Thursday, 25 April 2013

मुझे प्रेम है उन सारी कश्तियों से


मुझे प्रेम हैं उन सारी कश्तियों से.
जो औंधे मुह पडी रहती है
नदियों झीलों और समन्दरों के किनारों पर
बिना थके, बिना रुके बिना रोयें
ओ नाविक!!!
आओ और घसीट कर उतार लो
बेरंग पानी में प्यासी कश्ती को !!!
कश्तियों की कोई जरूरते नहीं होती हैं ....
जरूरते तो होती हैं,या तो नाविकों की,या तो मुसाफिरों की.
कश्तियाँ मुसाफिर नहीं होती हैं.
एक दिन जब जिंदा शज़र को काट कर,
गढ़ दी गई थी वह कश्ती की शक्ल में,
सूख गया था उनका खून,उनका पानी,उनका जीवन.
तब से अब तक हर पल
अनगिनत मुसाफिरों के सपने,जीवन और दुनिया भर के बोझ
लिये लिये फिरती हैं.
वे नाविक
जिन्होंने,सदियों से कश्तियों को अपनी मर्जी से चलाया है
कहते हैं-मुक्त हो जाएँगी ये कश्तियाँ डूबकर.
कोरा झांसा, झूठा सपना,ख्याली पुलि-न्दें.
कश्तियाँ डूबकर स्वतंत्र नहीं होती हैं.
करती रहती हैं इंतज़ार,फिर से
सपनों के फूल पत्तियां खिलने का
कलियों के ख्वाब बुनने का.
अपनी जमीन और अपना आसमान चुनने का.
मुझे प्रेम है उन सारी कश्तियों से.

 अविनाश पाण्डेय

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