Sunday, 6 October 2013

शाम....


ज़िन्दगी में रिश्तों को उलझते हुए देखा है मैंने
हर मोड़ पर बिना बात के झगड़ते हुए देखा है मैंने
एक लम्हें में जिया है सदियों का सफ़र 
चंचल मन को हर पल उदास होते देखा है मैंने
प्रेम की एक पाती में प्यार को सिमटते हुए
आँखों से छलकते आसुंओं में
रिश्तों को डूबते हुए देखा है मैंने 

उम्र बीत जाती है सच्चे प्यार के इंतज़ार में
किसी को किसी के प्यार में टूट कर बिखरते हुए देखा है मैंने
यूँ तो हर जाम यादों के पिया करते थे
प्यार को कई बार सिसकते हुए देखा है मैंने
एक वो शाम थी जब आंसुओं से दोस्ती हुआ करती थी
एक ये शाम है जब आंसुओं से भी नाता टूटते देखा है मैंने

_____सुप्रिया श्रीवास्तव____ 

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