Thursday, 29 November 2012

महबूबा



ज़िन्दगी को चाहा था दिल से
 , महबूबा थी वो मेरी...
ठुकराया उसने मुझे हर कदम पर ,
 ना कभी मेरी बनी...
चला मैं जीना छोड़ कर ,
 हर पल हर घड़ी...
जाने वो कौन सा मोड़ था ,
 मिली जहाँ एक हसीना खड़ी...
मौत था नाम उसका , 
मुझे देख हँस पड़ी...
बोली कहाँ गया था भटक ,
 मैं ही तो थी तेरे लिए बनी...
ज़िन्दगी से ज़्यादा चाहूँगी तुझे ,
 एक बार अपना तो सही........

लेख - अंकुर सहाय 

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