पैसे कमाने की होड़ में गिरता हिंदी सिनेमा
सिनेमा समाज को संदेश देने का एक बेहतर तरीका है लेकिन तब क्या हो जब सिनेमा केवल कमाई का जरिया बन कर रह जाए। आज के सिनेमा में अडल्ट फिल्मों की बरसात सी हो गई है। पैसे कमाने की होड़ ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया है कि यह सिनेमा समाज और खास तौर पर बच्चों पर क्या असर डाल रहा है।
कभी कॉमेडी तो कभी सस्पेंस फिल्म्स के नाम पर सेक्स सीन्स दिखाए जा रहे हैं। हालांकि इन पर नाम के लिए रोक लगाई जाती है लेकिन वह कितनी कारगर होती है सब जानते हैं। यह फिल्में छोटे बच्चों तक किसी न किसी तरीके से पहुंच जाती है और उनके ऊपर बुरा असर डालती हैं।
असल में फिल्म में इन सीन्स का होना गलत नहीं मगर ऐसे सीन्स की भरमार पैसे कमाने का जरिया बनाना सही नहीं है। हमे समझना होगा कि ऐसी फिल्में जिनमे सेक्स परोस कर दर्शकों को बटोरा जाता है वह हमारे हिंदी सिनेमा पर काले धब्बे की तरह हैं। ऐसी फिल्मों में मैसेज और स्टोरी के अलावा सब कुछ होता है। जिन्हे 3 घंटे देखना और खाली दीवार को देखना एक बराबर है।
कभी कॉमेडी तो कभी सस्पेंस फिल्म्स के नाम पर सेक्स सीन्स दिखाए जा रहे हैं। हालांकि इन पर नाम के लिए रोक लगाई जाती है लेकिन वह कितनी कारगर होती है सब जानते हैं। यह फिल्में छोटे बच्चों तक किसी न किसी तरीके से पहुंच जाती है और उनके ऊपर बुरा असर डालती हैं।
असल में फिल्म में इन सीन्स का होना गलत नहीं मगर ऐसे सीन्स की भरमार पैसे कमाने का जरिया बनाना सही नहीं है। हमे समझना होगा कि ऐसी फिल्में जिनमे सेक्स परोस कर दर्शकों को बटोरा जाता है वह हमारे हिंदी सिनेमा पर काले धब्बे की तरह हैं। ऐसी फिल्मों में मैसेज और स्टोरी के अलावा सब कुछ होता है। जिन्हे 3 घंटे देखना और खाली दीवार को देखना एक बराबर है।
Labels: Entertainment


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