Wednesday, 26 September 2012

कई दुकानें करेंगी सवाल,किससे पूछ कर किया विदेशी निवेश का फैसला ..

जिस जगह मैं रहता हूं उससे कुछ दूरी पर एक गली हैं,जिसका नाम हैं "शटर" वाली गली.. नाम के पीछे बात ये हैं कि गली में जितने घरो के दरवाजे नही उससे अधिक दुकानों के शटर हैं..| हमारे देश में तकरीबन चार करोड़ ऐसे छोटे खुदरा व्यापारी हैं जो इन्हीं दुकानों के जरिए अपनी आय पर निर्भर हैं.यदि एक आकलन लगाया जाएं और हर दुकानदार के परिवार में चार सदस्यों को जोड़े तो कुल सोलह करोड़ लोग इन दुकानों पर निर्भर हैं.. एटी केर्नी वैश्विक रिटेल विकास सूचकांक रिपोर्ट 2011 की माने तो खुदरा क्षेत्र जीडीपी का 22 फीसदी हैं.ऐसे में सुधारों की आड़ में जिस तरह से मौजूदा यूपीए सरकार बिना किसी आम सहमति के खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष बहुब्रांड विदेशी निवेश को मंजूरी दें देती हैं तो सवाल उठना लाजिम हैं की हम वालमार्ट सरीखे की उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने देश में जाल फैलाने की अनुमति कैसे दें रहें हैं जहां के राष्ट्रपति स्वंम ट्विट कर के कहते हैं कि लोग अपनी गली कुचों की दुकानों से सामान पहले लें ना की सुपर स्टोर्स से.?(अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कें संदर्भ में)..
यह बात साफ़ हैं कि विदेशे में भी जा कर हमारे कई ऐसे खुदरा व्यापारी हैं जो वहां अपने लिए जगह बनाने में कामयाब रहते हैं,किंतु यहां जिस प्रतिस्पर्धा यानि "कंपीटिशन" की हम बात कर रहें हैं वो किन्हीं मामूली कंपनियों से नही बल्कि उन कंपनियों से हैं जो अकेले अपने दम पर पूरी दिल्ली को भरने का दम रखती हैं.वालमार्ट ने तो सरकार के इस झटका उपचार के फैसले के तुरंत बाद ही बारह से अठारह माह के भीतर स्टोर खोलने का दावा पेश कर दिया.पर, जब हम वालमार्ट से प्रतिस्पर्धा की बात करते हैं तो हमें यह ध्यान में रखना चाहिए की ये वो स्टोर नही होंगे जो कैसे ना कैसे उधार पर पैसा लें कर भी अपना ग्राहक बनाए रखने के लिए उसे उधार पर समान देने का दम रखते हैं.. बल्कि ये वो घोर पूंजीवादी व्यवस्था होगी जो पूरे के पूरे राजनीतिक तंत्र को अपने कदमों में झुका दें.वालमार्ट की ही बात करें तो दुनिया की सबसे ताकतवर कंपनियों की वर्ष 2012 की फाच्यर्न पांच सौ की सूची में दूसरे नंबर की कंपनी हैं.इससे पहले वह लगातार दो पर्षो तक पहले नंबर पर थी.देश की दस सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों का कुल मुनाफा भी वालमार्ट के मुक़ाबले में कम हैं.विदेशी निवेश को लेकर इसी क्षेत्र में इतना विरोध क्यों हुआ ?
इस बात पर विचार करने की अवशयकता हैं.ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां विदेशी निवेश हुआ पर आज तक इतना विरोध नही हुआ ऐसा इसलिए क्योंकि यह मुद्दा सीधे आम आदमी से जुड़ता हैं. "खास" की नुमाइंदगी करने वाली यूपीए शायद इस बात पर जवाब नही देगी के वालमार्ट के बोर्ड आँफ डायरेक्टर में रह चुकी एवं उसके लिए खुल कर लाबीइंग करने वाली अमेरिकी विदेश मंत्री "हिलेरी क्लिंटन" ने भारत में प्रवेश के लिए लाबीइंग पर घोषित तौर पर जो (15 लाख डाँलर) खर्च किए थे वो कहां और किस रूप में इस्तेमान हो रहें हैं.? इन्हीं वालमार्ट जैसे स्टोर्स की महरबानी थी की कुछ समय पहले भारत के दौरे पर आयी अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन दिल्ली की बजाए सीधा बंगाल एफडीआई का विरोध करने वाली ममता के पास गयी.इस बात में कोई दो राय नही की खुदरा बाजार में निवेश से अर्थव्यवस्था में उछाल आएगा परंतु इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे.. ? ज़रा उस पर भी नज़र डाली जाएं..

खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भले अर्थव्यवस्था में उछाल आए लेकिन सोचिएगा जब हमारे देश की अर्थव्यवस्था कृषि के बाद के सबसे फलकारी क्षेत्र यानि खुदरा बाजार पर निर्भर रहते हुये भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो जाएगी तब क्या होगा.?यह कंपनियां शुरूआत में घाटा झेल कर भी अपना बाजार बनाती हैं लेकिन बाद में जब दूसरे दुकानदार इनके मुक़ाबले कहीं ठहरते नही तब इनकी मनमानी ही चलती हैं.ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे-अमेरिका की ही एक रिपोर्ट के अनुसार सुपर स्टोर्स ने 1994 से लेकर 2004 के बीच टमाटरों की कीमतें 46 फीसदी बढ़ा दीं लेकिन किसानो को मिलने वाली वास्तविक कीमत में 25 फीसद की कमी आ गई.मतलब उपभोक्ताओं के लिए दाम में ईजाफ़ा तो हुआ ही हुआ, साथ में सरकार के अनुसार किसान हितकारी कंपनियों ने किसानो को भी छला. ब्राजील में बड़े रिटेल स्टोर्स के खुलने के बाद 1987 से 1996 के बीच फल-सब्जियों की बिक्री में छोटे खुदरा दुकानदारों की हिस्सेदारी में 28 फीसदी की कमी आ गई.चौका देने वाला उदाहरण इंडोनेशिया हैं जहां एक साल(2002-2003) में कोई 1.54 लाख छोटी दुकानें बंद हो गई.

दूसरा सबसे वाहियात तर्क जो एफडीआई के पक्ष में सरकार की ओर से रखा जा रहा हैं वो ये कि कंपनियां खुलेंगी ही वहां जहां दस लाख से ज्यादा की आबादी हो.. इस बात को एक एहसान की तरह हम पर थोपा जा रहा हैं जबकि धंधे का यह वसूल हैं की उसमें फायदा देखा जाएं.. वालमार्ट या टेस्को जैसी कोई भी कंपनी अपनी लागत के हिसाब से ही स्टोर का केंद्र खोलेगी.इसमे खुदरा व्यापरियों के लिए राहत की बात नही बल्कि एक चेतावनी हैं की जो भी स्टोर खुलेंगा उसका प्रमुख निशाना कम से कम दस लाख उपभोक्ता हैं.
केंद्रिय उघोग मंत्री आनंद शर्मा इस निवेश को बेरोजगारी का त्वरित ईलाज बता रहें हैं लेकिन ऐसे रोजगार के लिए क्या आप और हम तैयार हैं ?जिसकी एवज में देश के चार से पांच करोड़ छोटे खुदरा व्यापारियों को बेरोजगार होना पड़े और फिर इन्हीं स्टोर्स पर काम करना हो.वालमार्ट के दुनिया भर में 8970 स्टोर्स हैं जिसके लिए 22 लाख कर्मचारी काम कर रहें हैं.2011 में उसने 446.95 अरब डाँलर का कारोबार इतने ही कर्मचारियों की बदौलत किया.भारत का कुल खुदरा व्यापार लगभग 450 अरब डाँलर का हैं जबकि यहां 1.4 करोड़ लोगों को इसमे 
रोजगार मिला हुआ हैं.

कई लोग खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष बहुब्रांड निवेश के कड़े विरोध को कंप्यूटर प्रवेश के दौर से जोड़ कर देख रहें हैं जबकि सच यह भी हैं कि कंप्यूटर के आने के बाद बेशक कई लोग बेरोजगार हुये हो फिर भी उस आधुनिकीकरण की राह में लोगों के पास विक्लप था की वे एक नयी टेकनीक को सीखे.यहां कोई विक्लप नही रहेगा.फिर सवाल पैसा पेड़ पर नही उगता किस्म के जुमलें बोलने वाले प्रधानमंत्री महोदय से भी होना चाहिए के उन्होंने देश के खुदरा व्यापार को बुनियादी तौर पर मजबूत करने के लिए आखिर किया ही क्या.?
चुनावी राजनीति को ख्याल में रखा जाए तो जानकारों का यह भी मानना हैं की सोनियां गांधी के बेहद चहेते राष्ट्रीय खाघ सुरक्षा कानून के लिए एक लाख करोड़ रूपयो की अलग से व्यवस्था भी चाहिए.राष्ट्रीय खाघ सुरक्षा लाने के लिए सरकार को एक लाख 19 हजार करोड़ रूपय की दरकार हैं.गौर करने वाली बात ये भी हैं कि जो टाईम्स पत्रिका 2010 में मनमोहन सिंह की तारिफों के कसीदें पढ़ते नही थकती थी,वही पत्रिका 2012 में उन्हें उंडरअचीवर कहती हैं.कहां जाता हैं कि टाईम पत्रिका वाईट हाँऊस से ही फाईनल हो कर निकलती हैं.

लेखक-अंकित मुटरिजा

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home