केजरीवाल का असहयोग आन्दोलन
आम आदमी पार्टी अब चुनावी रंग के क्लेवर में बिजली -पानी का फ्लेवर मिलाने में तल्लीनता से तत्पर्य है ,दिल्ली विधान सभा चुनावी संग्राम नजदीक है और आम आदमी की समस्याओं का एजेंडा हर पार्टी चुनावी मुद्दा रहा है |लम्बे समय से दिल्ली में बढ़ी बिजली दरों के खिलाफ भाजपा अपने प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल के नेतृत्व से साथ विरोध प्रदर्शन करता रहा है पर भाजपा का विरोध प्रदर्शन केवल औपचरिकता मात्र ही रहा है | पहली बार बिजली - पानी की बढ़ी दरों के खिलाफ आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने १९२० में गाँधी जी द्वारा किये व्यापक असहयोग आन्दोलन की तर्ज पर अपने आन्दोलन को असहयोग आन्दोलन नाम करार दिया है |
अरविन्द केजरीवाल ने २३ मार्च भगत सिंह की पुण्यतिथि से अपने असहयोग आन्दोलन की शुरुआत सुबह गांधी समाधि स्थल , राजघाट में पुष्प अर्पित करके पूर्वी दिल्ली स्थित सुन्दर नगरी से अपने अनशन का प्रारंभ कर दिया और अरविन्द केजरीवाल ने दिल्लीवासियों से अपील कि वे अपने बिजली -पानी के बिल न जमा करें साथ में जनता को सम्बोधित करते हुए कहते है कि - जो कुछ करना है अब हम सबको मिलकर करना होगा | गाँधी जी कहते थे कि जो अन्यायपूर्ण कानून हो ,उस कानून का पालन मत करो | बदले में सरकार सज़ा दे तो भुगतने के लिए तैयार रहो मैं कई लोगों से बात की है ,सभी का मानना है कि इन नाजायज बिलों को बंद करना चाहिए | लेकिन लोग डरते हैं ,उन्हें डर है कि कहीं उनकी बिजली न कट जाए ,केस न बन जाए ,पेनाल्टी न लग जाए ||
इसी दर का फायदा शीला दीक्षित की सरकार जी उठा रही है | बिजली -पान्नी कंपनियों के साथ मिलकर बार -बार दाम बाधा देती हैं | उन्हें पता है की लोग दर के मारे कुछ नहीं करेंगे | अभी जल्द ही शीला जी बिजली के दाम बढाने जा रही हैं | अखबारों में छपी खबरों के अनुसार शीला जी कहना है कि बिजली कंपनियो को २०००० करोड़ रु . का घाटा हो गया है ,सरकार का कहना है कि इस घाटे को पूरा करने के लिए बिजली के दाम और बढाने पड़ेंगे | दिल्ली में ३५ लाख बिजली के कनेक्शन हैं अगर २०००० करोड़ रु . को ३५ लाख से भाग दिया जाए तो इस हिसाब से हर परिवार का बिजली का बिल ५,००० रु . प्रतिमाह बढ़ने वाला है |
अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम के अनुसार शीला सरकार द्वारा दिया जा रहा बिजली कंपनियों के घाटे का हवाला फर्जी है | केजरीवाल का अनिश्चितकालीन अनशन कब तक चलेगा और क्या वाकई में गांधी के असहयोग आन्दोलन की तरह व्यापक होगा या दिल्ली सरकार बिजली -पानी के बढे दामों को वापस लेकर चुनावी समय में वोट की रोटियां सेकने की जहमत उठाएगी , ये काफी हद तक केजरीवाल के असहयोग आन्दोलन की व्यापकता ही तय करेगा की सरकार किस कदम तक विवश हो सकती | क्योंकि अब चुनाव नजदीक है सभी पार्टियाँ मुस्तैदी से लामबंद है ,जनता के फैसले का समय निकट है | ये लोकतंत्र है इसमें हर पांच साल बाद निर्णय जनता को लेना यही लोकतांत्रिक मिजाज भी है |
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