Wednesday, 6 February 2013

अब लेखनी मेरी है


मैं वेद व्यास नहीं हूँ
ना ही तुलसीदास
और कालिदास की तो
बात ही छोड़ दीजिये
मैं
एक स्त्री हूँ
उस नायिका सम नहीं
जिसका वर्णन
श्रृंगार रस का पर्यायवाची है
बल्कि मैं
एक जीती जागती 
साधारण स्त्री हूँ
जिसने जो भी
जहाँ भी पढ़ा है
उससे यही सीखा है
कि वो स्त्री है
इसलिए मैंने ठान लिया है
कि "दासों" का समय बीत गया
लेखनी अब मैं उठा चुकी हूँ
जिसकी स्याही भी मुझसी ही
साधारण है
इसलिए अब मैं लाऊंगी सबको 
एक धरातल पर
जहाँ शिव को करनी होगी तपस्या
पार्वती को पाने के लिए
और राम को देनी होगी अग्निपरीक्षा
ब्रह्मा नहीं
सरस्वती करेंगी रचना
एक ऐसी सृष्टि की
जहाँ कोई पुत्रेष्टि यज्ञ
नहीं होगा 
जहाँ शकुंतला भूलेगी दुष्यंत का अस्तित्व
और दमयंती करेगी रक्षा
नल की
अब लेखनी मेरी है
तो भविष्य के साथ साथ
इतिहास भी अब
मेरा होगा ।


साभार - प्रेरणा सिंह (रचना फेसबुक वाल से ) Editor at The Stephanian Magazine, St.Stephen's College.
 St. Stephen's College, Delhi से अर्थशास्त्र में अध्ययन कर रहीं है |

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