Sunday, 30 September 2012

टीम केजरीवाल और टीम अन्ना की राजनीतिक पैतरेबाजियों के फ्राई पैन पर फ्राई होता आम आदमी..

पहले अन्ना आंदोलन खत्म, उसके बाद एक खेमा बना जो राजनीतिक दल बनाने के फैसले के साथ था उसकी आस बरकरार रही की कुछ होगा ..अब पार्टी बनाने को लेकर अन्ना एकदम खिलाफ़ हैं.. लेकिन दस अगस्त को जो एलान मंच से हुआ उसमें सहमति तो अन्ना की भी थी.केवल शांति भूषण थे जिन्होंने उसी समय कहां था की पार्टी बनाना अभी उचीत नही.(हालांकि वो भी दोनों तरफ़ रहकर दुविधा वाली स्थिति उत्पन करें हुये हैं) किसी ने भी किसी किस्म का कोई विरोध नही किया.
केजरीवाल ने कोयला आवंटन मामले पर लगभग सारी की सारी राजनीतिक जमात को एक चादर में लपेटे हुये प्रधानमंत्री निवास से लेकर सोनिया गांधी और मुख्य विपक्ष पार्टी भाजपा के अध्यक्ष नितित गडकरी का विरोध कर उनके निवास स्थान पर भारी तादाद में प्रदर्शन कर यह चेता दिया की उन्होंने विपक्ष की जगह भरने का बेड़ा अभी से उठा लिया हैं.किरण बेदी भाजपा अध्यक्ष के निवास स्थान का घेराव करने की वजह से केजरीवाल से खुद को अलग कर गई.यही से दरारे साफ़ दिखने लगी. वही रालेगण
  सिद्धी से अन्ना हजारे ने अरविंद के इस विरोध का समर्थन ही नही उनकी पिट भी थपथपायी.लेकिन,अचानक पार्टी बनाने को लेकर ऐसा क्या हुआ जो अन्ना ने दो टुक अरविंद से किनारा कर दिया और अपनी तसवीर,साझा मंच तक इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया.?
कई जानकारों की माने तो यह अंतर अब विचारधाराओं का भी हैं.. |ऐसा मालूम होता हैं की जंतर मंतर पर ही मंच से अलग जरूर पार्टी बनाने के निर्णय को लेकर असहमतियां दर्ज हुई होंगी .. कुछ अवाजे पार्टी ना बनाने को लेकर उठी थी जिन्हें उस समय दबा दिया गया.कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की माने तो उस दिन वो स्वंम वहां पार्टी बनाने को लेकर विरोध कर रहें थे पर उनकी अवाज को अनसुना कर दिया गया.. यहां तक की उनके बैनर फाड़ दिए गए. अब सवाल उठता हैं की अरविंद ने पार्टी बनाने के निर्णय को लेकर शुरूआत में ही यह सुनिश्चीत कर दिया था के यदि अन्ना कहेंगे तो हम पार्टी नही बनाएंगे. ऐसे में अन्ना की ना,पार्टी के लिए अरविंद की हां क्या सिद्ध कर रहा हैं.?क्या अरविंद अकेले भी उतने प्रभावशाली रहेंगे जितने अन्ना के समर्थन के साथ थे.ऐसा जंतर मंतर पर हो रहें इस बार के अनशन में भी साफ़ साफ़ दिखाई दें गया था की अरविंद और बाकी साथियों के अनशन पर बैठने के बावाजूद भी लोग उतना एकजुट नही हुये जितना अन्ना के बैठने के बाद हुये.सवाल तो बहुत हैं.. केजरीवाल से भी हैं और अन्ना से भी हैं. लेकिन सबसे अहम सवाल इस वक्त़ ये ही हैं कि आप लोगों की खीचतान के बीच वो जनता क्या करें जिसने कभी और शायद आज भी काफ़ी उम्मीदें बांदी थी आप से.. ?

लेखक -अंकित 
मुटरिजा (सम्पर्क करने के लिए क्लिक कर्रें http://www.facebook.com/ankit.mutreja.5?fref=ts)

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