खेल खेल ही रहा तुम भगवन हो गए
तुम से ही होगा शुरू तुम पे ख़त्म पायेंगे
स्टीवा हो या ओलंगा या हो अख्तर
अब सब के सब चैन से सो पायेंगे
खेल तुमने जो भी खेला मुझको सब अच्छा लगा
खेल तुमने जो भी खेला मुझको सब अच्छा लगा
फैन है जितने तुम्हारे शायद किसी के बन न पायंगे
मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए
मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए
कवी - मनीष शुक्ल 'मनी'
स्केच - गायत्री रेड्डी
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