही है। एक ओर देश में सत्ता को लेकर गहरा घमासान छिड़ा हुआ है और दूसरी ओर हम वापस लड़ते भिड़ते ही नजर आ रहे है कभी जात-पात के नाम पर तो कभी आरक्षण के नाम पर कभी अपने हक़ के लिए तो कभी अपनी अस्मत के लिए। इन जायज़ मुद्दों के लिए हमारी असंतोषी प्रकृति अक्सर सड़क और नेताओं के घर का घेराव करती नज़र आ ही जाती है। जिसका कारण है हमारी सरकार की छलनी व्यवस्था जहाँ न जनता का हित है और न कोई क़ानून और इसी बीच चीन और पाकिस्तान जैसे देश लगातार देश की सीमाओं पर हमला कर रहे हैं। सत्ता के लोभियों का पूरा ध्यान कुर्सी पर टिका है। हमारी सरकार पडोसी देशों की क्रियाओं पर तूल नहीं देना चाहती। देश को पूरी तरह से लूट लेने वाली ये सरकार, जनता का सुख चैन हराम कर देनी वाली ये सरकार अब देश को वापस दासता की जंजीरों में जकडवाना चाहती है। पर मुझे विश्वास है कि हमें अपनी बुराइयां नज़र आएँगी पर तब तक कहीं देर न हो जाए

By- Swati Gupta

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