Sunday, 22 September 2013

कीमत




बंद ताले की दो चाबियाँ

और वो जंग लगा ताला

आज भी बरसों की भाँति

उसी गेट पर लटका है

चाबियाँ टूट रहीं है

तो कभी मुड़ जा रहीं हैं

उसे खोलने के दौरान ।

अब वो उन ठेक लगे हाथों की

मेहनत भी नहीं समझता

जिन्होंने उसे एक रूप दिया

उन ठेक लगे हाथों की

मेहनत की कीमत से दूर वो

आज महत्वाकांक्षी बन गया है

अपने अहं से दूसरों को दबाकर

स्वाभिमान की कीमत गवां रहा है



लेखिका- दीप्ति शर्मा 

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