Wednesday, 15 January 2014

सोंचा था सपनो का आशियाँ बनायेंगे



सोंचा था सपनो का आशियाँ बनायेंगे

जहाँ दोस्तों के संग मिलकर अरमानों के दिये जलायेंगे

पर लगता है वो घड़ी आयी है अभी 

जब ना चाहते हुए भी हमे अलग होना पड़ रहा है 

बिन दिखाए ही आँसू के घूट पीना पड़ रहा है 

दुःख की रात के बाद सबके जीवन मे नया सवेरा आएगा 

हर किसी को नया दोस्त मिल जाएगा 

पर हम यूँ ही देखते रह जायेंगे उस राह की विरानियाँ

जहाँ हमने सबके संग सुनी थी कहानियाँ

चाहा की कुछ वक्त बाद सबकी एक झलक तो मिले 

लेकिन झलक क्या राहों मे किसी के कदमों के निशाँ तक न मिले 

इस तरह हम न कर पाए दिल का हाल बयाँ

आज के बाद न जाने हम कहाँ तुम कहाँ 


लेखिका - जागृति पाण्डेय 

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1 Comments:

At 16 January 2014 at 11:15 , Anonymous Anonymous said...

waah

 

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