महबूबा
ज़िन्दगी को चाहा था दिल से
, महबूबा थी वो मेरी...
ठुकराया उसने मुझे हर कदम पर ,
ना कभी मेरी बनी...
चला मैं जीना छोड़ कर ,
हर पल हर घड़ी...
जाने वो कौन सा मोड़ था ,
मिली जहाँ एक हसीना खड़ी...
मौत था नाम उसका ,
मुझे देख हँस पड़ी...
बोली कहाँ गया था भटक ,
मैं ही तो थी तेरे लिए बनी...
ज़िन्दगी से ज़्यादा चाहूँगी तुझे ,
एक बार अपना तो सही........
लेख - अंकुर सहाय
लेख - अंकुर सहाय
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