Friday, 31 January 2014

स्मरण / सुरैया (पुण्यतिथि 31 जनवरी) ये कैसी अज़ब दास्तां हो गई है, छुपाते छुपाते बयां हो गई है !

                                                                               


पिछली सदी के चौथे और पांचवे दशक की अभिनेत्री तथा गायिका सुरैया भारतीय सिनेमा की पहली 'ग्लैमर गर्ल' मानी जाती है। वे अपने अभिनय के लिए कम, अपने सौंदर्य और मर्यादित, दिलफ़रेब अदाओं के लिए ज्यादा चर्चा में रही। उनका रहस्यमय आभामंडल ऐसा था कि देश के कोने-कोने से लोग उनकी एक झलक पाने के लिए कई-कई दिनों तक उनके घर के आसपास पड़े रहते थे। देवानंद के साथ उनका असफल रिश्ता, उनका अविवाहित तथा एकाकी जीवन और उनकी गुमनाम मौत बॉलीवुड की सबसे दर्दनाक और त्रासद प्रेम कहानियों में एक रही है। नायिका के तौर पर उनकी पहली फिल्म 'तदबीर' 1945 में आई थी। सुरैया की अन्य चर्चित फिल्मे थीं - उमर खैयाम, विद्या, परवाना, अफसर, प्यार की जीत, शमा, बड़ी बहन , दिल्लगी, वारिस, विल्बमंगल, रंगमहल, माशूका, मालिक, जीत, खूबसूरत, दीवाना, डाकबंगला, अनमोल घडी, मिर्ज़ा ग़ालिब और रुस्तम सोहराब। अभिनेत्री के अलावा सुरैया अपने दौर की बेहतरीन गायिका भी थी जिनकी खनकती, महीन, सुरीली आवाज़ के लाखों मुरीद आज भी हैं। संगीतकार नौशाद ने पहली बार उन्हें फिल्म 'शारदा' में गाने का मौका दिया था। उनके कुछ बेहद लोकप्रिय गीत हैं - तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी, जब तुम ही नहीं अपने दुनिया ही बेगानी है, मन मोर हुआ मतवाला, तुम मुझको भूल जाओ, ओ दूर जानेवाले वादा न भूल जाना, मन लेता है अंगडाई, धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम, नैन दीवाने एक नहीं माने, सोचा था क्या क्या हो गया, वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समय रहते हैं, मुरली वाले मुरली बजा, तेरे नैनो ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया, आपसे प्यार हुआ जाता है, नुक्ताचीं है गमे दिल उसको सुनाए न बने, दिले नादां तुझे हुआ क्या है, ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले यार होता, ये कैसी अज़ब दास्तां हो गई है, ऐ दिलरुबा नज़रे मिला आदि। सुरैया की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि, फिल्म 'शमा' के लिए उन्हीं की गाई उनकी पसंदीदा ग़ज़ल के साथ !

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम 
मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम 

खिलाओ फूल कहीं भी किसी चमन में रहो 
जो दिल की राह से गुज़री है वो बहार हो तुम 

ज़हे नसीब अता की जो दर्द की सौगात 
वो ग़म हसीन है जिस ग़म के ज़िम्मेदार हो तुम 

- कैफ़ी आज़मी

Labels: ,

Thursday, 30 January 2014

12 Years A Slave (English)


12 Years A Slave (English): The film which  won the Golden Globe Award for the Best Motion Picture (Drama), nominated for 9 Academy Awards and also, which will be releasing in India today, is indeed an all and all well directed film having shades of directors like John Ford, Steven Spielberg and even Quentin Tarantino. The film has a screenplay by John Ridley, based on the book by the same written by Solomon Northup in the 1860's on his encounter with the slavery that makes you bind as well as bite your nails and even sympathize with the circumstances shown in the film, then the cinematography by Sean Bobbitt not only captures the best of the slavery and brutality but also reminds us of the camerawork as we saw in the film of John Ford. The production design by Adam Stockhausen, costume design by Patricia Norris and even the sound design by Leslie Shatz and Bryan Arenas are simply perfect to say the least. In the performances, Chiwetel Ejifor, Dwight Henry, Kelsey Scott, Scoot Mcnairy and rest are simply riveting and convincing as well. The cameo by the film's co-producer Brad Pitt is also worth cherishing. A great "Great Escape" kind of fare, making a must watch. 
My rating would be 4.5/5

By - Yash Mishra

Labels:

पुण्यतिथि / महात्मा गांधी एक महानायक की व्यथा-कथा !

                                                             


महात्मा गांधी के जीवन का आखिरी एक साल हमारे इतिहास की कुछ सबसे त्रासद घटनाओं का गवाह रहा है। यह वह वक़्त था जब भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का महानायक अचानक देश का सबसे अकेला, सबसे उदास, सबसे उपेक्षित व्यक्ति नज़र आने लगता है। जिसके एक इशारे पर देश के लाखों लाख लोग अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर हो जाते थे, उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था। बापू ने नहीं चाहा कि देश का बंटवारा हो, लेकिन उनके सत्ता-लोलुप शिष्यों ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए देश के टुकड़े कर डाले। उन्होंने नहीं चाहा कि देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हों, लेकिन देश धर्म के नाम पर इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार का साक्षी बना। उन्होंने नहीं चाहा कि आज़ादी के बाद एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस का अस्तित्व कायम रहे, लेकिन कांग्रेस ने सत्ता सम्हाली और आज भी एक राजनीतिक परिवार की महत्वाकांक्षाओं का बोझ ढो रही है। उन्होंने नहीं चाहा कि आज़ाद भारत में धार्मिक कट्टरताओं के लिए कोई जगह रहे, लेकिन ख़ुद धार्मिक कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए। उनकी हत्या के बाद हमने चौक-चौराहों पर उनकी मूर्तियां खड़ी की, सरकारी दफ्तरों में उनकी तस्वीरें टांगी और उनकी आत्मा को देश-निकाला दे दिया। उन्होंने सत्य और अहिंसा के रूप में ज़ुल्म से लड़ने के सबसे कारगर हथियार हमें दिए और हमने झूठ तथा धार्मिक और राजनीतिक आतंकवाद की आड़ में देश को क़त्लगाह बना दिया। उनका सत्याग्रह देखते देखते भीड़तंत्र के दुराग्रह, गुंडागर्दी और अराजकता में तब्दील हो गया। कुटीर और ग्रामोद्योग के सहारे आत्मनिर्भर गाँवों की उनकी परिकल्पना को बेरहमी से हमने बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देश के कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेच दिया। उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक शुचिता बेशर्म रिश्वतखोरी, अनगिनत घोटालों और मक्कारियों की भेंट चढ़ गई !

भारतीय इतिहास के सबसे उपेक्षित महानायक मोहनदास करमचंद गांधी की पुण्यतिथि पर शर्मिंदा राष्ट्र की श्रधांजलि !


                                               लेखक - ध्रुव गुप्ता 

Labels:

Wednesday, 29 January 2014

आज का बालक कल का स्तम्भ

                                                                               


कहा जाता है की अगर भविष्य को उज्जवल बनाना हो तो हमे अपने आज को मजबूत करना पड़ता है यानी अगर हम चाहते हैं की आने वाले समय में हमारा देश उस मकाम पर हो जहां पर वो एक विकासशील देश नहीं बल्कि विकसित देश कहलाये तो हमे अंपने आज को इस लायक बनाना होगा कि वो तत्परता से एक सुगठित समाज का निर्माण कर सकने के लायक हो । 

सवाल ये उठता है कि वो कौन सा ऐसा अंग है जो भविष्य में समाज के लिए मजबूत स्तम्भ का काम कर सकते हैं तो जवाब होगा आज का बालक, वह बालक जिसे अगर सही दिशा दिखाई जाये और सही दशा प्रदान की जाए तो वो देश का सकारात्मक कायाकल्प कर सकता है, पर आज की सामाजिक परिस्थितियाँ और परिवेश शायद इस लायक नहीं हैं की बच्चों का सकारात्मक विकास हो सके, इसलिये हम सबको मिलकर आज कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे जो देश के भविष्य रूपी बालकों को साक्षरता, सकारात्मकता, सद्बुद्धि, दिशा और अनुकूल दशा प्रदान कर सके । 

 हम सब इस सच से अच्छी तरह से वाकिफ हैं की हमारे देश में आज भी कई जगहों पर बच्चों को उस तरह की सुविधायें नहीं मिल पाती जो उनके लिए अति आवश्यक हैं अतः अब ये हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि अपने स्तर से ही किसी-न-किसी रूप में अपने देश के भविष्य को मजबूती प्रदान करने के लिए आगे आयें और अपने नैतिक कर्तव्यों को समझते हुए अपना योगदान दें । 

Labels:

पुण्यतिथि / माखनलाल चतुर्वेदी




मुझे तोड़ लेना वनमाली, देना तुम उस पथ पर फेंक
मातृभूमि को शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक !

'एक भारतीय आत्मा' के नाम से प्रसिद्द राष्ट्रीय चेतना के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि स्व. माखनलाल चतुर्वेदी की कविताएं और लेख भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में आजादी के मतवालों की प्रेरणा हुआ करती थीं। वे स्वतंत्रता-पूर्व के भारत की एक समूची पीढ़ी को अनुप्राणित करने वाले कवि, लेखक और पत्रकार थे। असहयोग आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन के सक्रिय सेनानी चतुर्वेदी जी ने आज़ादी के बाद सरकार का दिया कोई पद स्वीकार नहीं किया और आजीवन सामाजिक असमानता, शोषण और बुराईयों के खिलाफ लिखते रहे। महाकवि माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि (30 जनवरी) पर हमारी हार्दिक श्रधांजलि, उनकी एक कविता के साथ !

भाई, छेड़ो नहीं मुझे
खुलकर रोने दो
यह पत्थर का हृदय
आंसुओं से धोने दो
रहो प्रेम से तुम्हीं
मौज से मंजु महल में
मुझे दुखों की इसी
झोपड़ी में सोने दो।

कुछ भी मेरा हृदय
न तुमसे कह पावेगा
किन्तु फटेगा, फटे
बिना क्या रह पावेगा
सिसक-सिसक सानंद 
आज होगी श्री-पूजा
बहे कुटिल यह सौख्य
दु:ख क्यों बह पावेगा ?

हरि खोया है? नहीं
हृदय का धन खोया है
और, न जाने वहीं
दुरात्मा मन खोया है
किन्तु आज तक नहीं
हाय, इस तन को खोया
अरे बचा क्या शेष
पूर्ण जीवन खोया है !

पूजा के ये पुष्प
गिरे जाते हैं नीचे
वह आंसू का स्रोत
आज किसके पद सींचे
दिखलाती, क्षणमात्र
न आती, प्यारी किस भांति
उसे भूतल पर खीचें।


लेखक - ध्रुव गुप्ता 

Labels:

मानवाधिकारों का सदुपयोग है आवश्यक

                                        


माना जाता है जब धरती पर मानव की उत्पत्ति हुई तो उसका आचरण किसी पशु के सामान ही थाफिर समय के साथ-२ उसने खुदकोअपनी जीवनशैली को और अपने पर्यावरण को विकसित किया   उसने अपनी जरुरत के हिसाब से वस्तुओंतौर-तरीकों एवं सोंचको भी विकसित किया  
 समय बदला मानव लालसाएँ सामने आयींलोगो ने एक दुसरे की आज़ादी पर रोक लगानी चाही और वही से जन्म हुआ मानवाधिकारकाये वो मौलिक अधिकार हैं जो हर व्यक्ति को समाज में स्वतंत्रता से जीने का अधिकारजीवन और आजाद रहने का अधिकार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिकसामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथसांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकारभोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार आदि शामिल हैं 
हर व्यक्ति को इन सब मौलिक अधिकार मिले होने बावजूद किसी--किसी रूप मे उसका शोषण होता रहता है जोकि समाजमानवता और कानून के भी विपरीत है अगर हम इतिहास पर गौर  डालें तो हम पायेंगे की मानवाधिकारों को बल देने की दिशा में समय-२ पर काफी सार्थक प्रयास हुए हैं,  पर आज भी कुछ ऐसी विषम परिस्थितियाँ बनी हुई हैं जहां पर बहुत कुछ होना बाकी है  आज भी मानवाधिकार का पूर्ण और सकारात्मक उपयोग होने में कई अर्चने सामने आती हैं जो कि एक सभ्य समाज की मर्यादा को खंडित करती है जिससे आम लोगो में आज भी अपने अधिकारों को लेकर संशय की स्तिथि बनी रहती है और वो पूर्णतया मानवधिकार का सही उपयोग नहीं कर पाते हैं  

Labels: ,

Tuesday, 28 January 2014

जन्मदिन / सुमन कल्याणपुर यूं ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना तेरी याद तो बन गई एक बहाना !

                                                                 


सुमन कल्याणपुर, मुबारक बेगम और शमशाद बेगम हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की उन बेहतरीन गायिकाओं में थीं जो अपनी आवाज़ और अदायगी की बेपनाह नेमतों के बावजूद उस दौर की संगीत-राजनीति का निर्मम शिकार हो गईं| सुमन जी की रेशमी, कांपती आवाज़ रूमानी और विरह गीतों के लिए सबसे उपयुक्त आवाज़ थी, लेकिन उन्हें अपना जादू चलाने के पर्याप्त मौके नहीं मिले| उन्होंने लता जी और आशा जी की तुलना में बहुत कम गीत गाए, लेकिन बावजूद इसके उनके पचासों गीत हमारी अनमोल संगीत-धरोहर का मूल्यवान हिस्सा है |1954 की फिल्म 'दरवाज़ा' में तलत महमूद के साथ गाए एक युगल गीत से अपनी फिल्मी पारी की शुरूआत करने वाली सुमन जी के कुछ कालजयी एकल और युगल गीत हैं - न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें, दिल गम से जल रहा है जले पर धुआं न हो, यूं ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना, मेरे महबूब न जा आज की रात न जा, बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों मुहब्बतों के दीये जला के, तुम अगर आ सको तो आ जाओ, सावरिया रे अपनी मीरा को भूल न जाना, ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़बर सही गम ही सही, पानी में जले मेरा गोरा बदन, जूही की कली मेरी लाडली, बहना ने भाई की कलाई पे प्यार बांधा है, शराबी शराबी ये सावन का मौसम, तुम्ही मेरे मीत हो, ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे, अजहू न आए बालमा सावन बीता जाए, तुमने पुकारा और हम चले आए, चुरा ले न तुमको ये मौसम सुहाना, दिल ने फिर याद किया, अंखियों का नूर है तू, आपसे हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया, आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर, दिल एक मंदिर है, इतना है तुमसे प्यार मुझे मेरे राजदार, तुझे प्यार करते हैं करते रहेंगे, मेरा प्यार भी तू है ये बहार भी तू है ! जन्मदिन पर सुमन कल्याणपुर के लंबे, स्वस्थ और सृजनात्मक जीवन की शुभकामनाएं !

                                            लेखक - ध्रुव गुप्ता 

Labels: ,

Saturday, 25 January 2014

Salala Mobiles (Malayalam): Review


Salala Mobiles (Malayalam): A gentle Rom-Com with few cliched and dragged moments. But please dont look for the story in the film! The Sharath A. Haridasan directed film is indeed a simple and sweet film, but it actually lacks compactness with the problem in editing in the film and even the songs, who score in picturization, but hardly score in mesmerizing. The film scores with its characters who are vibrant and humane and deliver brilliantly, especially the lead played by the heartthrob of Malayalam Film Industry Dulquer Salmaan as well as Nazriya Nazimwho are not only great but their chemistry is rocking in the film. The director balances the perfectness of his characters by adding talented actors like Venu Kumar, Sreekumar and the Tamil comedy king Santhanam who add great masala in the film. The film is loaded with good dialogues which level with the typical Hindi masala dialogues (Sharath) which can make you smile and even the moments which will entertain you well, then the music score by Gopi Sunder and the cinematography by Satheesh M Kurup are good . Overall, a god family rom-com entertainer. 
My rating would be: 3.5/5.

By - Yash Mishra 

Labels:

Friday, 24 January 2014

Mandela: Long Way To Freedom (English): Review


Mandela: Long Way To Freedom (English): The film which is releasing in India after 2 months (24 January 2014 ) of it's international release (a week before Nelson Mandela's death), is indeed a nice cinematic outing based on the Classic Hollywood narrative style. Despite the film losing it's track while focusing more on the life and times of Late Nelson Mandela, the film scores with it's screenplay (William Nicholson) based on the autobiography written by the legend himself, then comes the production designing work by Johnny Breedt, whose work brilliantly portrays the Apartheid times on screen, the cinematography by Lol Crawly whose shots brilliantly bring out the best of the legend and his times and then the proper placement of music score as well as the archival footages within the film's coarse, then the performances by the lead. The best among them comes the performance by Idris Elba who greatly delivers a performance that's worth cherishing and successfully  brings out the portrayal of Madiba well and then comes the narration by the director Justin Chadwick, who keeps you engaged and sympathize with the film's journey to freedom. Not to be missed! 
My rating would be: 4/5.

Review By - Yash Mishra

Labels: ,

Exhibitions of Kshitij 2014


The eleventh edition of Kshitij, the largest techno-management fest of Asia, is again set to astonish you with its charisma from 31stJan- 3rd Feb, 2014 at IIT Kharagpur. Since its inception ten years ago Kshitij has mesmerized the audience with the diverse range of megashows, guest lectures, world class workshops, exhibitions and many more exciting happenings.
Kshitij has catered as the perfect stage for showcasing path breaking technological advances of recent times through its distinctive exhibitions. Latest technology from around the globe is showcased in front of the top students from the country where they get to interact with technology and meet the creators also. In its 11th edition, Kshitij brings to you the PaperTab, fully interactive paper-thin screens enabled with touch screen capabilities and nice processing speeds. In an age, where slim is the talk of the day, this flexible yet robust technology is set to be revolutionary.
With a mouth and tongue made from silicone rubber and the inside of its nose made of plaster, it not only has the physical features of the human nose but also produces human sounds. The talking mouth robot by Professor Sawada of Kagawa University listens, learns and then imitates the sounds heard.
Being 9 inches tall and weighing 2.8 pounds, a compact bot that is meant to work with cloud-based applications, PaPeRo, through its ability of voice and facial recognition, has proved to be a major breakthrough in the field of robotics. Its ability to interact naturally with people opens up a variety of application possibilities for home automation systems.
With the product details appearing in front of one in 3 dimensional high quality details one is bound to be left dumbstruck with its magnificence. Soon to conquer the windows of the stores with its motion sensitive interactive display ThisPlay3D, this is a technology of the immediate future.
Meant to captivate your mind with emotions that seem real, this humanoid robot which consists of distinct technology will be replacing 100 muscles situated between skin surface and skull with very different shapes and functionality. Collection of synchronized information acquired from different sensors, i.e. physiological, psychological and behavioral data is what makes FACE replicate human behaviour.
The robot is designed with a fluent electronic feedback mechanism using cameras and movement controlled with phone tilt screen. Nao's flawless dancing has entertained over 1.5 billion people on internet, so take the most of this opportunity to witness these miniature “dancing stars” in action at Kshitij 2014.
These exquisite exhibits are sure to enthral the present gathering during Kshitij 2014.

Labels:

Thursday, 23 January 2014

जननायक स्व. कर्पूरी ठाकुर की जयंती जाने कहां गए वो लोग !

                                                              


दलितों, पिछड़ों, शोषितों और वंचितों के मसीहा कहे जाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और बिहार में समाजवाद के सबसे मजबूत स्तम्भ स्व. कर्पूरी ठाकुर ने बिहार की राजनीति में पारदर्शिता, ईमानदारी और जन-भागीदारी के जो प्रतिमान उपस्थित किए, उन्हें पार करना उनके बाद के किसी राजनेता के लिए संभव नहीं हुआ। एक गरीब नाई परिवार से आए कर्पूरी जी सत्ता के तमाम प्रलोभन और आकर्षण के बीच भी जीवन भर सादगी और निश्छलता की प्रतिमूर्ति बने रहे। ईमानदारी ऐसी कि अपने लंबे मुख्यमंत्रित्व-काल में उन्होंने सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कभी व्यक्तिगत कार्यों के लिए नहीं किया। उनके परवर्ती मुख्यमंत्रियों के घरों में कीमती गाड़ियों का काफ़िला देखने के आदी लोगों को शायद विश्वास नहीं होगा कि कर्पूरी जी ने अपने परिवार के लोगों को कभी सरकारी गाडी के इस्तेमाल की इज़ाज़त नहीं दी। एक बार तो उन्होंने अपनी बेहद बीमार पत्नी को रिक्शे से अस्पताल भेजवाया था ।

'गुदड़ी के लाल' और 'बिहार के भूमिपुत्र' कहे जाने वाले इस विभूति को शत-शत नमन !


                                           
                                                        लेखक - ध्रुव गुप्ता 

Labels:

Wednesday, 22 January 2014

"स्पॉट ऑफ़ शेम"

स्टॉप एसिड अटैक की मुहीम स्टॉप ऑफ़ शेम के अंतर्गत 22/1/2014 को सभी कार्यकर्ताओ ने खान मार्किट मेट्रो स्टेशन के समीप एक अनूठा शांति एवं संस्कृतिक विरोध दर्ज करा . 




Labels: