Wednesday, 28 November 2012

फांसी का वीडियो नही हो सार्वजनिक



कसाब की फांसी के साथ ही मेनस्ट्रीम से लेकर सोशयल मीडिया एक सवाल लगातार पुछने लगा था कि क्या कसाब की फांसी से पीड़ितो को मिला इंसाफ ? यह सवाल अपने आप में निंदनीय हैं.हम सब भलि भांति जानते/समझते हैं की पीड़ितो ने 26/11 के दौरान जो दर्द सहा वो एक 26/11 का नही.बल्कि हर रोज़ का हैं.ज़िंदगी भर का हैं और हर वर्ष एक 26/11 इस दर्द को पुन:जीवित कर जाती हैं.यह सच हैं की फांसी से शायद पीड़ितो को इतनी संतुष्टि मिली होगी की हमारे देश में खुलेआम कत्लेआम करने वाले आतंकी को पनाह तो कम से कम हमारी सरकार अब नही दें रही.इस मसले को लेकर अलग अलग मत हो सकते हैं पर यह साफ़ कर दूं की कितना भी खर्चा क्यों ना हुआ हो.एक न्यायिक व्यवस्था के तहत कसाब को अपना पक्ष रखने का मौका प्रदान कर हमारें देश ने दुनिया भर में एक मिशाल काय़म की हैं.इसके पीछे राजनीतिक रणनीतियां भी हो सकती हैं लेकिन जिस देश को हम दुनिया का सबसे बढ़ा लोकतंत्र कहते हैं और जहां अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी खुद को गांधीवाधी कहते हैं वहां अन्ना का यह कहना की कसाब को सरेआम फांसी दी जानी चाहिए थी घोर निंदा योग्य हैं.रफ्तार लाईव पर भी एक लेख चला जिसका शीर्षक था-'कसाब की फांसी का वीडियो होनी चाहिए सार्वजनिक' का भी मैं समर्थन नही करता.हमे समझना होगा की जिस गांधी को हम आज तक केवल नारों मात्र में इस्तेमाल करना एक बेहतर विकल्प समझते आएं हैं उनका खुद का यह मानना था की 'अपराधी से नही अपराध से घृणा करों ' ऐसे में बदले की भावना और इस तरह की भावना रख हम किस दिशा की ओर ले जाएंगे देश को.?सवाल और भी कई हैं.जहां तकरीबन डेढ़ सौ देश फांसी के खिलाफ़ संयुक्त राष्ट्र में खड़े हैं वहां हम वीडियो सार्वजनिक कर के आखिर क्या सिद्ध करना चाहते हैं.?वीडियो सार्वजनिक करने के अपने आप में उनेक ख़तरे भी हैं जिसे ऐसी मांगे करने से पहले समझना चाहिए.उग्रवादी,अलगाववादी,और आतंकी वैसे भी सहानुभूति बटोरने के मौके की तलाश में हैं.वीडियो के सार्वजनिक होने का मतलब होगा कसाब को लेकर एक और विस्फोट करना.यह बात पूरी तरह साफ़ हैं की जिन लोगों ने अपने दोस्तों,रिश्तेदारों,अपनो,को खोया उनका जख़्म आज तक ताजा हैं.लेकिन,फैसला हमें करना होगा की हमारी जंग आखिर हैं किस के खिलाफ़?क्या एक कसाब से या हाफिज सईद से? या पूरे के पूरे आतंकवाद से.हमे अपनी सरकार पर इस मामले में कम से कम इतना तो भरोसा रखना होगा की सुरक्षा के लिहाज से ना सही लेकिन राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए उसने एक ऐसा कदम उठा दिया हैं जो अपने आप में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के लिहाज से काब़िले तारीफ हैं.और जो लोग कसाब की मौत को डेंगू से जोड़ रहें हैं उन पर हंसना भी लाज़िम नही.इतने गम्भीर मसले को इस तरह हल्के में लेना और अंतराष्ट्रिय मुआमले को डेंगू मच्छर पर खत्म कर प्रश्न चिन्ह उठाना,किसी तरह से उचित नही.

लेख - अंकित मुत्त्रिजा 

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4 Comments:

At 29 November 2012 at 07:27 , Anonymous Anonymous said...

अंकित जी मै वैभव सिंह आपके विचारों की कद्र करता हु मगर आपने ने जितने सवाल या मुद्दे इस लेख में उठायें हैं मैं उन सभी पर पहले ही स्पष्टीकरण दे चूका हूँ फिर भी अलग से अगर आपके मन में कोई शंका है तो पूंछे आपका स्वागत है ।

 
At 29 November 2012 at 11:15 , Anonymous Ankit Mutreja said...

कैसा स्पष्टीकरण विभव भाई ? मैं तो यही मानता हूं कि या तो आप अन्याय को अन्याय से मारो या फिर उसें न्याय के जरिए खत्म करों.और अन्याय में 'बदला'नही होता.

 
At 30 November 2012 at 06:01 , Anonymous Anonymous said...

बात न्याय अन्याय की नहीं बात सन्देश की जिसके जरिये हम अपने देश के दुस्मानो को एक सबक दे सकते हैं

 
At 30 November 2012 at 08:28 , Anonymous Ankit Mutreja said...

भाई, बात न्याय की क्यों ना हो ? क्या भारत तालिबान के इशारों से चलता हैं ? या अरब देशों की तर्ज पर सड़क पर ही फांसी आदि जैसी सज़ा मुकर्रर करता हैं.दुश्मनो के लिए इतना संकेत काफ़ी हैं की फांसी से पहले दो मर्तबा कसाब ने कहा की 'मुझे माफ़ कर दो' और उसनें फांसी से एन पांच मिनट पहले कहा अल्लाह मुझे माफ़ करें.सोचिये,यदि कसाब जाते हुये गर्व से कहता की मैंने जो किया मुझे उस पर गर्व हैं.वकील ना लेता या सुविधाएं ना लेता तब कितना ग़लत संदेश जाता बाहर.इस तरह के आतंकियों को और बल मिलता.कसाब हिरो बन जाता.. यह बात एक राज़ हैं की उसने ऐसा सब क्यों कहा.पर मुझे लगता हैं की चार साल के लंबे वक़्त के दौरान वो समझा होगा की मानवता किसे कहते हैं.और ऐसे जन्नत हासिल नही होती जैसे उसे बताई गयी थी.

 

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