Tuesday, 17 December 2013

जयन्ती / भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर) कहेले भिखारी नाई, सुन भोजपुरिया भाई !

                                                               


भोजपुरी माटी और भोजपुरी अस्मिता के प्रतीक भिखारी ठाकुर भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाते हैं। अपनी जमीन और अपनी जमीन की सांस्कृतिक और सामाजिक परम्पराओं तथा राग-विराग की जितनी समझ भिखारी ठाकुर को थी, उतनी किसी अन्य किसी भोजपुरी कवि में दुर्लभ है। बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर गांव में एक गरीब नाई परिवार में जन्मे भिखारी ठाकुर को नाम मात्र की स्कूली शिक्षा प्राप्त हुई। किशोरावस्था में ही रोजगार की तलाश में वे खडगपुर और फिर जगन्नाथपुरी गए जहां साथियों के बीच गायकी का ऐसा चस्का लगा कि सब छोड़ छाड़कर घर लौटे आए। गाँव में दोस्तों के साथ उन्होंने रामलीला मंडली बनाई। रामलीला में सफलता मिली तो खुद नाटक और गीत लिखने और उन्हें मंचित करने लगे। नाटकों में सीधी-सादी लोकभाषा में गांव-गंवई की सामाजिक और पारिवारिक समस्याएं होती थीं जिनसे लोग सरलता से जुड़ जाते थे। लोक संगीत इन नाटकों की जान होती थी। फूहड़ता और अश्लीलता का कहीं नामोनिशान नहीं। 'विदेसिया' आज भी उनका सबसे लोकप्रिय नाटक है जिसमें एक ऐसी पत्नी की विरह-व्यथा है जिसका मजदूर पति रोजी कमाने शहर गया और किसी दूसरी स्त्री का हो गया। जिन अन्य नाटकों की उन्होंने रचना की, वे हैं - गबरघिचोर, भाई विरोध, बेटीबेचवा, कलयुग प्रेम, विधवा विलाप, गंगा अस्नान, ननद-भौजाई संवाद, पुत्र-वध, राधेश्याम बहार और द्रौपदी पुकार। उनकी नाटक मंडली का यश पहले बिहार और फिर देश के बाहर उन-उन जगहों पर पहुंचा जहां बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग बसते थे। उनकी मंडली ने उत्तर भारत के शहरों के अलावा मारीशस, फीजी, केन्या, नेपाल, ब्रिटिश गुयाना, सूरीनाम, यूगांडा, सिंगापुर, म्यांमार, साउथ अफ्रीका, त्रिनिदाद आदि देशों की यात्राएं की और वहां बसे भारतीय मूल के लोगों को उनकी जड़ों से परिचित कराया। भोजपुरिया मिट्टी के लाल भिखारी ठाकुर की जयन्ती पर उन्हें हार्दिक श्रधांजलि, विदेसिया की कुछ पंक्तियों के साथ !


करिके गवनवा भवनवा में छोडि कर 
अपने परईलन पुरूबवा बलमुआ।
अंखिया से दिन भर गिरे लोर ढर ढर 
बटिया जोहत दिन बितेला बलमुआ।
गुलमा के नतिया आवेला जब रतिया 
तिल भर कल नाही परेला बलमुआ।
का कईनी चूकवा कि छोडल मुलुकवा 
कहल ना दिलवा के हलिया बलमुआ।
सांवली सुरतिया सालत बाटे छतिया में 
एको नाही पतिया भेजवल बलमुआ।
घर में अकेले बानी ईश्वरजी राख पानी 
चढ़ल जवानी माटी मिलेला बलमुआ।
ताक तानी चारू ओर पिया आके कर सोर 
लवटो अभागिन के भगिया बलमुआ।
कहत 'भिखारी' नाई आस नइखे एको पाई 
हमरा से होखे के दीदार हो बलमुआ।

लेखक - ध्रुव गुप्ता 

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