Wednesday, 15 January 2014

जन्मदिन / स्व. ओ. पी. नैय्यर इशारों इशारों में दिल लेनेवाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहां से !

                                                                                   
हिंदी सिनेमा के पांचवे और छठे दशक के संगीत में में मेलोडी और मस्ती के पर्याय ओंकार प्रसाद नैय्यर उन दुर्लभ संगीत निदेशकों में थे, जिनके गीत हज़ारों की भीड़ में भी अलग से पहचाने जा सकते हैं। सितार, हारमोनियम तबला जैसे बहुत कम भारतीय वाद्य-यंत्रों के सहारे उन्होंने अपने गीतों में जिस रिद्म और लय की संरचना की, उनसे गुज़रना आज भी एक अतीन्द्रिय अनुभव है। 1952 में 'आसमान' फिल्म से अपनी संगीत-यात्रा शुरू करने वाले नैय्यर साहब ने लगभग सौ फिल्मों को अपने संगीत से संवारा, जिनमें कुछ बेहद चर्चित फिल्में थीं - आर-पार, सी.आई.डी, नया दौर, हम सब चोर है, फागुन, तुम सा नहीं देखा, हाबड़ा ब्रिज, मेरे सनम, सोने की चिड़िया, कल्पना, एक मुसाफ़िर एक हसीना, फिर वही दिल लाया हूं, क़िस्मत, कश्मीर की कली, सावन की घटा, बहारें फिर भी आएंगी, ये रात फिर न आएगी, हमसाया, संबंध, एक बार मुस्कुरा दो, प्राण जाए पर वचन न जाए, सलाम बॉम्बे और निश्चय। हिंदी सिनेमा के विलक्षण और सबसे जुदा संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि, फिल्म 'सोने की चिड़िया' के उनके एक अमर गीत की पंक्तियों के साथ !
रात भर का है मेहमां अंधेरा
किसके रोके रूका है सवेरा


रात जितनी भी संगीन होगी
सुबह उतनी ही रंगीन होगी
गम न कर ग़र है बादल घनेरा



आ कोई मिल के तदबीर सोंचे
सुख के सपनों की ताबीर सोंचे
जो तेरा गम वही गम है मेरा

- साहिर लुधियानवी

लेखक - ध्रुव गुप्ता 


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