Sunday, 30 September 2012

टीम केजरीवाल और टीम अन्ना की राजनीतिक पैतरेबाजियों के फ्राई पैन पर फ्राई होता आम आदमी..

पहले अन्ना आंदोलन खत्म, उसके बाद एक खेमा बना जो राजनीतिक दल बनाने के फैसले के साथ था उसकी आस बरकरार रही की कुछ होगा ..अब पार्टी बनाने को लेकर अन्ना एकदम खिलाफ़ हैं.. लेकिन दस अगस्त को जो एलान मंच से हुआ उसमें सहमति तो अन्ना की भी थी.केवल शांति भूषण थे जिन्होंने उसी समय कहां था की पार्टी बनाना अभी उचीत नही.(हालांकि वो भी दोनों तरफ़ रहकर दुविधा वाली स्थिति उत्पन करें हुये हैं) किसी ने भी किसी किस्म का कोई विरोध नही किया.
केजरीवाल ने कोयला आवंटन मामले पर लगभग सारी की सारी राजनीतिक जमात को एक चादर में लपेटे हुये प्रधानमंत्री निवास से लेकर सोनिया गांधी और मुख्य विपक्ष पार्टी भाजपा के अध्यक्ष नितित गडकरी का विरोध कर उनके निवास स्थान पर भारी तादाद में प्रदर्शन कर यह चेता दिया की उन्होंने विपक्ष की जगह भरने का बेड़ा अभी से उठा लिया हैं.किरण बेदी भाजपा अध्यक्ष के निवास स्थान का घेराव करने की वजह से केजरीवाल से खुद को अलग कर गई.यही से दरारे साफ़ दिखने लगी. वही रालेगण
  सिद्धी से अन्ना हजारे ने अरविंद के इस विरोध का समर्थन ही नही उनकी पिट भी थपथपायी.लेकिन,अचानक पार्टी बनाने को लेकर ऐसा क्या हुआ जो अन्ना ने दो टुक अरविंद से किनारा कर दिया और अपनी तसवीर,साझा मंच तक इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया.?
कई जानकारों की माने तो यह अंतर अब विचारधाराओं का भी हैं.. |ऐसा मालूम होता हैं की जंतर मंतर पर ही मंच से अलग जरूर पार्टी बनाने के निर्णय को लेकर असहमतियां दर्ज हुई होंगी .. कुछ अवाजे पार्टी ना बनाने को लेकर उठी थी जिन्हें उस समय दबा दिया गया.कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की माने तो उस दिन वो स्वंम वहां पार्टी बनाने को लेकर विरोध कर रहें थे पर उनकी अवाज को अनसुना कर दिया गया.. यहां तक की उनके बैनर फाड़ दिए गए. अब सवाल उठता हैं की अरविंद ने पार्टी बनाने के निर्णय को लेकर शुरूआत में ही यह सुनिश्चीत कर दिया था के यदि अन्ना कहेंगे तो हम पार्टी नही बनाएंगे. ऐसे में अन्ना की ना,पार्टी के लिए अरविंद की हां क्या सिद्ध कर रहा हैं.?क्या अरविंद अकेले भी उतने प्रभावशाली रहेंगे जितने अन्ना के समर्थन के साथ थे.ऐसा जंतर मंतर पर हो रहें इस बार के अनशन में भी साफ़ साफ़ दिखाई दें गया था की अरविंद और बाकी साथियों के अनशन पर बैठने के बावाजूद भी लोग उतना एकजुट नही हुये जितना अन्ना के बैठने के बाद हुये.सवाल तो बहुत हैं.. केजरीवाल से भी हैं और अन्ना से भी हैं. लेकिन सबसे अहम सवाल इस वक्त़ ये ही हैं कि आप लोगों की खीचतान के बीच वो जनता क्या करें जिसने कभी और शायद आज भी काफ़ी उम्मीदें बांदी थी आप से.. ?

लेखक -अंकित 
मुटरिजा (सम्पर्क करने के लिए क्लिक कर्रें http://www.facebook.com/ankit.mutreja.5?fref=ts)

Friday, 28 September 2012

वैकल्पिक राजनीति के विज्ञानी थे बनवारी लाल

कम लोग जानते हैं कि बनवारी लाल शर्मा कौन थे। जो जानते हैं उनमें से भी कम लोग उनके कामों को सफल मानने को तैयार होंगे। मुख्यधारा का मीडिया और उसकी दैनिक खुराक बन चुकी राजनीति को उनके जैसे लोगों से क्या लेना देना। हर कोई यह सवाल करने लगता है कि आखिर वैश्वीकरण और उदारीकरण का विरोध करके बनवारी लाल शर्मा ने क्या कर लिया? क्या वह नीतियां रुक गईं? क्या बहुराष्ट्रीय कंपनियां भाग गईं? क्या उदारीकरण की गति धीमी पड़ गई? इस तरह के सवालों से उनका मूल्यांकन करने वाले या तो हकीकत से मुंह चुराते हैं या अपने झूठ की आंधी चलाते रहते हैं। वे दुनिया की हकीकत से बाखबर होकर भी अपने प्रचार की झोंक में विकल्प के उन विमर्शों को भूल जाते हैं जो पूरी दुनिया में चल रहे हैं और जिनके कारण वैश्वीकरण की नीतियां आज चकरघिन्नी हो रही हैं। पर बनवारी लाल शर्मा थे इसीलिए हमारा समाज है और आगे भी रहेगा। वे चले गए इससे खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ईमानदार, कर्मठ, मेधावी व्यक्ति अपनी जितनी भूमिका निभा सकता है उतनी निभा कर वे चले गए। कल जब उनके निधन की खबर आई तो दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रेम सिंह दुखी मन से कहा कि एक दिन उन्हीं की तरह हम लोग भी खामोशी से चले जाएंगे। पर मेरा मानना है कि बनवारी लाल शर्मा जैसे लोग खामोशी से नहीं गए न ही प्रेम सिंह जैसे लोगों की आवाज आसानी से खामोश होने वाली है। बनवारी लाल ने जो अलख जगाई वह जलती रहेगी और उनके नारों, विमर्शों और व्याख्यानों की आवाज देर तक गूंजती रहेगी। वह आवाज इसलिए भी गूंजती रहेगी कि उसके पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए हो रहे वैश्वीकरण की अमानवीय नीतियों का विरोध ही नहीं मानवता के पक्ष में वैश्वीकरण किए जाने का मुकम्मल आह्वान है। बनवारी लाल कोई कूढ़ मगज और नामसझ और कोरी भावुकता वाले इंसान नहीं थे। वे गणित की ऐसी शाखा के विद्वान थे जिसको पढ़ने वाले दुनिया में कम लोग मिलते हैं। उन्होंने उसमें फ्रांस से डीएससी की थी और उनके पढ़ाए हुए छात्र आज देश दुनिया के तमाम विश्वविद्यालयों में गणित पढ़ाकर रिटायर भी हो चुके हैं।
लेकिन उन्होंने जब देखा कि दिसंबर 1984 में आधी रात के समय यूनियन कार्बाइड नाम की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारत के मध्य में स्थित भोपाल शहर में हजारों लोगों को मार कर और सैकड़ों लोगों को अपाहिज बना दिया और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया, उल्टे भारत सरकार उसके अधिकारी की खैरख्वाही करती पाई गई तो उनका मन विचलित हो गया। उन्होंने तभी से ठान लिया कि वे इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की करतूतों का खुलासा करते रहेंगे और उसके लिए मानवता के पक्ष में जितना बनेंगे उतना करेंगे। तब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी सत्ता में आए थे और भारत में उदारीकरण का दौर शुरू नहीं हुआ था। उनकी आशंकाएं सही निकलीं और जल्दी ही भारत ही नहीं पूरी दुनिया पर वाशिंगटन सहमति के आधार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाली नीतियां लागू की जाने लगीं। डंकेल का प्रस्ताव उस दिशा में लाया गया पहला दस्तावेज था।
जब वह प्रस्ताव आया तो देश में जो तीन वरिष्ठ लोग मुखर रूप से उस प्रस्ताव के विरोध में आए उनमें बनवारी लाल शर्मा, किशन पटनायक और डा ब्रह्मदेव शर्मा प्रमुख थे। बाद में उसमें एक नाम प्रभाष जोशी का भी जुड़ा। प्रभाष जोशी तो पत्रकार थे लेकिन बाकी तीनों शिक्षक, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उनके साथियों की अपनी अपनी टोलियां थीं। अगर किशन पटनायक के साथियों ने- गुलामी का खतरा-- नाम से पुस्तक प्रकाशित की तो बनवारी लाल शर्मा ने इलाहाबाद के कुछ साथियों की मदद से आजादी बचाओ आंदोलन की स्थापना की और-- नई आजादी उद्घोष-- के नाम से पत्रिका निकालनी शुरू की। इन लोगों की विद्वता, निष्कलंक जीवन और तर्कों और तथ्यों की स्पष्टता ने देश और विशेषकर हिंदी इलाके के तमाम नौजवानों को दीक्षित कि या। उन्हीं में एक युवा राजीव दीक्षित भी थे जो अपने साम्राज्यवादी विमर्श को सांप्रदायिकता तक लेकर चले गए और बनवारी लाल शर्मा से दूर होते गए। राजीव दीक्षित और उनके जैसे युवाओं के कारण ही कई लोग बनवारी लाल शर्मा में भी सांप्रदायिकता के प्रति नरमी या उसके प्रति झुकाव देखते थे। पर उन्होंने उधर ध्यान दिए बिना अपना काम जारी रखा। आज पलट कर देखा जाए तो बनवारी लाल शर्मा अपने पीछे जनविरोधी आर्थिक नीतियों के विरोध ही नहीं विकल्प की एक लंबी और जुझारू विरासत छोड़ गए हैं। इस टिप्पणीकार से एक बार समाजवादी नेता विजय प्रताप ने- आजादी बचाओ आंदोलन- पर अध्ययन कर किताब लिखने को कहा था। वह काम नहीं हो पाया। उसका मलाल है पर एक बात की खुशी जरूर है कि इस टिप्पणीकार ने डा कमल नयन काबरा और डा एके अरुण के साथ 2001 में बनारस से जौनपुर के बीच डेढ़ सौ किमोमीटर घूम कर वह मानव श्रृंखला देखी थी जो उनके और साथियों की मेहनत से पेप्पी कोक और दूसरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरोध के लिए बनी थी। उसके बाद उस आयोजन पर जनसत्ता के रविवारी में कवर स्टोरी भी की थी जो काफी चर्चित रही। जिसका जिक्रसमाजवादी विचारक सुरेंद्र मोहन जी रवींद्र त्रिपाठी को श्रेय देते हुए करते थे। आज बनवारी लाल जी के जीवन और उनके अथक संघर्ष की थाती को आगे बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि उन्होंने जिस सुबह का सपना देखा था उसे आने में बहुत देर नहीं है। वैश्वीकरण की लड़खड़ाती नीतियां अब दुनिया में ज्यादा दिन की मेहमान नहीं हैं। भले बनवारी जी अपने जीवन में वो मंजर नहीं देख पाए और उदारीकरण समर्थकों के ताने सुनते रहे पर उनके साथियों को वह ज्यादा दिन तक नहीं सुनने पड़ेगे। यही उनकी ताकत है यही उनकी सफलता है

लेखक -अरुण कुमार त्रिपाठीAssociate editor, HINDUSTAN Well Known political and Social commentator, Authored Three Books -Kalyan singh , Medha Patakar, Kattarta Ke Daur Mein Coeditted Three titles along with Mahashweta Devi -Sngur NadiGram ke Sawal, Parmanu Karar Ke Khatre, Khadya Sankat ki Chinauti, done research on 1857, associated with different social and political movements)"फेसबुक से प्राप्त आर्टिकल"

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Thursday, 27 September 2012

बर्फी है सही मायनो में ऑस्कर की दावेदार

रणबीर कपूर और प्रियंका चोपरा के बेहतरीन अभिनय से सजी फिल्म बर्फी सच में इस लायक है की वो ऑस्कर जैसे सम्मानित पुरस्कार की हकदार बने, क्युकी आजकल  जहां एक ओर सभी कलाकार इस बात को ज्यादा अहम मानकर फिल्म का निर्माण करने में जुटे हुए है की किसी  तरह उनकी फिल्म रिलीज़ होने के पहले हफ्ते में ही १०० करोड़ का आकड़ा पार कर ले और इन्ही बातो को ध्यान  में रखकर वे बस ऐसी मसाला फिल्मो का निर्माण कर रहे हैं की जो मात्र दर्शको का मनोरंजन कर उनकी जेबे गरम कर दे न की बॉलीवुड को एक सम्मानित दर्जा दिलाने में सहायता करे, वहीँ इस सब से हट कर रणबीर कपूर ने एक ऐसी फिल्म का हिस्सा बनना ज्यादा अच्छा समझा जो की बॉलीवुड को एक नयी पहचान दे ।
                         फिल्म बर्फी के माध्यम से रणबीर और प्रियंका ने यह फिर से साबित कर दिया है की बॉलीवुड अभिनय के दृष्टिकोण से वह महान जगह है जहां से समय-समय पर बेहतरीन अदाकारी के नमूने सामने आते रहे हैं  और इस बात की उम्मीद जगाई है की यह फिल्म भारत के लिए निश्चय ही ऑस्कर का तोहफा लाएगी ।

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तू जालिम था फिर भी दिल मेरे पास छोड़ गया

तू जालिम था फिर भी दिल मेरे पास छोड़ गया
मनी' अजीब था तू अजीब हालातो में छोड़ गया

शिकायत करू भी तो किससे सब तो खिलाफ थे
जिसपे ज्यादा भरोशा था वही साथ छोड़ गया

तुझे याद करता हू तो कुछ पल में भीग जाता हू
इन आँखों में ए कैसा असर छोड़ गया

कुछ तो बता दे अब आगे का क्या होगा
तू आएगा कभी य हमेशा के लिए छोड़ गया

बद्दुआ भी मै दू तो दू तुझे कैसे मेरा गुनाह था
मनी' ए क्या तू तो मेरे संग बदनामी छोड़ गया.

By
मनीष शुक्ल

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भारत का महाबंद पर क्या हुआ असरमंद ?

जनता कुछ भी करले पर सरकार के कानों मे जूँ तक नही रेंगती । कभी नारेबाज़ी, कभी जुलूस ओर कभी पुतला फूँकना, पर सरकार चिकना घड़ा । जनता का यह आक्रोश 20 सितंबर भारत बंद के रूप मे सामने आया । भारत सरकार एक बार फिर FDI के रूप मे भारत को गुलामी के गहरे गर्त मे
धकेलना चाहती है । देश को बेच देना चाहती है देश भर मे जनता इसके विरोध मे सड़क पर उतरी थी । पर आख़िर मे क्या हुआ एक दिन गुज़रते हुई फिर से वही महगी जिंदगी । सरकार फिर कपड़े झाड़ के खड़ी हो गई । नुकसान किसे हुआ देश की आर्थिक व्यवस्था को । पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रहे भारत ने एक दिन की बंद की वजह से अरबों का नुकसान झेला और सरकार को भला क्या नुकसान होने वाला था । प्रधानमंत्री जी के कोष कोएला घोटाला करके इतना भरा हुआ है की इनकी सात पुसते बैठ के ऐश कर सकती है।
बल्कि सरकार ने जनता के ज़ख़्मों को कुरेदने का ही कार्य किया । जगदम्बिका जी का बयान आया की अब तो बंदी फ़ैसन बन गया है ओर दूसरी ओर प्रधान मंत्री जी ये कहते नज़र आए की १७ रूपये बढ़ाने चाहिए थे, पर केवल ५ रूपये ही  बढ़ाए । जनता का सब्र का बाँध बस टूटने ही वाला है और जब ये बाँध टूटेगा तो सरकार गद्दी से नही देश से भी बाहर कर दी जाएगी ।

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Wednesday, 26 September 2012

कई दुकानें करेंगी सवाल,किससे पूछ कर किया विदेशी निवेश का फैसला ..

जिस जगह मैं रहता हूं उससे कुछ दूरी पर एक गली हैं,जिसका नाम हैं "शटर" वाली गली.. नाम के पीछे बात ये हैं कि गली में जितने घरो के दरवाजे नही उससे अधिक दुकानों के शटर हैं..| हमारे देश में तकरीबन चार करोड़ ऐसे छोटे खुदरा व्यापारी हैं जो इन्हीं दुकानों के जरिए अपनी आय पर निर्भर हैं.यदि एक आकलन लगाया जाएं और हर दुकानदार के परिवार में चार सदस्यों को जोड़े तो कुल सोलह करोड़ लोग इन दुकानों पर निर्भर हैं.. एटी केर्नी वैश्विक रिटेल विकास सूचकांक रिपोर्ट 2011 की माने तो खुदरा क्षेत्र जीडीपी का 22 फीसदी हैं.ऐसे में सुधारों की आड़ में जिस तरह से मौजूदा यूपीए सरकार बिना किसी आम सहमति के खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष बहुब्रांड विदेशी निवेश को मंजूरी दें देती हैं तो सवाल उठना लाजिम हैं की हम वालमार्ट सरीखे की उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने देश में जाल फैलाने की अनुमति कैसे दें रहें हैं जहां के राष्ट्रपति स्वंम ट्विट कर के कहते हैं कि लोग अपनी गली कुचों की दुकानों से सामान पहले लें ना की सुपर स्टोर्स से.?(अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कें संदर्भ में)..
यह बात साफ़ हैं कि विदेशे में भी जा कर हमारे कई ऐसे खुदरा व्यापारी हैं जो वहां अपने लिए जगह बनाने में कामयाब रहते हैं,किंतु यहां जिस प्रतिस्पर्धा यानि "कंपीटिशन" की हम बात कर रहें हैं वो किन्हीं मामूली कंपनियों से नही बल्कि उन कंपनियों से हैं जो अकेले अपने दम पर पूरी दिल्ली को भरने का दम रखती हैं.वालमार्ट ने तो सरकार के इस झटका उपचार के फैसले के तुरंत बाद ही बारह से अठारह माह के भीतर स्टोर खोलने का दावा पेश कर दिया.पर, जब हम वालमार्ट से प्रतिस्पर्धा की बात करते हैं तो हमें यह ध्यान में रखना चाहिए की ये वो स्टोर नही होंगे जो कैसे ना कैसे उधार पर पैसा लें कर भी अपना ग्राहक बनाए रखने के लिए उसे उधार पर समान देने का दम रखते हैं.. बल्कि ये वो घोर पूंजीवादी व्यवस्था होगी जो पूरे के पूरे राजनीतिक तंत्र को अपने कदमों में झुका दें.वालमार्ट की ही बात करें तो दुनिया की सबसे ताकतवर कंपनियों की वर्ष 2012 की फाच्यर्न पांच सौ की सूची में दूसरे नंबर की कंपनी हैं.इससे पहले वह लगातार दो पर्षो तक पहले नंबर पर थी.देश की दस सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों का कुल मुनाफा भी वालमार्ट के मुक़ाबले में कम हैं.विदेशी निवेश को लेकर इसी क्षेत्र में इतना विरोध क्यों हुआ ?
इस बात पर विचार करने की अवशयकता हैं.ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां विदेशी निवेश हुआ पर आज तक इतना विरोध नही हुआ ऐसा इसलिए क्योंकि यह मुद्दा सीधे आम आदमी से जुड़ता हैं. "खास" की नुमाइंदगी करने वाली यूपीए शायद इस बात पर जवाब नही देगी के वालमार्ट के बोर्ड आँफ डायरेक्टर में रह चुकी एवं उसके लिए खुल कर लाबीइंग करने वाली अमेरिकी विदेश मंत्री "हिलेरी क्लिंटन" ने भारत में प्रवेश के लिए लाबीइंग पर घोषित तौर पर जो (15 लाख डाँलर) खर्च किए थे वो कहां और किस रूप में इस्तेमान हो रहें हैं.? इन्हीं वालमार्ट जैसे स्टोर्स की महरबानी थी की कुछ समय पहले भारत के दौरे पर आयी अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन दिल्ली की बजाए सीधा बंगाल एफडीआई का विरोध करने वाली ममता के पास गयी.इस बात में कोई दो राय नही की खुदरा बाजार में निवेश से अर्थव्यवस्था में उछाल आएगा परंतु इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे.. ? ज़रा उस पर भी नज़र डाली जाएं..

खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भले अर्थव्यवस्था में उछाल आए लेकिन सोचिएगा जब हमारे देश की अर्थव्यवस्था कृषि के बाद के सबसे फलकारी क्षेत्र यानि खुदरा बाजार पर निर्भर रहते हुये भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो जाएगी तब क्या होगा.?यह कंपनियां शुरूआत में घाटा झेल कर भी अपना बाजार बनाती हैं लेकिन बाद में जब दूसरे दुकानदार इनके मुक़ाबले कहीं ठहरते नही तब इनकी मनमानी ही चलती हैं.ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे-अमेरिका की ही एक रिपोर्ट के अनुसार सुपर स्टोर्स ने 1994 से लेकर 2004 के बीच टमाटरों की कीमतें 46 फीसदी बढ़ा दीं लेकिन किसानो को मिलने वाली वास्तविक कीमत में 25 फीसद की कमी आ गई.मतलब उपभोक्ताओं के लिए दाम में ईजाफ़ा तो हुआ ही हुआ, साथ में सरकार के अनुसार किसान हितकारी कंपनियों ने किसानो को भी छला. ब्राजील में बड़े रिटेल स्टोर्स के खुलने के बाद 1987 से 1996 के बीच फल-सब्जियों की बिक्री में छोटे खुदरा दुकानदारों की हिस्सेदारी में 28 फीसदी की कमी आ गई.चौका देने वाला उदाहरण इंडोनेशिया हैं जहां एक साल(2002-2003) में कोई 1.54 लाख छोटी दुकानें बंद हो गई.

दूसरा सबसे वाहियात तर्क जो एफडीआई के पक्ष में सरकार की ओर से रखा जा रहा हैं वो ये कि कंपनियां खुलेंगी ही वहां जहां दस लाख से ज्यादा की आबादी हो.. इस बात को एक एहसान की तरह हम पर थोपा जा रहा हैं जबकि धंधे का यह वसूल हैं की उसमें फायदा देखा जाएं.. वालमार्ट या टेस्को जैसी कोई भी कंपनी अपनी लागत के हिसाब से ही स्टोर का केंद्र खोलेगी.इसमे खुदरा व्यापरियों के लिए राहत की बात नही बल्कि एक चेतावनी हैं की जो भी स्टोर खुलेंगा उसका प्रमुख निशाना कम से कम दस लाख उपभोक्ता हैं.
केंद्रिय उघोग मंत्री आनंद शर्मा इस निवेश को बेरोजगारी का त्वरित ईलाज बता रहें हैं लेकिन ऐसे रोजगार के लिए क्या आप और हम तैयार हैं ?जिसकी एवज में देश के चार से पांच करोड़ छोटे खुदरा व्यापारियों को बेरोजगार होना पड़े और फिर इन्हीं स्टोर्स पर काम करना हो.वालमार्ट के दुनिया भर में 8970 स्टोर्स हैं जिसके लिए 22 लाख कर्मचारी काम कर रहें हैं.2011 में उसने 446.95 अरब डाँलर का कारोबार इतने ही कर्मचारियों की बदौलत किया.भारत का कुल खुदरा व्यापार लगभग 450 अरब डाँलर का हैं जबकि यहां 1.4 करोड़ लोगों को इसमे 
रोजगार मिला हुआ हैं.

कई लोग खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष बहुब्रांड निवेश के कड़े विरोध को कंप्यूटर प्रवेश के दौर से जोड़ कर देख रहें हैं जबकि सच यह भी हैं कि कंप्यूटर के आने के बाद बेशक कई लोग बेरोजगार हुये हो फिर भी उस आधुनिकीकरण की राह में लोगों के पास विक्लप था की वे एक नयी टेकनीक को सीखे.यहां कोई विक्लप नही रहेगा.फिर सवाल पैसा पेड़ पर नही उगता किस्म के जुमलें बोलने वाले प्रधानमंत्री महोदय से भी होना चाहिए के उन्होंने देश के खुदरा व्यापार को बुनियादी तौर पर मजबूत करने के लिए आखिर किया ही क्या.?
चुनावी राजनीति को ख्याल में रखा जाए तो जानकारों का यह भी मानना हैं की सोनियां गांधी के बेहद चहेते राष्ट्रीय खाघ सुरक्षा कानून के लिए एक लाख करोड़ रूपयो की अलग से व्यवस्था भी चाहिए.राष्ट्रीय खाघ सुरक्षा लाने के लिए सरकार को एक लाख 19 हजार करोड़ रूपय की दरकार हैं.गौर करने वाली बात ये भी हैं कि जो टाईम्स पत्रिका 2010 में मनमोहन सिंह की तारिफों के कसीदें पढ़ते नही थकती थी,वही पत्रिका 2012 में उन्हें उंडरअचीवर कहती हैं.कहां जाता हैं कि टाईम पत्रिका वाईट हाँऊस से ही फाईनल हो कर निकलती हैं.

लेखक-अंकित मुटरिजा

Monday, 17 September 2012

मेरा बॉलीवुड महान


फिल्म निर्माण के आधार पर भारतीय फिल्म उद्योग विश्व में प्रथम हैयहाँ प्रति वर्ष लगभग एक हज़ार फिल्मे रिलीज़ होती हैंजो की हालीवुड का दो गुना है  १९३१ में रिलीज़ हुई रजा हरीश चन्द्र भारत की पहली मूक फिल्म थीइसे दादा साहेब फाल्के ने बनाया था  पहली बोलती फिल्म "आलमआरा१४ मार्च १९३१ में रिलीज़ हुई थी और १९३१ में बनी "नूरजहाँ " भारत की पहली अंग्रेजी फिल्म थी भारत की पहली रंगीन फिल्म "किसान कन्यापहली सिनेमास्कोप फिल्म "कागज़ के फूलऔर पहली थ्री डी फिल्म "छोटा चेतनजिसमे "उर्मिला मतोड़करने काम किया था  
              १९९२ में सत्यजीत रे को लाइफटाइम अचीवमेंट ऑनरेरी अवार्ड मिलाउनके आलावा ऑस्कर पाने वाली भारतीय फ़िल्मी हस्तिया हैंभानु अथैया (बेस्ट कास्टयूम डिजाइनर), .आररहमान (म्यूजिक कम्पोजिंग), रसुल पोकट्टी (साउंड एडिटिंग), और गुलज़ार (गीतकार लेखनमिला है   
                             शिकागो रीडरके अनुसार " मेरा नाम जोकर घंटे की फिल्म थीबाद में काटकर उसे २५५ मिनट का किया गया,२००३ में आई फिल्म "अल..सीकारगिलभी मेरा नाम जोकर के बराबर समय की ही थी  मदन थीयेटर की इन्द्र सभा में अब तक के सबसे ज्यादा ६९ गाने थेहिंदी फिल्मो में अब तक का सबसे लम्बा गाना टाईटल गीत "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोंका हैइसकी अवधि २० मिनट की है।
            फिल्म इतिहास में सर्वाधिक गोल्डेन जुबली मानाने का रिकॉर्ड १९७५ की शोले के नाम हैये एक हाल में लगातार पांच साल से भी ज्यादा चलीलगातार साठ गोल्डेन जुबली मनाई और सौ हाल में एक साथ सिल्वर जुबली मनाई। ३८५ करोड़ की कमाई के साथ थ्री इडियट्स भारत की सबसे ज्यादा कमाऊ फिल्म के खिताब को हथियाये हुए है२०११ में रिलीज़ हुई फिल्म रावन अब तक की सबसे  महंगी फिल्म हैइस फिल्म का बजट १३५ करोड़ है 

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स्टोरी पर हावी होता स्टारडम

दर्शक हमेशा से यह मांग करता रहा है की उसे मनोरंजन के नाम पर फिल्मो से एक बेहतरीन कहानी मिले, मगर उस समय इन समझदार दर्शको की समझदारी कहाँ चली जाती जब वो फिल्म के नाम पर अपने पसंदीदा अभिनेता और अभिनेत्रियों को देखने जाते हैं और बे सर-पैर की फिल्मो को कमाई में १००-२०० करोड़ का आकड़ा पार करा देती है
        एक तरफ तो हमारे देश की जनता ये कहती की हमारी फिल्मे उस स्तर की नहीं होती की वो "ऑस्कर" जैसे सम्मानित पुरस्कार जीत सके, दूसरी तरफ वही जनता उन अच्छी फिल्मो को देखने से नकार देती है जो पुरस्कारों के लायक होती हैं , तो अब सोचने वाली बात ये है की अगर फैन्स इसी तरह अपने पसंदीदा चेहरे को देखने के लिए ही अगर फिल्म हॉल जाते रहे तो फिर किस तरह हमारी फिल्मो का स्तर सुधरेगा

 

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Friday, 14 September 2012

सिलिंडर से दबा और पेट्रोल से फिर जला आम आदमी

सैयां तो खूब ही कमात हैं....पर सखी जी सैयां चाहे जितना कमा लें पर बजट तो बिगड़ा ही रहेगा  १४ सितम्बर की रात ३ बजे से गैस सिलेंडर पे और डीजल पे एक बार फिर दाम बढा दिए गए अब बेचारा आम आदमी कोशिश करके अपने बजट को पटरी पर ठीक से ला भी नहीं पाता कि सरकार फिर से उसे मजबूर कर देती है अपने बजट को पटरी पर लाने और जूझने के लिए
सरकार तो आक्रोशित और उबलती हुई जनता अपनी उछलती हुई कीमतों का बजट पेश कर-कर के नया तड़का मारती रहती है जिसका फायदा भले ही आम जनता को तो कुछ न हो पर विपक्षी दल इसे खूब भुनाते हैं और विरोध का डंका पीट पीट कर जनता के सामने उनके हितकारी  बनने का ढोंग करते हैं  मै एक सवाल इन विरोध कर रहे नेताओं से भी करूंगी कि अगर वो जनता के इतने ही हितकारी हैं तो फिर वो अपना समर्थन सरकार से खींच क्यों नहीं लेते?
पर न भाई न, आप  ऐसा क्यों करेंगे ? क्योंकि आप तो कुर्सी के हितकारी है, जनता के नहीं, हम जानते है जनाब, कि आप महंगाई की आड़ में अपना खाना बहुत अच्छी तरह पका रहें हैं 
चलिए छोडिये पर जनता की भी दाद देनी पड़ेगी हर बार महंगाई बढ़ने पर रो लेते है और मन ही मन गालियाँ देकर २०१४ का इन्तजार करने लगती है । जनता से मै ये कहना चाहूंगी कि २ वर्ष मतलब ७३० दिन जिन्दा रहने के लिए आपको खाने की जरूरत होगी और अगर ऐसा ही चलता रहा तो ये सरकार एक दिन हमारे दो वक्त के खाने के लिए भी लाले कर देगी 
अब वक्त आ गया है कि हमें सरकार को दिखा देना है कि अगर हम सरकार खड़ा करने का दम रखते है तो उसे गिराने की हिम्मत भी रखते हैं
जय हिंद, जय भारत
स्वाती गुप्ता

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Sunday, 9 September 2012

कार्टूनिस्ट पर देश द्रोह

असीम त्रिवेदी जो पेशे से राजनितिक  कार्टूनिस्ट है उन्हें मुंबई  पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया ,असीम ने न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए मुंबई में जाकर गिरफ्तारी दी क्योकि यह गिरफ्तारी असीम ने इसलिए दी है कि  कुछ दिन पूर्व मुंबई पुलिस उनके निज निवास शुक्लागंज बिना किसी नोटिस के आ धमकी थी और उस समय असीम घर पर  मौजूद नही थे वो किसी काम से दिल्ली में थे असीम के न होने के बावजूद भी स्थानीय और मुंबई पुलिस द्वारा उनके माता -पिता को परेशान किया गया जब यह बात असीम  के संज्ञान में आयी तो असीम फ़ौरन दिल्ली से शुक्लागंज गिरफ्तारी देने के लिए रवाना हो गये और गिरफ्तारी देने के लिए स्थानीय पुलिस शुक्लागंज गंगाघाट थाने पहुचे तो उन्हें ये बताया गया कि मुंबई पुलिस तो यहाँ से जा चुकी है तो इस बात पर असीम  ने ये कहा है कि मै  गिरफ्तारी  देने आया हूँ तो स्थानीय पुलिस ने कहा ये मामला मेरा  नही इसलिए हम  आपको गिरफ्तार नही कर सकते इस पर आई. ए. सी . और असीम समर्थकों का गुस्सा फूट गया और थाने के सामने धरने पर बैठ गये जिस पर पुलिस और प्रशासन द्वारा काफी समझाने  के बाद समर्थक शांत हुए और फिर असीम ने वहीँ ये निर्णय लिया कि देशद्र्हो जैसे केस उनके ऊपर लगे हुए  है वो भी उनके द्वारा बनाये गये कार्टून पर लगाए हैं जो अभिव्यक्ति कि आजादी पर करारा प्रहार है और जिसके कारण वो मुंबई में जाकर गिरफ्तारी देंगे और न्यायपालिका संविधान का सम्मान करते हुए उन्हें बाइज्ज़त बरी कर देगी  और उन्होंने ये भी कहा है कि मै न्यायकि प्रक्रिया का सम्मान करता हूँ इसलिए मै उसमे बाधा नही बनना चाहता और न्यायपालिका पर मुझे पूरा भरोसा |
                                                                                                                        असीम पर राजद्र्हो और साइबर क्राइम  जैसे मुक़दमे उनके द्वारा बनाये गये भ्रष्टाचार के कार्टूनों पर लगाए गये हैं जो अन्ना अनशन  के मुंबई  बांद्र- कुर्ला काम्पेलक्स के एम्.एम्.आर.डी. ग्राउंड में प्रदर्शित किये गये थे जिस कारण उनकी साईट Cartoons Against Corruption को मुंबई पुलिस द्वारा बिना किसी नोटिस के बैन कर दिया गया था , जिस पर कार्टूनिस्ट द्वारा अभिव्यक्ति आजादी पर यह प्रहार बर्दाश्त न किया जा सका और कार्टूनिस्ट ने अपने सभी कार्टूनों को अपने ब्लॉग Cartoons Against Corruption पर पोस्ट कर दिए और अभिव्यक्ति कि आजादी कि लड़ाई लड़ने के लिए  २५ वर्षी कार्टूनिस्ट ने  save your voice  कि स्थापना कि और वेबसेंसरशिप के खिलाफ जंतर  -मंतर पर ७ दिन कि भूख हड़ताल और फ्रीडम आफ द केज जैसे बड़े - बड़े अपनी आवाज़ को बचाने  के लिए साहसिक कार्यक्रमों का  आयोजन कर सरकार से लोहा लिया , सरकार कि तानाशाही और अभिव्यक्ति कि आजादी पर सरकार द्वारा लगाये जा रहे  अंकुश का  खुलकर का विरोध किया | असीम के अनुसार जेल में रहकर भी अभिव्यक्ति आज़ादी कि लड़ाई जारी रहेगी क्यूँकि सविधान के मौलिक अधिकारों को हमसे कोई नही छीन नही सकता और उनका यह भी कहना है कि देश-द्रोह का मुक़दमा उनके ऊपर लगा हुआ है वो ब्रिटिश कानून के अनुसार है  और हमारे देश को आज़ाद हुए ६५ वर्ष और सविंधान बने ६२ वर्ष हो चुके है फिर ये क़ानून कैसे लागू हो सकता है मै ऐसे क़ानून को नही मानता और इस क़ानून का खुले रूप से विरोध करता हूँ और सरकार अपने खिलाफ बोलने वालों का मुंह बंद करना चाहती है इसके लिए किसी हद भी हद गिर सकती है है पर सरकार भूल गयी है ये सबसे बड़ा जन लोकतान्त्रिक देश है यहाँ सब सरकार के हिसाब से नही जनता के हिसाब से चलता है पर लगता है सरकार ने हिटलर कि तानाशाही वाला अड़ियल रवैया अपना रखा है जो अपनी गलती स्वीकारने को तैयार ही नही है |
जिसका  खामियाजा सरकार को खुद भुगतना पड़ेगा | वही असीम के माता -पिता का कहना है कि वह असीम के कार्य से संतुष्ट है और एक नाते से असीम के माता -पिता होने के कारण उन्हें भी जेल में भी डाल देना चाहिए, हमे अपने बेटे पर गर्व है |  असीम के मुकदमे का फैसला न्यायपालिका के पास सुरक्षित है अभी अदालत ने असीम को ७ दिन कि पुलिस कस्टडी भेजा है |   

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Saturday, 8 September 2012

आखिर अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकार का लगाम लगाना शुरू

अत्यंत दुखद
कलम से कार्टून बनाने वाले पर देशद्रोह बताते हुए सरकार व मुंबई पुलिस ने आज असीम त्रिवेदी को गिरिफ्तार कर लिया उन पर धारा १२४अ राजद्रोह ,66a it act,1971national एम्बलेम लगा कर आज रात ८.३० बजे बांद्रा कुर्ला मुंबई थाने में गिरिफ्तार किया गया जो की पूर्ण रूप से गलत है एक कार्टूनिस्ट प़र देशद्रोह मै देश का आम नागरिक होते हुए ए बताना चाहता हू की अगर कार्टून बनाना देशद्रोह है तो फिर उन नेताओ को तो फ़ासी होनी चाहिए जो किसी महिला का रेप करते है किसी का क़त्ल करवा देते है और संसद के अन्दर नोटों भरा बैग उछालते है संसद के अन्दर हाथापाई करते है और उन्हें सरकार बाइज्ज़त सम्मान देती है अंग्रेजो से आजादी के बाद सबने आज़ाद देश का सपना देखा था पर हालत इतने बत्तर हों जायेंगे इसकी कल्पना भी नहीं की गयी थी की एक तरफ जो देश को नोच नोच के खा रहे है १००० करोड़ से १००००० करोड़ तक के घोटाले देश को खोखला कर दिया अगर उन गिद्धों का कार्टून बनाया गया तो ए कहा से गलत है वो गोलिया चलाते रहे घोटाले करते रहे और हम अपनी आवाज भी न उठाये और अगर आवाज उठाये तो हम पर राजद्रोह लगा दिया जाए

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Friday, 7 September 2012

जिन्दगी आम है ख्वाहिशें तमाम हैं

जिन्दगी चाहे जितनी भी आम होती है ।
ख्वाहिशें सभी की तमाम होती है ।।

आँखों में हज़ारों सपने लिए, निगाहें तलाशती हैं राहें।
उम्मीदों के साथ चल देते हैं कदम, चंद खुशियों के वास्ते ।
कुछ राहों में मिलती है खुशियाँ, तो कहींगम भी मिलते हैं।
कभी हम ठोकर खाकर गिरतें हैं , तो कभी गिरकर संभलतें  हैं ।
उम्र चाहे जितनी भी बीत जाए, ख्वाहिशों की उतनी ही ऊंची उड़ान होती है।
जिन्दगी चाहे जितनी भी आम होती है ।
ख्वाहिशें सभी की तमाम होती है ।।

कभी ख्वाहिशें दिल में ही दम तोड़ देती हैं ।
कभी ख्वाहिशें साँसों से नाता जोड़ लेती हैं ।
कभी ख्वाहिशों में ही अपना संसार लगता है ।
कभी ख्वाहिशों के बिना जीना बेकार लगता है ।
चाहे जितना भी हो घना अँधेरा,
हम उम्मीदों का दिया जला लेते हैं ।
चाहे सब कुछ लुट जाए फिर भी,
ख्वाहिशों की नयी दुनिया बसा लेते हैं ।
ख्वाहिशें बड़ी हों या छोटी, हर दिल का अरमान होती हैं ।
जिन्दगी चाहे जितनी भी आम होती है ।
ख्वाहिशें सभी की तमाम होती है ।।

By
स्वाती गुप्ता

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Thursday, 6 September 2012

आखिर किसने दिलाई हमें आजादी !

स्वतंत्रता की लड़ाई में दो तरह की लड़ाई लड़ी गई । एक सत्य और अंहिसा के पथ पर लड़ी गई लड़ाई जो कि हमारे परम पूज्य बापू के द्वारा लड़ी गई थी । दूसरी लड़ाई जो क्रातिकारियों के द्वारा लड़ी गई लड़ाई थी वो लड़ी गई थी भगत सिंह और आजाद जैसे क्रांतिवीरों के द्वारा ।
मैं गाँधी जी द्वारा लड़ी गई लड़ाई का सम्मान करती हूँ पर ये बात किसी भी सूरते हाल में मानने के लिए तैयार नहीं कि उनकी केवल ये लड़ाई हमें पूरी आजादी दिला सकती थी । गाँधी जी ने हमेशा ही भगत सिंह  की आलोचना की पर मै उनकी सभी आलोचनाओं का खंडन करती हूँ । मेरे हिसाब से अगर भगत सिंह जैसे क्रांतिवीर और लोग होते तो हमारा देश १९३० में ही आजाद हो गया होता । गाँधी जी भारत को आजाद देखना चाहते थे पर आजाद देखने और आजाद कराने में अंतर होता है । गाँधी जी के द्वारा चली जा रही लड़ाई में Down State की मांग की जा रही थी । इसका परिणाम ये होता कि हम  स्वतंत्रता के नाम पर आजाद तो हो जाते पर ऊपर से हुकूमत करते अंग्रेज । भारत में पूर्ण स्वराज्य की मांग सबसे पहले भगत सिंह ने ही पेश की । जब 23 वर्ष के भगत सिंह शहीद हुए, उस वक्त गांधी जी की उम्र 62 वर्ष थी पर लोकप्रियता के मामले में भगत सिंह कहीं से कम नहीं थे । भगत सिंह की यह बढ़ती हुई लोकप्रियता कांग्रेस को एक ख़तरे की तरह दिखाई देती थी क्योंकि कांग्रेस को सुरुवात से ही केवल सत्ता ही चाहिए थी । १९१५ में जब गाँधी जी अफ्रीका से वापस भारत लौटे थे , तब से वो सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर भारत को आधी अधूरी आजादी दिलवाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे । पर वास्तविकता यही है कि भगत सिंह जैसा क्रांतिवीर अगर अपनी क्रान्ति लेकर नेशनल अस्सेम्ब्ली में न कूंदा होता तो गांधी जी की सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते चलते कमर टूट जाती पर देश को आजादी न मिल पाती । क्योंकि गांधी जी शांतिपूर्वक नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे थे जो अंग्रेज़ों के लिए काफ़ी अच्छा था, इससे उनकी व्यवस्था पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ता। भगत सिंह की फांसी के दौरान देश भर के लोगों और कांग्रेस की तरफ से गाँधी जी पर दवाब था कि गाँधी जी इरविन समझौते में फांसी न लगने कि शर्त रख दे जिससे निश्चित रूप से फांसी रूक जाती परन्तु गाँधी जी ने ऐसा नहीं किया । गांधी ने इरविन समझौते में बातचीत के दौरान इरविन से केवल यह कहा था कि अगर इन युवकों की फाँसी माफ़ कर दी जाएगी तो इन्होंने मुझसे वादा किया है कि ये भविष्य में कभी हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे । गांधी के इस कथन का भगत सिंह ने पूरी तरह से खंडन किया । असलियत तो यह थी कि भगत सिंह हर हाल में फाँसी चढ़ना चाहते थे ताकि इससे प्रेरित होकर कई और क्रांतिकारी पैदा हों । वो कतई नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी रुकवाने का श्रेय गांधी को मिले क्योंकि उनका मानना था कि इससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुँचता ।
वे यह भी जानते थे कि घंडी जी मार्ग पर चलकर आजादी नहीं मिल सकती । नाथूराम विनायक गोडसे के अनुसार गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप , झांसी की रानीगुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। मेरे भगत के प्राण केवल उसकी माँ के लिए थे । भगत सिंह की फांसी जहाँ एक ओर ब्रिटिश हुकूमत और गाँधी की नैतिक हार में बदल गई । वहीं दूसरी ओर यह भगत सिंह और क्रांतिकारियों की नैतिक जीत भी बनी देश भर में अब हजारो क्रांतिकारियों ने जनम ले लिया था , वो भी पूर्ण स्वराज्य का सपना लेकर जिसको पूरा करने का दम ख़म बब उनके पास आ चुका था और अंततः मेरे देश की आजादी का वक्त आ गया था । पर देश के आजाद होते होते गाँधी जी के मोहम्मद अली जिन्हा के बेफजूली के समर्थन से मेरे देश की माता का अंग छिन्न भिन्न हो गया । कितने ही हिन्दू मुसलमान जाति सम्प्रदाय के नाम पर बलि चढ़ गए । कई हिन्दुओं से जबरन धर्म परिवर्तन करा लिया गया
भारत तो आजाद हो गया पर दिल में मलाल रह गया
कि काश भारत के यूँ टुकड़े न हुए होते

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Wednesday, 5 September 2012

भारत-न्यूजीलैंड पर एक नजर

भारत ने न्यूजीलैंड को 2-0 हराकर एक बार फिर कीवी टीम के भारत में टेस्ट मैच जीतने के 24 साल के सपने को तोड़ दिया हैं। इससे पहले 1988-89 में न्यूजीलैंड ने भारत को बाम्बे  (अब मुंबई) टेस्ट में 136 रन से हरा दिया था। 

हाल ही में हुई  सीरिज़ में भारत की ओर  से विराट कोहली , पुजारा, धोनी और सुरेश रैना ने बल्लेबाजी में और अश्विन , ओझा ने गेंदबाजी में काफी अच्छा प्रदर्शन करा हैं। क्रिकेट एक टीम गेम हैं इसमे हर खिलाड़ी को अपना अपना योगदान देना पड़ता हैं,चाहे फिर योगदान कम क्यों ना हो वो योगदान टीम की जीत और हार में महत्वपूर्ण रहता हैं।

इस सीरिज़ के पहले टेस्ट मैच में पुजारा ने शानदार शतक लगाया था। इस शतक के लगते ही सब उन्हें भारतीय टेस्ट टीम की नयी दीवार कहने लगे हैं, परन्तु खुद पुजारा का मानना हैं के राहुल द्रविड़ के बराबर पहुचने में उन्हें काफी वक्त लगेगा। साथ ही सहवाग ने भी पहली पारी में तेज गति ने 47 रन बनाए थे। जो बड़ा स्कोर खड़ा करने में मददगार थे।

पहले टेस्ट को भारत ने एक पारी और 115 रन से जीत लिया था। मेहमान टीम ने पहली पारी कुल जीतने रन  बनाए उतने तो अकेले पुजारा ने बना लिए थे। न्यूजीलैंड के बल्लेबाज फिरकी के जाल में इस तरह फसे के फिर वहा से बाहर निकलने का एक ही रास्ता था, वो था इस टेस्ट मैच में हार और ये हल मेहमान टीम ने चार दिन में ही ढूंढ़  लिया या फिर ये कहे के भारत की टीम ने उन्हें इस हल को ढूंढने में काफी मदद की थी।

दुसरे टेस्ट में मेहमान टीम ने पहले दिन जैसा उसे देखकर लगा के क्या ये वही टीम हैं जो पहले टेस्ट में खेली थी। पहले दिन 328/6 पर बनाकर न्यूजीलैंड ने ये संकेत दे दिए थे के इस टेस्ट मैच में भारत की झोली में जीत नहीं डालेंगे और लड़कर इस टेस्ट मैच को जीतने की कोशिश करेंगे।
दुसरे दिन 365 रन पर आउट होने के बाद भारत के 4 विकेट सिर्फ 80 पर गिरा कर न्यूजीलैंड ने इस टेस्ट मैच के जरिये सीरिज़ में वापसी के संकेत  दे दिए थे। परन्तु उस वक़्त भारतीय टीम का नया युवा संकटमोचक खडा हो गया और बेहतरीन शतक लगाकर भारत की डूबती नाव को पार लगा दिया। कोहली ने रैना के साथ 98 रन और धोनी के साथ 122 रन की बेहतरीन भागीदारी की और 103 रन बनाये।
दूसरी पारी में मेहमान टीम संभल कर खेल रही थी और तभी वो हुआ जो उन्होंने सोचा नहीं होगा। फिरकी गेंदबाजों को विकेट ना देने के चक्कर में 2 विकेट उमेश यादव की झोली में चले गए और फिर कीवी टीम का पाँव फिसला तो भारत के फिरकी गेंदबाजों ने संभलने का मौक़ा नहीं दिया।

भारत को जीत के लिए 260 रनों का लक्ष्य मिला जो भारत ने 5 विकेट गवाकर बना लिया। धोनी की कप्तानी में भारतीय सरज़मी पर ये भारत की 14वी जीत हैं। इससे पहले मोहम्मद अजहरुद्दीन के नाम अपनी कप्तानी में  भारतीय सरज़मी पर सबसे ज्यादा टेस्ट मैच जीतने का रिकॉर्ड था।
इस सिरीज़ जीत में अगर किसी बात  की कमी खली तो वो सिर्फ सचिन के रन ना बनाने की, देखा जाए तो सचिने के प्रशंसको में इस बात का सबसे ज्यादा दुःख हुआ हैं के वो तीन बार बोल्ड आउट हुए हैं। जो सचिन जैसे महान खिलाड़ी के परिद्रश्य से एक अचरज भरी बात हैं। पूर्व क्रिकेटर और भारतीय टीम के पूर्व  टेस्ट कप्तान सुनील गवास्कर का कहना हैं के अब सचिन के रीफ्लेसेस  कम हो गए हैं, जो उम्र के इस पड़ाव पर हर खिलाड़ी के साथ होता हैं।संजय मांजरेकर  ने भी गवास्कर की बात का समर्थन करते हुए सचिन को अब संन्यास लेने की सलाह दे डाली, हालाकि वो इस बात से आज पलट गए हैं।

सचिन एक महान खिलाड़ी हैं।उन्हें क्रिकेट का भगवान यू ही नहीं कहा जाता है। उनके रिकार्ड, उनका जज्बा और उनकी विनम्रता इस बात की हमेशा पुष्टि करती हैं। उन्हें आउट करने के लिए विरोधी टीमे नए नए तरीके खोजती हैं। सचिन हर बार उनके तरीके को अपने बल्ले के दम से विफल कर देते हैं। 

सालो पहले सचिन आफ-स्टम्प के बाहर की गेंदों पर गली या पाईंट पर कैच आउट  होंने लगे थे। लेकिन उन्होंने विरोधी टीम की इस रणनीती का जवाब बखूबी तरीके से दिया था। उन्होंने आस्ट्रेलिया में दोहरा शतक लगाया था, जिसमे उन्होंने आफ-स्टम्प  की बाहर की गेंदों को बडे  एहतियात  से खेला था। 

कोई दूसरा खिलाड़ी होता तो शायद तीन पारियों में बोल्ड आउट होने के बाद निराश हो जाता, परन्तु सचिन ने इस परेशानी का हल ढूंढना शुरू कर दिया होगा और आगे आने वाली इंग्लैंड सीरिज़ में वो फिर से अपने महान होने का सबूत  देकर अपने आलोचकों को करार जवाब देंगे।
न्यूजीलैंड की टीम भले ही कमज़ोर थी। परन्तु फिर भी भारतीय टीम ने अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करा हैं। कई सालो बाद भारत की टीम राहुल द्रविड़ और वी .वी .एस लक्ष्मण के बगैर मैदान में उतरी थी। ये वक्त तरकीबन वैसा ही हैं, जब सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ ने साथ ही में क्रिकेट के मक्का " लार्डस " में अपने करियर की शानदार शुरुवात की थी. उस वक्त किसी ने नहीं सोचा होगा के ये आगे चल कर भारतीय क्रिकेट को इतना आगे ले जायेंगे। उम्मीद करते हैं के पुजारा, कोहली,रैना जैसे सितारे भी इन्ही की तरह भारतीय क्रिकेट को और आगे ले जाए।

( चिराग जोशी )

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Monday, 3 September 2012

अरविन्द पर वार, पर सांसदों के आगे लाचार ।

एक बार फिर सरकार ने साबित कर दिया कि मासूम जनता को वो जब तक निगल नहीं जायेगी, तब तक उसका पेट नहीं भरेगा । एक तरफ वो आम जनता पर अपना जोर दिखाती नजर आई । वही दूसरी ओर वो अपने ही विपक्षी भाइयों के आगे किसी भी तरह कि ताकत आजमा न पाई ।
अरविन्द केजरीवाल आज सरकार पर उत्पीडन का आरोप लगाकर अपनी गिरफ्तारी देते नजर आये, अगर उनके सभी आरोपों पर विश्वास किया जाए तो इससे साफ़ जाहिर है कि सरकार को बड़े-बड़े भ्रस्टाचारी ए रजा, और कनीमोझी जैसे लोग सालों तक नजर नहीं आते । आखिर नजर आये भी कैसे - आखिर चोर चोर मौसेरे भाई। कोयेला आवंटन के बाद तो कुछ ऐसा ही लगता है । हाँ लेकिन सरकार को भ्रस्टाचार और अपने ही हक़ के लिए  लडती जनता जरूर उसकी गद्दी पर सेंध लगाती नजर आई होगी । तभी तो सरकार अपना हर वो पासा फेंक रही है जिससे उसकी कुर्सी बची रहे ।
पर मनमोहन जी कोई ऐसा पासा जल्द ही फेकिये जिससे संसद का हंगामा शांत हो जाए वरना आपकी लाचारगी कही आपके विपक्षी भाइयों के आगे उनकी कुर्सी की सीड़ी न साबित हो जाये । वैसे हमारे पैसे पर अब  सांसदों को कुर्सी के नाम पर हंगामा करके जो हलुआ पूड़ी खाने मिल रही न वो पूरा देश देख रहा है । इसका अंजाम जनता आपको २०१४ से पहले ही दिखाने  की पूरी कोशिश करेगी ।
धन्यवाद

स्वाती गुप्ता

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कार्टूनिस्ट का वारंट लेकर आयी महाराष्ट्र पुलिस

एक कार्टूनिस्ट का वारंट लेकर गुरुवार को जैसे ही महाराष्ट्र की पुलिस शुक्लागंज नगर के ऋषि नगर मोहल्ले पहुची वहां हड़कंप मच गया | मुंबई  के बांद्रा कुर्ला काम्पलेक्स के पुलिस असिस्टेंट इन्स्पेक्टर संजय पाटिल ने बताया की शुक्लागंज ऋषि नगर के रहने वाले असीम  त्रिवेदी ने मुंबई के एम्एम् आरडी मैदान में बीते महीने अन्ना हजारेपर मुंबई  की रैली के दौरान भद्दे और गंदे कार्टून बनाए थे | जिस पर मुंबई हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी | जिस पर कोर्ट ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया है |जिसे लेकर वह अपनी टीम के साथ शुक्लागंज आये हैं |उन्होंने असीम त्रिवेदी के पिता अशोक त्रिवेदी ने गंगाघाट थाने   में महाराष्ट्र पुलिस को बताया की उंनका बेटा इन दिनों दिल्ली के लक्ष्मीनगर  इलाके में रह रहा है |उन्होंने अपने कार्टूनिस्ट बेटे  को फोन पर  सुचना दी|

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