Wednesday, 8 January 2014

पुण्यतिथि / बिमल राय वो न आएंगे पलट कर, उन्हें लाख हम बुलाएं !

                                                                           

हिंदी सिनेमा के महानतम फिल्मकारों में एक बिमल राय कला और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की सबसे मज़बूत कड़ी माने जाते हैं। उन्हें यथार्थवादी फिल्मकार कहा जाता है, लेकिन उनकी फिल्मों का यथार्थ रूखा और लाउड नहीं था। उनमें रूमानियत का ऐसा नाज़ुक और गीला अहसास होता था कि बात सीधे दिल में उतर जाती थी। उनकी फिल्मों का सामाजिक सरोकार व्यक्ति से कटा हुआ नहीं, व्यक्तिगत सुख-दुख का ही विस्तार हुआ करता था। बिमल दा ने 1935 में कलकत्ता के न्यू थियेटर्स में सहायक कैमरामैन के रूप में अपना फिल्मी सफ़र शुरू किया था। यहीं उन्हें पी.सी. बरुवा के 'देवदास' में सहायक निर्देशन का मौका मिला जिसके नायक कुंदनलाल सहगल थे। न्यू थियेटर्स के लिए कुछ हिंदी और बंगला फिल्मों का निर्देशन करने के बाद 1950 में वे अपनी पूरी टीम - सम्पादक हृषिकेश मुखर्जी, सहायक निर्देशक असित सेन, पटकथा लेखक नवेंदु घोष और कैमरामैन कमल बोस के साथ बम्बई आ गए। बम्बई में बोम्बे टाकीज के लिए उन्होंने 'मां' बनाई, लेकिन उन्हें मान्यता और अपार प्रशंसा मिली फिल्म 'दो बीघा जमीन' से। किसानों की तकलीफ़ और संघर्ष पर आधारित इस कालजयी फिल्म ने एक बेहद संवेदनशील निर्देशक के रूप में उन्हें स्थापित कर दिया। 'दो बीघा जमीन' को केन्स फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत भी किया गया। बिमल दा की अन्य महत्त्वपूर्ण फिल्में थीं - परिणीता, देवदास, हमराही, नौकरी, पहला आदमी, बिराज बहू, बाप बेटी, यहूदी, मधुमती, सुजाता, बंदिनी, परख, प्रेमपत्र और बेनजीर। उन्होंने 'काबुलीवाला' जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया था। श्रेष्ठ निर्देशन और श्रेष्ठ फिल्मों के लिए उन्हें 6 राष्ट्रीय और 11 फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए थे। बिमल दा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि, उनकी फिल्म 'सुजाता' के प्रेम के रेशमी अहसास से भरे एक गीत के साथ !

जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीए 
ढूंढ लाया हूं वही गीत मैं तेरे लिए 

जब तलक़ ना ये तेरे रस के भरे होंठों से मिले 
यूं ही आवारा फिरेगा ये तेरी जुल्फों के तले 
गुनगुनाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए 

दर्द बन के जो मेरे दिल में रहा, चल न सका..
आँसू बन कर तेरी आँखों में रहा, ढल न सका..
आज लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए

दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे न कभी 
गीत नाज़ुक हैं मेरा शीशे से भी टूटे न कभी 
गाए जाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए

- मज़रूह सुल्तानपुरी


 लेखक - ध्रुव गुप्ता 

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