Wednesday, 24 September 2014

Company profile of Badshah Namkeen


Badshah Namkeen was established in 1965, as a sweets and namkeen shop inKanpur (UP)  & Faridabad. Mr.Jaganath Singh Rajpurohit the founders of “Namkeeno Ka Badshah” started with a firm “Shree Bikaner namkeen Bhandar” and always cherished the dream of building an empire, manufacture traditional sweets/namkeens, to leave a mark on the heart of common man. Since then, the company has grown to become one of the leading manufacturers of sweets and namkeen. Badshah Namkeen has been branded as "Three (3) star category product by IIA (India Industries Association) in 2012. 

Over the years Badshah Namkeen has provided the satisfying happiness of truly delicious and authentic tastes through a wide ranging variety of products. In a very short span of time another plant “Badshah Bikaner Food Pvt Ltd” was established in Kanpur 2009. With the success and loveable acceptance from the society ‘Badshah Namkeen’ set up its third plant at Kanpur as “Hinglag Food Product Pvt Ltd” to Manufacture Rusk and Cookies. “Namkeeno Ka Badshah” developed into a brand and became an inseparable part from any occasion.

In order to satisfy our customers and consumers, Badshah Namkeen has provided not only the most delicious tasting flavors, but also dedicated ourselves to ensuring the products are of the very best quality. This was followed by a chain of retail outlets & showrooms. Sweets, Snack, cookies Rusk and Namkeens were presented in more durable and commercially viable packaging. This fetched an overwhelming response and the creditable part goes to the Third generation which is now handling the pro and cons of Brand “Namkeeno Ka Badshah” with a dream to expand the business roots worldwide.

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Sunday, 21 September 2014

'मोदी-नीति' का एक और 'अचूक' निशाना ......


दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत की विदेश नीति के संदर्भ मे एक बात सदियो से कही जा रही है कि यहा सामान्यतः प्रति 5 साल मे सत्ता का स्थानांतरण तो होता है परंतु भारतीय-विदेश-नीति मे कोई खासा परिवर्तन नहीं होता। अगर बात की जाए पूर्व प्रधानमंत्रियो की तो प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर डॉ मनमोहन सिंह की विदेश-नीति प्रत्यक्षतः बड़ी नपि-तुली और लचीली दिखाई देती है। हालाकि श्रीमति इन्दिरा गांधी और श्री लाल बहादुर शास्त्री ने बेशक इस छोर पर थोड़ी आक्रामकता का परिचय दिया था। पूर्वी पाकिस्तान का एक स्वतंत्र देश बांग्लादेश मे जन्म उसी बेबाक विदेश नीति का नतीजा था।  यहाँ पर यह बताना आवश्यक होगा की राजीव गांधी की सरकार के बाद केंद्र मे लगभग सभी गठबंधन वाली मजबूर सरकारे रही है। ऐसी सरकारो की अपनी ही कुछ मजबूरीया एवं कटिबद्धयता होती है जिसने भारतीय विदेश-नीति को सालो-साल कमजोर बनाए रखा है। पूर्व की यूपीए सरकार के मुख्य-घटक दल डीएमके का बार-बार (सरकार गिराने की धमकी के साथ) तमिल-मुद्दे पर श्रीलंका के लिए निर्धारित होने वाली विदेश-नीति को प्रभावित करना इसका जीवंत उदाहरण है।
वर्तमान मे केंद्र मे मोदी के नेत्रत्व वाली एनडीए की पूर्ण-बहुमत वाली सशक्त-एनडीए सरकार है जिसे सरकार चलाने के लिए किसी बैसाखी की आवश्यकता नहीं है। यह सरकार नीति (हो या फिर विदेश-नीति) बनाने लिए पूरी तरह से स्वतंत्र दिखाई देती है। हाल के कुछ दिनो मे यह  स्वतन्त्रता भारत सरकार के चाल-चलन मे प्रत्यक्ष रूप से क्रियान्वित भी दिखती है।

ऐसा महसूस होने लगा है की अब भारत मे भी दृढ़-विदेश-नीति बनने का सिलसिला शुरू हो गया है। हाँ, अगर मैं इसको विदेश-नीति न कहकर मोदी-नीति कहूँ तो बिलकुल गलत नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथ लेने से पूर्व ही उस मोदी-नीति पर कार्य करना शुरू कर दिया था। सर्वप्रथम उन्होने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म को अपने शपथग्रहण समारोह मे आमंत्रित कर भारत ही नहीं दुनिया के राजनीतिक पंडितो और बुद्धिजीवियों को चौका दिया था। गौरतलब है पूर्व की मनमोहन सरकार पड़ोसी देशो के साथ अपने सामरिक रिश्ते बनाने मे पूरी तरह से नाकामयाब रही थी। यहाँ तक कि भारत से नेपाल और श्रीलंका जैसे मैत्रिक देश भी नाखुश थे। मोदी की नेपाल और भूटान यात्रा ने दोनों देशो के भारत के साथ संबंधो की एक नयी इबारत लिखने की शुरुआत जरूर की है। मोदी को यह बात मालूम है अगर देश को विकास की राह पर ले जाना है तो उन्हे अपना पड़ोस भी दुरुष्त करना होगा उसी  कवादत मे वह भारतीय प्रधानमंत्री के तौर पर 17 साल बाद नेपाल के दौरे पर गए। यह दौरा कई मानो मे ऐतिहासिक रहा चाहे वो नेपाल प्रधानमंत्री द्वारा प्रोटोकॉल तोड़ कर भारतीय प्रधानमंत्री को एयरपोर्ट पर स्वागत करना हो या फिर नरेंद्र मोदी का नेपाली संसद मे भाषण। गौरतलब है यह नेपाल के इतिहास मे पहला वाक़या था की किसी गैर-नेपाली प्रधानमंत्री ने नेपाली संसद को संबोधित किया हो। भारत के लिए यह गौरवशाली क्षण था।
मोदी का जापान दौरा भी भारतीय-प्रपेक्ष मे कारगर साबित हुआ। भारत और जापान ने कई महत्वपूर्ण संधियो पर हस्ताक्षर किए। जापान ने अगले पांच सालो में भारत में निजी और सार्वजनिक क्ष्त्रो में 34 अरब डॉलर का निवेश करने का ऐलान भी किया। जापान सर्वदा भारत का मित्र देश रहा है मोदी भली-भांति अपनी जापान-यात्रा के महत्व को समझते थे। इसको मोदी-नीति की सफलता ही कहा जाएगा कि उन्होने अपने पहले ही दौरे मे जापान के साथ सामरिक आर्थिक और वैश्विक रिश्तो को एक नया आयाम देने की कोशिश की है।

मोदी का पाकिस्तान के साथ हूरियत-मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ सचिव-स्तर वार्ता स्थगित करना उसी मोदी-नीति का हिस्सा है। भारत ने दो-टूक शब्दो मे पाकिस्तान के हुक्मरानो को संदेश दे दिया है या तो आप हमसे बात करे या फिर उनसे। दोहरा-रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत-यात्रा मोदी के लिए एक परीक्षा से कम नहीं थी। जहां चीन की सेना लगातार लद्दाख मे अतिक्रमण का गंदा खेल जारी रखे हुए है उसी वक़्त मे चीनी राष्ट्रपति का दौरा मोदी के लिए चुनौतीपूर्ण था। मोदी ने उस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना भी किया है। यह सभी को ज्ञात है ड्रैगन भारत से हर स्तर मे बहुत आगे है। भारत कभी भी चीन के साथ युद्ध की स्थिति मे नहीं जाना चाहेगा परंतु मोदी ने चिनफिंग को सीमा और अन्य मुद्दो पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए इशारो मे जता भी दिया है कि भारत भी ऐसी नापाक हरकते एक सीमा तक बर्दाश्त करेगा। भारत और चीन ने कुल 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए साथ ही साथ चीन अगले पांच सालों में भारत मे 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
अंततः निष्कर्ष मे सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि मोदी-नीति के विभिन्न रंगो का ही कमाल है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ-संकेत दिखने लगे है। मोदी के आने से निवेशको मे पूर्व की अपेक्षा अवश्य ही विश्वास बढ़ा है। महंगाई-डायन पर नियंत्रण करने का प्रयास जारी है। इसमे तनिक भी संशय नहीं है अगर मोदी इसी तरह अचूक निशाने लगाते रहे तो सच मानिए अच्छे दिन अब दूर नहीं।  JJ

लेखक : रोहित श्रीवास्तव


(आलेख मे प्रस्तुत विचार निजी है)                         

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Tuesday, 16 September 2014

उत्तर प्रदेश उपचुनावों के नतीजो का मेरा विश्लेषण


यूपी के उप-चुनाव बिलकुल सेमी-फ़ाइनल की तरह थे। असल मुकाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच था। रुझानो से तो यही प्रतीत होता है कि सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को पीछे छोड़ते हुए यह बाजी मार ली है। भारतीय जनता पार्टी जिसने लोकसभा चुनावो मे यूपी मे शानदार प्रदर्शन किया था उसके लिए यह नतीजे आँख खोलने वाले है।
                                                            
कब तक बीजेपी 'मोदी-लहर' की बैसाखी के सहारे चलती रहेगी?

लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी उपचुनावों मे लगातार मुह की खा रही है चाहे वो बिहार हो या उत्तराखंड या फिर कर्नाटक , पार्टी ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया है।

अगर बीजेपी की हार तथा एसपी की जीत का विश्लेषण किया जाए तो यह बातें निकाल कर आती है:-

* लव-जिहाद का मुद्दा बीजेपी के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ।
* योगी आदित्यनाथ की अति-आक्रामकता को जनता ने नकारा।
* 'मोदी-लहर' पर पूर्ण रूप से निर्भरता
* नरेंद्र मोदी नेत्रत्व वाली केंद्र सरकार का जनता की 'अच्छे दिनो की उमीदों' पर पूरी तरह से खरा नहीं उतरना।
* बीजेपी और उनके प्रवक्ताओ का अति-विश्वास। मुझे लगता है लोकसभा चुनावो के बाद बीजेपी के प्रवक्ताओ मे आक्रामकता बढ़ गयी है उन्हे थोड़ा 'नम्र-विनर्म' रहने की आवश्यकता है।

समाजवादी पार्टी और बीजेपी का दोहरा मापदंड देखिये।

रुझानो के बाद एसपी के प्रवक्ता और कानूनी सिपह-सालार गौरव भाटिया ने बयान दिया है कि यह जीत यूपी सरकार के मुख्यमंत्री की 'धर्मनिरपेक्षी' और 'विकास' की नीतियो की है। मेरी समझ से परे है वह किन नीतियो कि बात कर रहे है शायद यूपी मे चरमराई हुई शासन-व्यवस्था के बारे मे वह भूल गए है  जहां 'गुनाह-ए-जुर्म' अपने ही एक शिखर पर है।

दूसरी तरफ मोदी लहर  के प्रश्न पर बीजेपी के प्रवक्ता संबित पत्रा ने जवाब मे कहा इस चुनाव को मोदी जी से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। संबित जी ठीक फरमाया सहमत हूँ पर अभी 2 दिन पहले आए डूसू छात्रसंघ  चुनावो मे जीत पर बीजेपी के ही प्रवक्ता ने कहा था 'यह जीत मोदी-लहर की ही है' ।  उधर काँग्रेस स्वयं की जीत से ज्यादा अति प्रसन्न बीजेपी कि हार और एसपी कि जीत से लगती है। दिलचस्प बात यह है कि इन चुनावो मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और काँग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी पार्टियों के लिए प्रछर नहीं था।

सच मैं भारतीय राजनीति अवसरवादिता से पूर्णत:  ग्रस्त है। चाहे वो बिहार कि राजनीति मे 'लालू-नितीश' का 'अनैतिक' गठबंधन हो या फिर बीएसपी का संदेहात्मक तरीके से यूपी उपचुनावों मे भाग न लेना।
देखते रहिए यह है 'भारतीय-राजनीति-सर्कस' और हम (आम आदमी)  है 'मूक-दर्शक

लेखक : रोहित श्रीवास्तव


(आलेख मे प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार है )

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Friday, 12 September 2014

कौन है ‘दिल्ली’ का गुनाहगार??


दिल्ली सिर्फ देश की राजधानी ही नहीं है अपितु भारत का दिल भी है। देश की दशा और दिशा की रूपरेखा दिल्ली ही निर्धारित करती है। भारतीय राजनीति का केंद्र है दिल्ली। शायद इतने तथ्य दिल्ली के महत्व एवं भारतीय प्रपेक्ष मे इसकी उपयोगिता स्थापित करने के लिए काफी है। पिछले कुछ दिनो से दिल्ली के अंदर सरकार बनाने के लिए जो राजनीतिक उठा-पटक शुरू हुयी है वो दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं बल्कि शर्मनाक है।

सवाल उठता है ऐसे हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? दिल्ली को अनाथ किसने बनाया? कब मिलेगा दिल्ली को अपना मुखिया’? कौन हैं दिल्ली के गुनाहगार ? बात अगर गुनहगारों कि की जाए तो सबसे पहला नाम आम आदमी पार्टी के चीफ़ अरविंद केजरीवाल का आता है। दिल्ली विधानसभा के नतीजो मे किसी को बहुमत नहीं मिल पाया था। काफी माथाचप्पी के बाद केजरीवाल ने इतिहास रचते हुए काँग्रेस के समर्थन के साथ दिल्ली मे आम आदमी पार्टी की सरकार बनाई थी। 49 दिन के बाद ही जनलोकपाल बिल के समर्थन के मुद्दे पर उन्होने संयम खोकर जोश मे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उस समय 2014 के लोकसभा चुनाव सामने थे राजनीतिक विशेषज्ञो ने माना था कि केजरीवाल खुद को शहीद दिखा कर उसका फायदा राष्ट्रीय-स्तर पर संसदीय चुनावो मे उठाना चाहते थे। पर ऐसा हुआ नहीं आम आदमी पार्टी को लोकसभा चुनावो मे मुह की खानी पड़ी और उनकी झोली मे केवल 4 सीट ही आयी थी।  लोकसभा मे हार के बाद केजरीवाल दिल्ली की राजनीति मे वापस आ गए है और पिछले कुछ दिनो से दुबारा चुनाव की मांग कर रहे है।

गुनहगारों की सूची मे अगला नाम है माननीय उपराज्यपाल नसीब जंग साहिब का। कुछ हद तक इस असमंजस कि स्थिति के वह भी जिम्मेदार है। उन्होने दिल्ली की विधानसभा को भंग न करते हुए राष्ट्रपति-शासन की सिफ़ारिश कर दी थी। शायद वो कुछ संख्त और सटीक कदम उठाने मे नाकामयाब रहे है।

अगर बात की जाए काँग्रेस और बीजेपी की तो राष्ट्रीय पार्टियां होते हुए उनकी ज़िम्मेदारी बड़ी थी। दिल्ली को अनाथ बनाने मे इन दोनों की भागीदारी बराबर है। दिल्ली मे 17 फरवरी 2014 को राष्ट्रपति शासन लग गया था उसके बाद ना काँग्रेस ने ना ही भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा चुनाव की बात की है। उधर जहां काँग्रेस किसी भी हालत मे सरकार बनाने की स्थिति मे नहीं है फिर भीं उसने कभी खुले तौर पर दिल्ली मे दोबारा चुनाव का समर्थन नहीं दिया है। काँग्रेस पार्टी का तर्क था कि वो दिल्ली की जनता पर चुनावी ख्रचे नहीं थोपना चाहते पर सच्चाई ये है काँग्रेस अंदर से जानती है उनकी स्थिति दिल्ली मे ठीक नहीं है। पुन्र-मतदान उनके लिए घाटे का ही सौदा होगा।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी भी चुनाव के पक्ष मे नहीं है जोकि बड़ा आश्चर्यजनक है। लोकसभा चुनावो मे बीजेपी को दिल्ली की सारी सात सीटो पर शानदार जीत जीत मिली थी। तो फिर बीजेपी को चुनाव मे जाने का डर क्यूँ है? क्या उन्हे लगता है केंद्र की मोदी सरकार आम जनता की उमीदों के मुताबिक खरी नहीं उतरी है? यही बात बीजेपी को दिल्ली विधानसभा चुनावों मे नुकसान पहुंचा सकती है?भारतीय जनता पार्टी पीछे के रास्ते से ही सरकार क्यों बनाना चाहती है? बड़ा प्रश्न उठता है जब बीजेपी के पास 32 विधायक थे तब उन्होने सरकार बनाने से मना कर दिया था अब उनकी संख्या 29 है तो किस आधार पर पार्टी सरकार बनाने के पूरी तरह तैयार दिखती है। बीजेपी के दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने प्रैस-वार्ता के दौरान इस बात के संकेत भी दिये है।

बरहाल वर्तमान की स्थिति यह है कि एलजी साहिब ने राष्ट्रपति को बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्यौता भेजने की सिफ़ारिश कर दी है।  केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने एक और नया सगुफा छोड़ा है। पार्टी ने एक स्टिंग का विडियो जारी किया है जिसमे बीजेपी दिल्ली प्रदेश के उपाध्यक्ष शेर सिंह डागर को आप के विधायकों को 4 करोड़ की पेशकश करते हुए दिखाया गया है जिसने बीजेपी को थोड़ा बेक-फुट पर जरूर खड़ा कर दिया है। अब देखने वाली बात होगी दिल्ली कि राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा।


लेखक  : रोहित श्रीवास्तव

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Thursday, 11 September 2014

'इजहार-ए-इश्क़'


'इजहार-ए-इश्क़' खता थी मेरी
जब हमे मालूम चला
चली गयी वो इतना दूर
फिर किस बात का सिकवा-गिला

साथ मे उसके चली गयी
मेरी सारी खुशियाँ
रुसवा करके चला गया
वो रंग-रसिया

बेवफ़ा ना थी
वो मेरी 'स्वपन-ए-मल्लिका'
किस्मत का  खेल है सारा
ईसपे बस चला है 'किसका'

बदकिस्मती की नुमाइश मेरी
लगती है मेरे 'मौला' की ख्वाइश
जब चला मैं अपना 'दुखड़ा-रोने'

बन गयी वो मेरी 'वाइफ'

लेखक  : रोहित श्रीवास्तव

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