'इजहार-ए-इश्क़'
जब हमे मालूम चला
चली गयी वो इतना दूर
फिर किस बात का सिकवा-गिला
साथ मे उसके चली गयी
मेरी सारी खुशियाँ
रुसवा करके चला गया
वो रंग-रसिया
बेवफ़ा ना थी
वो मेरी 'स्वपन-ए-मल्लिका'
किस्मत का खेल है सारा
ईसपे बस चला है 'किसका'
बदकिस्मती की नुमाइश मेरी
लगती है मेरे 'मौला' की ख्वाइश
जब चला मैं अपना 'दुखड़ा-रोने'
बन गयी वो मेरी 'वाइफ'
Labels: blog, बेबाक जज्बात !


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