Sunday, 24 November 2013

भीड़ की मुस्कान


सीधी उल्टी बातें तेरी
उल्टी सीधी बातें तेरी|

तुतला  कर तू कुछ  बोली
सबने अपनी मुस्कान खोली

फिर शुरू हुई शैतानी तेरी
कभी किसी के फ़ोन को छेड़ा
कभी खोला सवालों  का ठेला

एक एक सवाल सबसे करते जाती
जवाब पाकर खुद ही खुश हो जाते

व्यस्त  ज़िंदगी ने आज फिर बचपन देखा
खामोश भीड़ ने बेपरवाह बचपन देखा

वो मुस्कान बिखरते हुई मेरे पास भी आए|
आप  टा तल लहे  हो?????
के सवाल  ने मेरी  मुस्कान और बड़ाई
कहा मैंने
में......
तुम्हे लिख रहा हूँ

जवाब पाकर कॉपी मेरी  उठायी
उलट पलट दिए सब पन्ने मेरे
पर खुद को वो ढूंढ न पाये

इतने में दूर से एक डॉट आये वो
भागी और छुप गये माँ के अंचल में

अब व्यस्त भीड़ फिर से खामोश थी

मेरी आँखें किसी के चेहरे पे
"वो मुस्कान" ढूंढ ना पाये  

©संदीप रावत 

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