Sunday, 28 July 2013

जरुरी है युवाओं के लिए सेक्स एजुकेशन

युवावस्था जीवन का एक ऐसा चरण होता है जब हर किसी का मन चंचल और जिज्ञासू रहता है और सेक्स और उससे जुडी चीज़ें हमेशा से ही युवाओं के लिए एक जिज्ञासू विषय रही हैं, मगर न ही इसे युवाओं के समक्ष कभी शैक्षिक तरीके से प्रस्तुत किया गया और न ही इसकी बातों को कभी खुलकर ही युवाओं के समक्ष प्रस्तुत रखा गया, जिसके कारण युवाओं की जिज्ञासा कभी-कभी कुंठा में भी परिवर्तित होती दिखायी देती है |
   हमारा समाज आज तेज़ी बदलाव और तरक्की की ओर बढ़ रहा है, पर आज भी हमारा समाज कई ऐसे विषय हैं जिन पर बात करना हमारे समाज में अशोभनीय और अनुचित मन जाता है या फिर जिन पर बात करने से हम सब कतराते हैं उनमे से एक विषय सेक्स भी है | यह एक ऐसा विषय है जिस पर बात करने से तो हम बचा करते हैं मगर इससे युवाओं में इसकी जिज्ञासा आगे चलकर कभी-कभी एक भयंकर रूप भी ले लेती है जो समाज में किसी प्रकार के अपराध का कारण भी बन सकती है | जब युवाओं के समक्ष इस तरह की बातें सकारात्मक रूप से प्रस्तुत नहीं होती हैं तो वे अपने मन में अपनी एक अलग विचारधारा बना लेते है जिसके अनुरूप वो ढलने लगते है और गलत कदम उठा बैठते हैं |

  हमारे समाज में सेक्स के प्रति जागरूकता की बेहद आवश्यकता है क्यूंकि जब किसी समस्या का निदान सही तरीके से करना हो तो उस समस्या को जड़ से उखाड़ना पड़ता है और आज का भटका हुआ युवा ही आगे चल कर अपराधी भी बन सकता है इसलिए आज हमारे समाज में इस संवेदनशील विषय पर खुली चर्चा करने की बेहद आवश्यकता है | इस विषय पर सामने आकर घर के बड़ो को अपने बच्चों से बात करनी होगी और उससे भी महत्वपूर्ण इस विषय को सकारात्मक रूप से अपने बच्चों के समक्ष रखना होगा | अगर इस बेहद संजीदा विषय को चर्चा का विषय न बनाया गया तो आगे चलकर ये यथा स्तिथियों से भयंकर परिणामो के साथ सामने आ सकता है | यह विषय संवेदनशील तो है पर जिस तरह से समाज में इसका प्रस्तुतीकरण किया जाता है वो एक गलत विचारधारा को जन्म देता है जोकि घातक हो सकता है इसलिए आवश्यकता है की आगे बढ़कर इस विषय को सही तरीके से प्रस्तुत किया जाए |

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1 Comments:

At 7 February 2014 at 04:25 , Anonymous AyodhyaPrasad Tripathi said...

ब्रह्म है मानव के रोम-रोम में उपलब्ध चेतन परमाणु| यह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व-व्याप्त, वह शक्ति है जिससे सब कुछ, यहाँ तक कि ईश्वर भी उत्पन्न होते हैं।
व्यक्ति का यह सर्वशक्तिमान चेतन परमाणु वीर्य में निहित है| आतताई अब्रह्मी संस्कृतियां खतना द्वारा व्यक्ति के इसी वीर्य को नष्ट कर उसे दास बना चुकी हैं| ईसाइयों ने कुमारी माओं को महिमामंडित कर और वैश्यावृति को सम्मानित कर मानवमात्र को वीर्यहीन कर दिया है| इन मजहबों ने संप्रभु मनुष्य को दास व रुग्ण बना दिया है|
अहम् ब्रह्मास्मि का तात्पर्य यह निर्देशित करता है कि मानव यानी प्रत्येक व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त महिमावान है - इसलिए हे मानवों! आप चाहे मुसलमान हो या ईसाई, अपने व्यक्तित्व को महत्त्व दो। आत्मनिर्भरता पर विश्वास करो। कोई ईश्वर, पंडित, मौलवी, पादरी और इस तरह के किसी व्यक्तियों को अनावश्यक महत्त्व न दो। तुम स्वयं शक्तिशाली हो - उठो, जागो और जो भी श्रेष्ठ प्रतीत हो रहा हो, उसे प्राप्त करने हेतु उद्यत हो जाओ। जो व्यक्ति अपने पर ही विश्वास नही करेगा - उससे दरिद्र और गरीब मनुष्य दूसरा कोई न होगा। यही है अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य।

 

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