Tuesday, 29 October 2013

सारी नज़रों से दरकिनार हुआ



सारी नज़रों से दरकिनार हुआ 

मैं गए वक़्त का अखबार हुआ 



एक इशारे से भी निबट जाता 

उनसे शिक़वा तो बेशुमार हुआ 



मैं अदाकार तो अच्छा था मगर 
मुझसे हटके मेरा किरदार हुआ 

रास्तों ने की परवरिश अपनी 
ये सफ़र कितना शानदार हुआ 

जितने रिश्तों को आज़माया था 
सबकी बुनियाद में बाज़ार हुआ 

कोई सरमाया लूट लो मेरा 
मेरा सपनों का कारोबार हुआ 

कोई जंगल तो मेरे अन्दर था 
मैं जो एक घर का तलबगार हुआ 

उनके आने के बाद भी कितना 
उनके आने का इन्तज़ार हुआ


 कवि- ध्रुव गुप्ता (आई.पी. एस )

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