Tuesday, 27 August 2013

दया नहीं इन्हें इनका हक चाहिये


हिजड़े, किन्नर, तीसरा लिंग आदि नाम तो कई मिले मगर बराबरी का मौका और अवसर अभी तक नहीं मिला | इन्हें आज भी समाज में हीन द्रिस्ती से देखा जाता है, हम आज भी इन्हें अपनाने को तैयार नहीं हैं या फिर इनकी शारीरिक कमी को हमने इनसे इनके अवसरों को छिनने का बहाना बना लिया है, इनकी पीड़ा और संवेदना कौन समझेगा क्यूंकि सरकारी कागजातों में इनकी गिनती तो होती है मगर इन्हें सिर्फ एक गिनती समझ कर ही भुला दिया जाता है |

हम इनकी बात करने से कतराते हैं आज भी हम इनको देखकर मुह फेर लेते है हम इनको अपनी खुशी में अपनी खुशी से नहीं बुलाते मगर इनकी खुशी के लिये ऊँचे से ऊँचा दाम देकर अपनी जान छुडाते हैं | महाभारत के समय से आज तक दुनिया बदली, ज़माना बदला, लोग बदले मगर नहीं बदली तो इनकी दशा और समाज में इनकी जगह, अगर आज के समय की बात करे तो हामारे देश को आजादी मिले ६६ साल हो चुके हैं पर इनके लिये समाज ६६ सालों में सिर्फ हेय, नफरत और अमानसाथ हमे जरुरत है अपनी सोंच को वीयता का साक्षी रहा है | यह हमें आशीर्वाद देकर हमारी सारी बलाएँ ले लेते है और दूसरी तरफ हम इनको बाला मान कर इनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश करते है |


कभी नाचना गाना इनकी खुशी होती थी मगर हमने इस अब इनकी मज़बूरी बना दिया है, आज अगर हम इन्हें भीख मांगते देखते हैं तो हमे एक बार इंसान होने पर शर्मिंदगी होनी चाहिये और सच सिर्फ इतना ही नहीं मज़बूरी के चलते आज भी कई हिज्र जिस्मफरोशी के दलदल में फसने को मजबूर हैं, भूंख से लड़ते-लड़ते अब इन्होने भी मज़बूरी में अच्छे और बुराई के रास्ते में फर्क करने छोड़ दिया है और अपराधी भी बनते जा रहे है | मगर सोंचिये क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ समाज की है या उन कुछ गैर-सरकारी संगठनों की जो इन्हें इनका हक दिलाने का काम कर रहे हैं, जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ हमे जरुरत है अपनी सोंच बदलने की जो इन्हें यह एहसास कराये की ये भी इसी समाज का  हिस्सा हैं |

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