Monday, 14 January 2013

कुछ तो अब यत्न करो




हमारा वक्त एक झुलसते हुए, लहूलुहान दौर से गुजर रहा है। 

विचित्र है परिस्थितिया 

मनुष्य होते हुए भी निरीह चौपाये है 

हम में से 

पीठ पर एक गहरा घाव है कुलबुलाता है घाव 

घबराते है हम 

कुछ काले कौवे 

पीठ पर बैठ बैठ 

चोंच चोंच मार रहे है। 

चीखने की इच्छा!! 

चिल्लाने की टीस 

रह रह कर उठती है। 

चीख नहीं सकते है। 

चीखोगे,चिल्लाओगे ???????? 

गाड़ दिए जाओगे गर्दन तक 

जमीन में। 

पत्थर पर पत्थर मरेंगे 

तेरे जो अपने है।
 
जीभ हिली काट दी जाती है। 

कुछ तो अब यत्न करो। 

यत्न करो लड़ने का। 

दूर करो, डर 

घुट घुट के मरने का कुछ तो 

अब यत्न करो।

By
Avinash pandey

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3 Comments:

At 14 January 2013 at 02:02 , Anonymous Ankit Mutreja said...

बेहतरीन रचना

 
At 22 January 2013 at 10:44 , Anonymous Avinash pandey said...

धन्यवाद अंकित भाईं।मनोबल बढाने का आभार।

 
At 22 January 2013 at 10:45 , Anonymous Avinash pandey said...

अंकित भाई तहे दिल से शुक्रियां।

 

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