Friday, 30 November 2012

उसके आने का अब भी, इंतज़ार रहा इस दिल में


                                        
                                                
                                                खाली खाली सा एक ख्याल रहा इस दिल में।
उसके आने का अब भी, इंतज़ार रहा इस दिल में।।

प्यार की बस्ती उजड़कर, आज ख़ाक हो गई।
उसके होने का अब भी, अहसास रहा इस दिल में।।
 
इस तन्हा आलम में, रोते रहे बहुत हम पर।
मर कर भी जिन्दा, वो प्यार रहा इस दिल में।।
 
जिस्म से अलग हुआ था, वो मेरी जान से नहीं। 
एक आहट सी बनकर, वो पास रहा इस दिल में।।

लम्हे-लम्हे से जुदा करना चाहा था उसे मैंने।
बनकर वो धड़कन, धड़क आज रहा था इस दिल में।।
 
अश्कों की हर एक बूँद में, उसे समेटा हुआ था मैंने। 
कैसे कर दूँ जुदा उसे, ये सवाल रहा इस दिल में।।

                                                                     By- Swati Gupta

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सावधानी ही है बचाव :एड्स दिवस स्पेशल


हिन्दी में एक कहावत है अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेतयानि उस समय समस्या का समाधान करने से कोई फायदा नहीं जब समस्या बहुत बड़ी बन चुकी हो.कई बार आग लगे तब कुंआ खोदने की आदत इंसान के लिए बड़ी घातक सिद्ध होती है जैसे एड्स (AIDS) के केस में.
एड्स (AIDS) एक ऐसी बीमारी जो इंसान को जीते-जी मरने पर विवश कर देती है. आज एड्स (AIDS) दुनियाभर में सबसे घातक बीमारी के रूप में उभरकर सामने आया है. यह एक ऐसीबीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस बीमारी से बचा ही नही जा सकता. इस बीमारी का एकमात्र इलाज है बचाव.
सावधान हटी दुर्घटना घटी
सावधानी हटी दुर्घटना घटीयह शब्द एड्स (AIDS) की बीमारी के लिए बिलकुल प्रयुक्त साबित होते हैं. आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनैतिक संबंधों की बाढ़ में यह बीमारी और भी तेजी से फैल रही है. सिर्फ असुरक्षित यौन संबंधों से ही नहीं यह बीमारी संक्रमित खून या संक्रमित इंजेक्शन की वजह से भी फैलता है. आज यह बीमारी पूरे विश्व के लिए एक सरदर्द बन चुकी है और यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र भी इस बीमारी को बेहद गंभीरता से लेता है और हर साल 01 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के रूप में मनाता है.
प्रतिवर्ष 01 दिंसबर को विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day) के रूप में मनाया जाता है. विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day) की शुरूआत 1 दिसंबर 1988 को हुई थी जिसका मकसद, एचआईवी एड्स से ग्रसित लोगों की मदद करने के लिए धन जुटाना, लोगों में एड्स को रोकने के लिए जागरूकता फैलाना और एड्स से जुड़े मिथ को दूर करते हुए लोगों को शिक्षित करना था.
1988 से हर साल एक दिसंबर को विश्‍व एड्स दिवस मनाया जाता है. इस दिन लोगों को एड्स के लक्षण, इससे बचाव, उपचार, कारण इत्यादि के बारे में जानकारी दी जाती है और कई अभियान चलाए जाते हैं जिससे इस महामारी को जड़ से खत्म करने के प्रयास किए जा सकें.
World AIDS Day 2012 Theme: विश्व एड्स दिवस 2012 की थीम
इस वर्ष विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day) की थीम है गैटिंग टू जीरों’ (“Getting to Zero”). ‘गैटिंग टू जीरों’ (“Getting to Zero”) का उद्देश्य है कि कोई भी एचआईवी एड्स से नया व्यक्तिना तो पीडि़त हो और ना ही एड्स के कारण किसी की मृत्यु हो. यानी एचआईवी संक्रमण की दर को रोकते हुए शून्य स्तर तक लाना.
एड्स
आज एड्स के प्रति अच्छी खासी जागरुकता फैल चुकी है और अधिकतर लोग जान चुके हैं कि यह क्या है और कैसे होता है? 1980 के दशक के शुरुआत में इस बीमारी के सामने आने के बाद से अब तक दुनियाभर में लाखों की तादाद में लोग इस बीमारी से जान गंवा चुके हैं.यूएनएड्स के मुताबिक, कि अब तक 34 मिलियन लोग एड्स से ग्रसित हैं और 2010 तक 2.7 मिलियन लोग इस इंफेक्शन के संपर्क में आए हैं, जिसमें से 3 लाख 90 हजार बच्चे भी इसकी चपेट में आएं. इतना ही नहीं पिछले पांच सालों में यानी 2010 तक एड्स से ग्रसित लगभग 1.8 मिलियन लोगों की मौत हो चुकी है.
What is AIDS: एड्स क्या‍ है?
एड्स का पूरा नामएक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है.
Causes of AIDS: एड्स फैलने के कारण
एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित संभोग करना इस मर्ज के प्रसार का एक प्रमुख कारण है. ऐसे संबंध समलैंगिक भी हो सकते हैं. अन्य कारण हैं:
* Blood Transfusion: ब्लड-ट्रांसफ्यूजन के दौरान शरीर में एच.आई.वी. संक्रमित रक्त के चढ़ाए जाने पर.
* Infected Injection: एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति पर इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की सुई का इस्तेमाल करने से.
* एचआईवी पॉजिटिव महिला की गर्भावस्था या प्रसव के दौरान या फिर स्तनपान कराने से भी नवजात शिशु को यह मर्ज हो सकता है.
* इसके अलावा रक्त या शरीर के अन्य द्रव्यों जैसे वीर्य के एक दूसरे में मिल जानेसे. दूसरे लोगों के ब्लेड, उस्तरा और टूथ ब्रश का इस्तेमाल करने से भी एचआईवी का खतरा रहता है.
एड्स के लक्षण
एड्स होने पर मरीज का वजन अचानक कम होने लगता है और लंबे समय तक बुखार हो सकता है. काफी समय तक डायरिया बना रह सकता है. शरीर में गिल्टियों का बढ़ जाना व जीभपर भी काफी जख्म आदि हो सकते हैं.



एड्स संबंधित जांचें
* एलीसा टेस्ट
* वेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट
* एचआईवी पी-24 ऐंटीजेन (पी.सी.आर.)
* सीडी-4 काउंट
एड्स का उपचार
* एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए आशावान होना अत्यंत महत्वपूर्ण है. ऐसे भी लोग हैं जो एचआईवी/एड्स से पीड़ित होने के बावजूद पिछले 10 सालों से जी रहे हैं. अपने डॉक्टरों के निर्देशों पर पूरा अमल करें. दवाओं को सही तरीके से लेते रहना और एक स्वस्थ जीवनचर्या बनाये रखने से आप इस रोग को नियंत्रित कर सकते हैं.
* एच.ए.ए.आर.टी. (हाइली एक्टिव ऐंटी रेट्रो वायरस थेरैपी) एड्स सेंटर पर नि:शुल्क उपलब्ध है. यह एक नया साधारण व सुरक्षित उपचार है.
एड्स को लेकर भ्रम
कई लोग सोचते हैं कि एड्स रोगी के साथ उठने बैठने से यह रोग फैलता है तो यह गलत है. यह बीमारी छुआछूत की नहीं है. इस बीमारी को लेकर समाज में कई भ्रम हैंजिन्हें दूर करना बहुत जरूरी है. जैसे:
एड्स इन सब कारणों से नहीं फैलता:
* घर या ऑफिस में साथ-साथ रहने से.
* हाथ मिलाने से.
* कमोड, फोन या किसी के कपड़े से.
* मच्छर के काटने से.

लेख : अजय शुक्ला 

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महल,वो कौन थी और, मेरा साया जैसी फिल्मों की याद दिला गयी आमिर की "तलाश"


फिल्म की शुरुवात होती है एक शांत सड़क से जो अगले ही पल एक अकस्मात् सड़क हादसे की वजह से अशांत हो जाती है, इस हादसे में मशहूर फिल्म कलाकार अरमान कपूर की मौत हो जाती है इस केस का इनवेस्टिगेटिव ऑफिसर सुर्जन सिंह शेखावत (आमिर खान) है जिसकी ज़िन्दगी एक भी उसके साथ हुए एक बड़े हादसे से जूझ रही है जिसमे उसने अपने बेटे को खो दिया था, दूसरी तरफ सुर्जन की इस परेशानी को देखकर उसकी पत्नी श्रेया (रानी मुखर्जी) भी दुखी है । सुर्जन अपने केस की तहकीकात में बहुत ज्यादा मेहनत कर रहा है और हाई प्रोफाइल केस होने की वजह से खुद ही इस केस की तहकीकात कर रहा है, क्युकी हादसे की जगह से रेड लाइट एरिया के नजदीक है तो सुर्जन की तहकीकात भी उसको उस जगह लेकर जाती है, जहां उसके सामने धीरे-धीरे कई राज़ खुलते है  इस केस में उसकी मदद कर रही एक रोजी(करीना कपूर) नाम की लड़की जो खुद मुंबई की बदनाम गलियों से वास्ता रखती है और एक दिन सुर्जन को पता चलता है की जो रोजी उसकी मदद कर रही है उसका असली नाम सिमरन है और यहीं से इंस्पेक्टर शेखावत की तहकीकात एक नया मोड़ लेती है ।
                             बात की जाए अगर फिल्म की कहानी की तो वो पुरानी फिल्मो की याद दिलाती नज़र आयी, अभिनय के नज़रिए से सभी अपने किरदार के साथ इन्साफ करते नज़र आये और बात करें संगीत की तो वो फिल्म की पटकथा को पूरी तरह सूट करता है साथ ही रीमा कागती का निर्देशन लाज़वाब रहा है, मगर फिल्म उस जगह निराश करती है जब दर्शक किसी और तरह के राज़ की उम्मीद कर रहा था और उसके सामने एक बहुत ही आउटडेटेड राज सामने आता है ।

यहां अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है!

बहुत सारे ऐसे प्रश्न इधर-उधर बिखरे पड़े हैं जिनका कोई हल नहीं है या फिर उनका हल है भी तो किसी में इतनी क्षमता अब नहीं रह गई है कि वह उनका जवाब दे. जहां राजनीति के मार से पूरा देश बेहाल है वहां कौन यह हिमाकत करेगा कि आगे आए प्रश्नों को हल करे. सभी इसी में अपनी भलाई समझते हैं कि चुप रहो और अपने काम से काम रखो. अगर सभी यही करते रहेंगे तो आखिर कैसे इस तरह के प्रश्न सुलझ पाएंगे? मुख्य रूप से यह प्रश्न इस बात से जुड़े हैं कि आखिर कितनी आज़ादी है हमें अपने ही देश में हो रहे कुशासन के खिलाफ बोलने का?
अभिव्यक्ति=जेल: आज के भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बस नाम मात्र की रह गई है. ना तो आपको बोलने दिया जाता है और ना ही आपकी आवाज को सुनने की कोई जरूरत समझता है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अगर यही अधिकार छीन लिया जाता है तो उसके पास प्रतिवाद के लिए और क्या बचेगा. चाहे वो कोई भी मुद्दा हो अगर किसी ने आवाज उठाई उसके खिलाफ तो उसका परिणाम जेल या पुलिसिया कार्यवाही ही होता है जिसका अभी ताजा उदाहरण असीम त्रिवेदी और वो लडकिया जिन्होंने बाला साहब ठाकरे के मरने के दौरान मुंबई बंद पर कमेंट किया था. और भी कई उदाहरण है, समझने वाली बात ये नहीं है की क्या हो रहा है बल्कि समझना तो ये है की कब तक होगा ये कब तक सहनी पड़ेगी इस तरह की व्यथाए अपने ही देश में.
राजतंत्र की ओर: भारत कुछ दिनों बाद कहीं लोकतंत्र से राजतंत्र में न बदल जाए यह सबसे बड़ा भय है. एक लोकतंत्र में कोई भी किसी के ऊपर भी टिप्पणी कर सकता है पर अब यह भारत में नहीं देखा जा रहा है. कुछ छोटे-मोटे आवाज उठ कर सामने जरूर आ रहे हैं पर उसको दबाने में सत्ता पक्ष को कोई खास मुश्किल नहीं आ रही है. कोई कार्टून बना कर व्यंग्य कर रहा है तो कोई आज के सबसे बेहतर मीडिया फेसबुक के जरिए अपना विरोध कर रहा है पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ रहा है. व्यंग्य कोई खराब विधा नहीं है. अगर इसका प्रयोग सकारात्मक तरीके से किया जाए तो यह एक अच्छा संदेश जनता तक पहुंचा सकती है पर आज के युग में स्वस्थ व्यंग्य भी एक दुर्लभ कृति हो गई है. व्यंग्य के नाम पर आज गाली-गलौज हावी हो गए हैं और गालियां भारत की पहचान नहीं हो सकती हैं.
लेख : अजय शुक्ला

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Thursday, 29 November 2012

महबूबा



ज़िन्दगी को चाहा था दिल से
 , महबूबा थी वो मेरी...
ठुकराया उसने मुझे हर कदम पर ,
 ना कभी मेरी बनी...
चला मैं जीना छोड़ कर ,
 हर पल हर घड़ी...
जाने वो कौन सा मोड़ था ,
 मिली जहाँ एक हसीना खड़ी...
मौत था नाम उसका , 
मुझे देख हँस पड़ी...
बोली कहाँ गया था भटक ,
 मैं ही तो थी तेरे लिए बनी...
ज़िन्दगी से ज़्यादा चाहूँगी तुझे ,
 एक बार अपना तो सही........

लेख - अंकुर सहाय 

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Wednesday, 28 November 2012

नेट बैंकिंग में बरतें सतर्कता


बैंक खातों से जुड़ी सूचनाएं हासिल करके जालसाजी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। यदि बैंक का हवाला देकर आपसे कोई व्यक्ति पैन, डेबिट या क्रेडिट कार्ड संबंधी किसी भी तरह की सूचना मांगता है तो हरगिज न दें। जरा सी लापरवाही से आपके हाथ से मेहनत की कमाई पल भर में निकल सकती है
 नेट बैंकिंग ने लोगों की काफी समस्याओं का समाधान कर दिया है लेकिन जैसे-जैसे इस तकनीक का उपयोग बढ़ता जा रहा है, इस क्षेत्र में जालसाज भी तेजी से सक्रिय होते जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में हैकरों ने नेट बैंकिंग के दौरान सेंध लगाकर ग्राहकों को 3000 करोड़ रुपए की चपता लगा दी। सिर्फ कम पढ़े-लिखे लोग ही नहीं बल्कि साफ्टवेयर इंजीनियर तक ऐसी घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। फिलहाल ऐसा कोई hatiyaarहतियार नहीं बन पाया है जिससे हैकिंग के जरिए लोगों को चपत लगाने वाले लोगों पर शकिंगा कसा जा सके। फिलहाल केवल सतर्कता बरत कर ही नेट बैंकिंग के जोखिम को कम किया जा सकता है।

क्या है खतरा जब आप नेट बैंकिंग के जरिए कोई लेनदेन करते हैं तो बैंक की वेबसाइट पर जाकर आपको अपने खाते से संबंधित यूजर आईडी और पार्सवड जैसी कुछ सूचनाएं दर्ज करनी होती हैं। इस दौरान हैकर्स आपके खाते संबंधी गोपनीय सूचनाएं हासिल कर लेते हैं। इनके जरिए बाद में वह आपके खाते की रकम अन्य खातों में ट्रांसफर कर लेते हैं या फिर इसके जरिए खरीदारी कर लेते हैं। एक बार खाते से रकम निकल जाने के बाद उसकी वापसी लगभग नामुमकिन हो जाती है।

क्या है सुरक्षा हैकर्स से निपटने के लिए ज्यादातर बैंक अपने ग्राहकों के लेनदेन संबंधी गतिविधियों पर नजर रखते हैं। यह कार्य ग्राहक के पिछले लेनदेन के व्यवहार को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसके लिए बैंक दिग्गज आईटी कंपनियों द्वारा तैयार साफ्टवेयरों की मदद ले रहे हैं। इनके जरिए हैकर्स के हमलों को काफी हद तक रोका जा रहा है लेकिन हैकर्स भी साफ्टवेयर की बारीकियों से वाकिफ होते हैं इसलिए उन पर पूरी तरह से अंकुश लगा पाना संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सावधानी ही एकमात्र ऐसा उपाय है जिसके जरिए नुकसान को रोका जा सकता है।

बेवसाइट की पहचान लोगों को भ्रम में डालने के लिए हैकर्स फर्जी वेबसाइट बना लेते हैं जो प्रथम दृष्टया बैंकों या अन्य किसी लेनेदेन करने वाली संस्था से बिल्कुल मिलती-जुलती होती हैं। खाता धारक जैसे ही इस पर कोई सूचना दर्ज करता है वह हैकर्स के डाटा बॉक्स में चली जाती है। इसके बाद वह ग्राहक के खाते में सेंध लगाकर रकम साफ कर लेते हैं। एक सव्रे के अनुसार आधी से ज्यादा वेबसाइट सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में नेट बैंकिंग के जरिए कोई लेनदेन करने से पूर्व जरूरी है कि ऐसी कोई भी वेबासाइट पूरी तरह जांच-परख करने के बाद ही खोली जाए। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही अपने खाते को लॉग इन करें।

सीमित करें उपयोग यदि आपको नेट बैंकिंग के जरिए फंड ट्रांसफार्मर करना है तो काम पूरा होने के तुरंत बाद लॉग आउट करें। कई लोग कंप्यूटर पर अपना बैंक खाता खोलकर छोड़ देते हैं। यह कदम आपके लिए काफी नुकसानदेय साबित हो साबित हो सकता है। बैंक खाता ज्यादा देर तक खुला रहने की स्थिति में हैकर्स आपकी रकम पर हमला कर सकते हैं। नेट बैंकिंग के लिए साइबर कैफे और शेर्यड कंप्यूटर का इस्तेमाल जरूरी होने पर ही करें। यदि आप कैफे या शेर्यड कंप्यूटर से बैंकिंग लेनेदन करते भी हैं तो अपना पार्सवड नियमित रूप से बदलते रहें। पार्सवड यूनिक होना चाहिए। उसे किसी डायरी, मोबाइल आदि में नोट न करें। लेटर्स और नंबर्स के साथ स्पेशल करेक्टर्स का पार्सवड सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर माना जाता है।

बैंक को बताएं यदि नेट बैंकिंग के दौरान आपको माउस का कर्सर चलने या टाइपिंग जैसी कोई संदिग्ध गतिविधि नजर आ रही है तो सिस्टम को सीधे बंद न करें। यह आपके लिए असुरक्षित कदम साबित हो सकता है। सही तरीका यही है कि कंप्यूटर को पहले लॉग आफ करें और उसके बाद शटडाउन करें। इसके बाद संदिग्ध गतिविधि के बारे में अपने बैंक को बताएं। इसके लिए बैंक के कस्टमर केयर पर भी फोन कर सकते हैं।

गोपनीय रखें सूचनाएं यूजर आईडी, पार्सवड और डेबिट कार्ड नंबर सूचना की दृष्टि से काफी संवेदनशील होते हैं। इन सूचनाओं को किसी के भी साथ शेयर नहीं करना चाहिए। याद रखें कि बैंक कभी भी आपसे कभी इन सूचनाओं को नहीं मांगता। यदि कोई व्यक्ति आपके बैंक का हवाला देकर डेबिट कार्ड का पिन, लॉग इन पार्सवड मांगता है तो हरगिज न दें। इसी तरह पैन कार्ड का नंबर भी किसी को न बताएं। जालसाज अक्सर बैंक का हवाला देकर ईमेल के जरिए इस तरह की सूचनाएं हासिल करते हैं। याद रखें, जरा सी लापरवाही से आपकी मेहनत की कमाई हाथ से निकल सकती है।

लेख : अजय शुक्ला 

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ऎसी कार जो औरतों को बनाएगी खूबसूरत

नई दिल्ली। जापान की कंपनी होंडा मोटर्स ने हाल ही में अपनी नई कार "होंडा फिट शी"लांच की। यह कार खासतौर पर महिलाओं के लिए लांच की गई है। कार में वुमन फ्रेंडली फीचर्स हैं। इसमें एडवांस एसी सिस्टम और क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम शामिल है। कंपनी का दावा है कि इन सिस्टम से कार ड्राइव करने वाले की स्किन क्वालिटी सुधरेगी। 

इसकी शुरूआती कीमत करीब 17 हजार 500 डॉलर है। होंडा फिट शी में ऎसी विंड स्क्रीन है जिससे यूवी रेज के कारण चेहरे पर पड़ने वाली झुर्रियां 99 फीसदी खत्म हो जाएगी। कार में लगा एयर कंडीशन उन पार्टिकल्स को बाहर निकाल देगा जिसके कारण स्कीन काली पड़ जाती है। इससे स्कीन और स्मूथ होगी और महिलाएं तेज धूप में भी आराम से कार चला सकेंगी। कार का कलर भी पिंक रखा गया है ताकि महिलाओं को ज्यादा पसंद आए। 

जिन महिलाओं को पिंक कलर पसंद न हो वे ब्राउन और व्हाइट कलर की भी खरीद सकती हैं। यह कार खासतौर पर जापान की कामकाजी और घरेलू महिलाओं को ध्यान में रखकर उतारी गई है। यह कार फिलहाल कनाडा और अमरीका में नहीं मिलेगी।

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फांसी का वीडियो नही हो सार्वजनिक



कसाब की फांसी के साथ ही मेनस्ट्रीम से लेकर सोशयल मीडिया एक सवाल लगातार पुछने लगा था कि क्या कसाब की फांसी से पीड़ितो को मिला इंसाफ ? यह सवाल अपने आप में निंदनीय हैं.हम सब भलि भांति जानते/समझते हैं की पीड़ितो ने 26/11 के दौरान जो दर्द सहा वो एक 26/11 का नही.बल्कि हर रोज़ का हैं.ज़िंदगी भर का हैं और हर वर्ष एक 26/11 इस दर्द को पुन:जीवित कर जाती हैं.यह सच हैं की फांसी से शायद पीड़ितो को इतनी संतुष्टि मिली होगी की हमारे देश में खुलेआम कत्लेआम करने वाले आतंकी को पनाह तो कम से कम हमारी सरकार अब नही दें रही.इस मसले को लेकर अलग अलग मत हो सकते हैं पर यह साफ़ कर दूं की कितना भी खर्चा क्यों ना हुआ हो.एक न्यायिक व्यवस्था के तहत कसाब को अपना पक्ष रखने का मौका प्रदान कर हमारें देश ने दुनिया भर में एक मिशाल काय़म की हैं.इसके पीछे राजनीतिक रणनीतियां भी हो सकती हैं लेकिन जिस देश को हम दुनिया का सबसे बढ़ा लोकतंत्र कहते हैं और जहां अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी खुद को गांधीवाधी कहते हैं वहां अन्ना का यह कहना की कसाब को सरेआम फांसी दी जानी चाहिए थी घोर निंदा योग्य हैं.रफ्तार लाईव पर भी एक लेख चला जिसका शीर्षक था-'कसाब की फांसी का वीडियो होनी चाहिए सार्वजनिक' का भी मैं समर्थन नही करता.हमे समझना होगा की जिस गांधी को हम आज तक केवल नारों मात्र में इस्तेमाल करना एक बेहतर विकल्प समझते आएं हैं उनका खुद का यह मानना था की 'अपराधी से नही अपराध से घृणा करों ' ऐसे में बदले की भावना और इस तरह की भावना रख हम किस दिशा की ओर ले जाएंगे देश को.?सवाल और भी कई हैं.जहां तकरीबन डेढ़ सौ देश फांसी के खिलाफ़ संयुक्त राष्ट्र में खड़े हैं वहां हम वीडियो सार्वजनिक कर के आखिर क्या सिद्ध करना चाहते हैं.?वीडियो सार्वजनिक करने के अपने आप में उनेक ख़तरे भी हैं जिसे ऐसी मांगे करने से पहले समझना चाहिए.उग्रवादी,अलगाववादी,और आतंकी वैसे भी सहानुभूति बटोरने के मौके की तलाश में हैं.वीडियो के सार्वजनिक होने का मतलब होगा कसाब को लेकर एक और विस्फोट करना.यह बात पूरी तरह साफ़ हैं की जिन लोगों ने अपने दोस्तों,रिश्तेदारों,अपनो,को खोया उनका जख़्म आज तक ताजा हैं.लेकिन,फैसला हमें करना होगा की हमारी जंग आखिर हैं किस के खिलाफ़?क्या एक कसाब से या हाफिज सईद से? या पूरे के पूरे आतंकवाद से.हमे अपनी सरकार पर इस मामले में कम से कम इतना तो भरोसा रखना होगा की सुरक्षा के लिहाज से ना सही लेकिन राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए उसने एक ऐसा कदम उठा दिया हैं जो अपने आप में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के लिहाज से काब़िले तारीफ हैं.और जो लोग कसाब की मौत को डेंगू से जोड़ रहें हैं उन पर हंसना भी लाज़िम नही.इतने गम्भीर मसले को इस तरह हल्के में लेना और अंतराष्ट्रिय मुआमले को डेंगू मच्छर पर खत्म कर प्रश्न चिन्ह उठाना,किसी तरह से उचित नही.

लेख - अंकित मुत्त्रिजा 

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