Saturday, 4 May 2013

हे ! कलम और कागज़, प्रणाम तुम्हें।

उस कलम के नाम जो बिना थके और कोई सवाल किये, मुझे खुद को व्यक्त करने में, मेरी सहायता करती है और उस कोरे कागज को समर्पित, जो मेरे विचारो को, मेरी सोच को और मेरी भावनाऔ को खुद में समेट लेता है, संजो लेता है और वो भी तब तक के लिये जब तक कि वो खुद नष्ट ना हो जाये। जो मेरी हर बात को खामोशी से ध्यान लगा कर सुनता है। उस कोरे कागज़ को जिसे मेरी सोच का आइना बनने मे कोई हर्ज नहीं।

"मेरी कलम तुम, तुम मुझे,
किसी उदृश्य गुरुत्व से,
आकर्षित करती हो अपनी ओर,
और मेरी सोच को, भावो को, विचारों को,
स्याही से अपनी ,
उकेरने में कागज पर,
करती हो मदद मेरी।

और कागज तुम, तुम
बिना कोई सवाल किये,
मेरे तमाम राज़ वर्षो से,
करते आ रहे हो खुद में दफन,
मेरी बातों को,
विचलित हुए बिना,
आ रहे हो सुनते,
और ना जाने कितने लम्हों को,
कर खुद में दर्ज ,
उन्हें, कर रहें हो ,
यादो में तबदील, वर्षो से।

आभारी मैं तुम दोनो का,
और सदा रहूँगा भी,
और सदा रहूँगा भी।

हे ! कलम और कागज़, प्रणाम तुम्हें
कैसे करूँ मैं ?
धन्यवाद तुम्हारा
"
 
 
लेखक- अम्बर सक्सेना

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