Tuesday, 9 July 2013

गंगा की दिशाएँ यूँ भटकती हुई, वजूद को अपने ही तरसती हुई............


गंगा की दिशाएँ यूँ भटकती हुई,
वजूद को अपने ही तरसती हुई..
अपने ही नाम की तलाश मे.
स्वच्छ निर्मल सी धारा की आशा मे..
शिवा की जटाओं से निकलती हुई.
बदलकर राहें वो भटकती हुई..
मैली धारा का बदला लेना है उसे.
फिर वही निर्मल धारा को देना है उसे..
ए मानव तूने इसे बड़ा ही प्रताड़ित किया,
स्वच्छ निर्मल सी धारा को मलाहित किया..
ये कब तक सहेगी, चुप अब ना रहेगी.
मा की मूरत थी वो, पर दुख अब ना सहेगी..
शमा बदला हुआ है, शिव भी रूठा हुआ है,
तू ही कारण है मानव, जो भी जैसा हुआ है..
ऋषि मुनियों की धरती को छला है तूने.
भोग करके विलास इसे मला है तूने..
भक्ति के नाम पर वहाँ व्यापार होता था.
जन जन के साथ बड़ा अत्याचार होता था..
सुधर जा ए मानव वो चेता रहा है..
...........वरना ऐसे ही तबाही वहाँ आज नही होती..
प्रकृति के प्रकोप को तू समझ नही सकता क्योकि,
...........उपर वाले की लाठी मे आवाज़ नही होती.

कवित्री - स्वाति गुप्ता 

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