Friday, 31 May 2013

पोटली


इस समतल पर पॉव रख
वो चल दी है आकाश की ओर
हवाओं का झूला और
घाम का संचय कर
शाम के बादलों से निमित्त रास्ते से
अपने गूंगेपन के साथ
वो टहनियों में बांधकर
आंसूओं की पोटली ले जा रही है
टटोलकर कुछ बादलों को
वो सौंप देगी ये पोटली
फिर चली आयेगी उसी राह से
फडफडाती आंखों की चमक के साथ
इसी उम्मीद में कि अब इन शहरों में
बारिसों का शोर सुनाई नहीं देगा
लोग उत्साहित होंगें पानी के सम्वाद से
क्योंकि भरे हैं अब भी
दुख उसी पोटली में
जो बादलों ने सम्भाल रखी है

दीप्ति शर्मा

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1 Comments:

At 3 June 2013 at 09:01 , Anonymous jyoti khare said...

वाह बहुत सुंदर अनुभूति
उत्कृष्ट प्रस्तुति

आग्रह है पढें
तपती गरमी जेठ मास में---
http://jyoti-khare.blogspot.in

 

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