Tuesday, 24 June 2014

“मेरी स्वपन परी”


जब जब मेरा “चंचलरूपी” मन भवरें की भांति ...... सपनों की “पुष्प-नागरी” मे मँडराता
खुद को कभी इधर...... कभी उधर..... “बदनाम” तन्हा गलियो मे बिलकुल अकेला पाता

मन-मंदिर मे बसी “अनदेखी-अनजानी” वो सपनों के संसार की “स्वपन-सुंदरी”
जिसमे “सौंदर्यता” और “कोमार्यता” “कूट-कूट” के भरी.....

सच कहता हूँ मे.... सच कहता हूँ मे..... वो ही है मेरी.... वो ही है मेरी..... “स्वपन-परी”

चाँद की “चमक”....... सूरज की “दमक”..... टिमटिमाते तारों की रौनक से जिसका “आकाशरूपी” मनमोहक रूप लिखताआकर्षण” की नयी परिभाषा।
थोड़ी सी अलबेली सी...... लगती एक पहेली सी..... मेरी “स्वपन-परी”... मेरी जिज्ञासा

खुली जब आँख मेरी...... हो गया वास्तविकता से “वास्ता”
झट से पलट गयी बाजी ऐसे..... जैसे शतरंज का “पासा”

फिर से हुआ मेरा “निराशा” से सामना....... करता हु आजकल ईश्वर से ये ही “कामना”
हो जाए बस एक बार “मेरी स्वपन परी” के साथ “भौतिक-संसार” मे “आमना-सामना”   

ना जाने कब होंगे मेरे सपने साकार.... मिलेगा मेरी “उमंगभरी चाहतो” को स्वपनरुपि आकार
आएगी मेरे जीवन मे भी खुशियो की बहार
इंतज़ार है मेरी “स्वपन-परी” का आज भी
 कहता हु मे “बारंबार”.......... कहता हु मे “बारंबार

ना जाने ऐसा क्यू लगता है हरदम ... मिलेगी मेरी स्वपन-परी वही......
जो कहलाता है “विस्मयकारी” स्वपन-संसार

इंतज़ार है मेरी “स्वपन-परी” का आज भी
 कहता हु मे “बारंबार”.......... कहता हु मे “बारंबार

------ रोहित श्रीवस्तव -------

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Thursday, 5 June 2014

फायर इंजीनियरिंग एक बेहतरीन विकल्प


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Tuesday, 3 June 2014

आखिर ऐसा क्यों होता है ?


क्यों आती है हमें जम्हाई ?
हमें जब ऊब होती है या नींद आती है तो हम उबासी लेते है द्य और अगर आपने गौर करा हो तो किसी को उबासी लेते हुए देख आसपास के लोग भी उबासी लेने लगते है द्य यहाँ तक की किसी फोटोग्राफ देख या उबासी के बारे में पढ़कर भू उबासी आने लगती है द्य तकनीकी रूप से उबासी एक परिवर्ती क्रिया है, जिसमे घहरी सांस लेने के बाद मुह खुलता है

मक्का भूनने पर क्यों उछलते हैं दाने?
पॉपकॉर्न बनाने के लिए आमतौर पर जिस तरह के अनाज का इस्तेमाल किया जाता है, वे सख्त होते हैं। इनके बीच के हिस्से में दाना होता है, जिसके ऊपर कठोर स्टार्च की परत होती है। इसमें 10 से 15 प्रतिशत नमी भी होती है। जब अनाज को भूना जाता है, तो सबसे पहले निचले हिस्से की नमी गर्म होती है, जो गर्म होकर वाष्प में बदल जाती है और फैल जाती है। इसके फैलने से ऊपरी कठोर सतह पर दबाव पडता है और अनाज का दाना फट जाता है। यह वाष्प दाने के निचले हिस्से से एक झटके से निकलती है और न्यूटन के तीसरे नियम के मुताबिक दाने को ऊपर उछाल देती है।

हमें प्यास क्यों लगती है?
हमारे शरीर में नमक और पानी एक निश्चित रेशियो में होता है। जब ब्लड में किसी रीजन से पानी कम हो जाता है, तो इनका रेशियो बदल जाता है। ऐसी कंडीशन में दिमाग में मौजूद थर्स्ट सेंटर गले की नर्व्स को मैसेज भेजता है, जिससे गले में सिकुडन होती है। इस सिकुडन से गला सूखने लगता है और हमें प्यास महसूस होने लगती है।

जानवर अपनी बॉडी के टेंपरेचर को कैसे कंट्रोल करते हैं?
कई जानवरों के पास अपने बॉडी टेंपरेचर को नियंत्रित करने की नेचुरल इंस्टिक्ट होती है। ये अमूमन पसीना निकलने की गति या फिर सांस लेने की प्रक्रिया को रेगुलेट कर अपने शरीर का टेंपरेचर कम या ज्यादा कर सकते हैं। कुछ जानवरों जैसे कंगारू की त्वचा में पाई जाने वाली कोशिकाएं त्वचा के खासी नजदीक होती हैं, जिसके चलते उन्हें अपना ब्लड ठंडा रखने में मदद मिलती है, इससे उनके पूरे शरीर का टेंपरेचर ठंडा रहता है।

पेट्रोल इंजन में डीजल का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता?
पेट्रोल इंजन डीजल से नहीं चल सकते, क्योंकि पेट्रोल इंजन में स्पार्क पेट्रोल वेपर व पानी के मिक्सचर से पैदा होता है। यह इसलिए पॉसिबिल होता है क्योंकि पेट्रोल हाइली इंफ्लेबल व तेजी से वेपोराइज्ड होने में सक्षम होता है। लेकिन डीजल में यह खूबी नहीं होती है।

टीआरपी रेटिंग क्या होती है?
टीआरपी का मतलब है टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स। एक तरह से ये टेलीविजन कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने का तरीका है, जिसमें विभिन्न कार्यक्रमों को अंक दिये जाते हैं। ये काम टेलीविजन ऑडिएन्स मेजरमेंट (टैम) संस्था करती है। टैम देश भर में कई छोटे-बडे शहरों का चयन करके उसमें विभिन्न वर्ग के लोगों के घर तलाश करती है और फिर उनके टेलीविजन पर एक मीटर लगाती है। ये एक छोटा सा काला बंसा होता है जो ये नोट करता है कि आपने कब कितनी देर कौन से टेलीविजन चैनल का कौन सा कार्यक्रम देखा। महीने के अंत में ये आंकडे जुटाकर उनका विश्लेषण किया जाता है और उससे पता चलता है कि कौन सा कार्यक्रम कितना लोकप्रिय है।

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खोया हुआ साम्राज्यः कानपुर


भारत के अन्य सभी प्राचीन साम्राज्यों के समान कानपुर भी कभी एक महान राजा का साम्राज्य व राजधानी हुआ करता था । पुराणों की माने य यूं कहें कि कानपुर ही मानव जाती के प्रथम सम्राट की राजधानी था ।
कानपुर के पूर्व 5 मील गंगा तट पर जाजमऊ है जो अपने कर्म बल से इंद्र पदवी पाने वाले महाराज नहुष के पुत्र ययाति की राजधानी थाए भागीरथी के तट पर उनका किला गिरी हुई दशा में अब भी अतीत की सुधि दिलाता हैए राजा ययाति ने दैत्य गुरु शुक्राचार्य की मानिनी पुत्री देवयानी से विवाह किया था जिसनेे दैत्यराज वृषपर्वा की राजकुमारी शर्मिष्ठा को अपनी दासी बनाकर रखा था राजा ययाति का शर्मिष्ठा के साथ गुप्त सम्बन्ध देखकर देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से उनको वृद्ध हो जाने का श्राप दिलवाया थाए फिर राजा अपने व शर्मिष्ठा के पुत्र प्रसिद्ध पुरु से उसकी युवावस्था मांग कर जवान हो गए थे और अपनी काम वासना तृप्त करके फिर उन्होंने उसकी जवानी लौटा दी ।
राजा ययाति का सम्बन्ध कानपुर से था यह एक अन्य कथा द्वारा भी सिद्ध हो सकता हैए भोगनीपुर तहसील में मुगलरोड पर पुखरायां व घाटमपुर के बीच में यमुना जी के किनारे मूसानगर एक कस्बा है यहाँ मुक्तादेवी का प्राचीन मंदिर है, यही पर एक तालाब है जिसे देवयानी तालाब कहते है जैसा की ऊपर कहा जा चुका है, देवयानी ययाति की पत्नी थी ।
इन बातो से पता चलता है कि मूसानगर अतीत काल में शुक्राचार्य का आश्रम था मूसानगर मुक्तनगर का वैसा ही रूपांतर जान पड़ता है जैसे गाधिपुर से गाजीपुर ।

(स्रोत - कानपुर का इतिहास द्वारा नारायण प्रसाद अरोड़ा)

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