Saturday, 5 January 2013

महात्मा गाँधी बनने के लिए नहीं कह रही हूँ या मार्टिन लूथर किंग



सुनीता कृष्णन समाजसेवी हैं .सुनीता का १५ वर्ष की आयु में ८ लोगों ने मिलकर सामूहिक बलात्कार  किया ,तब से सुनीता  बच्चों और महिलायों पर हो  रहे यौन दासत्व के खिलाफ आवाज उठाने  की पहल की और अब तक ३२०० से अधिक लड़कियों को बचाया है जिनका मानसिक और शारीरिक रूप से शोषण हो रहा था | http://www.ted.com की कांफ्रेस में सुनीता की अपनी आपबीती कहानी और झकझोर देने वाले अनकहे अमानवीय कृत्य के हिस्से जो रोगंटे खड़े कर देने वाले है ..जरुर सुनने  के लिए इस लिंक पर  क्लिक...

http://www.ted.com/talks/sunitha_krishnan_tedindia.html

वीडिओ की ट्रांसक्रिप्ट

मैं आपको बता रही हूँ मानव अधिकारों के उलंघन के सबसे गंदे रूप के बारे में, तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध, एक १० अरब डॉलर का उद्योग. मैं आपको बता रही हूँ आधुनिक दासत्व के बारे में.

मैं आपको कहानी सुनाना चाहूंगी इन तीन बच्चों की, प्रणिता, शाहीन और अंजलि. प्रणिता की मां एक वेश्या थी, एक वेश्यावृत व्यक्ति. वह HIV से संक्रमित हो गयी, और जीवन के अंतिम समय में, जब वह एड्स की अंतिम अवस्था में थी, वह वेश्यावृति नहीं कर सकती थी, अतः उसने चार साल की प्रणिता को एक दलाल को बेच दिया. जब तक हमने यह सूचना पाई, हम वहां पहुंचे, तब तक प्रणिता का बलात्कार तीन लोगों के द्वारा हो चुका था.

शाहीन की पिछली जिंदगी के बारे में मैं जानती तक नहीं हूँ. हमने उसे रेल की पटरियों पर पाया था, कितने ही लोगों के द्वारा बलात्कृत, मैं नहीं जानती कितने. परन्तु उसके शरीर पर इसके संकेत यह थे कि उसकी अंतड़ियाँ उसके शरीर के बाहर थीं. और जब हम उसे अस्पताल ले गए उसे बत्तीस टांकों कि जरूरत पड़ी थी उसकी अंतड़ियों को उसके शरीर के अन्दर डालने में. हम अभी तक नहीं जानते हैं कि उसके माता-पिता कौन हैं, वह कौन है, हम सिर्फ यह जानते हैं कि सैंकड़ों लोगों ने उसका निर्दयता से उपभोग किया था.

अंजलि के पिता, एक शराबी, अपने बच्चे को अश्लील चित्रों के लिए बेच दिया. आप यहाँ तसवीरें देख रहे हैं तीन साल, चार साल, और पांच साल के बच्चों की जो व्यावसायिक यौन शोषण के लिए बेचे गए हैं. इस देश में, और पूरे विश्व में, सैंकड़ों और हजारों बच्चे, तीन साल की उम्र के, चार साल की उम्र के, यौन दासत्व के लिए बेचे जाते हैं. परन्तु यह मनुष्यों के व्यापार का एक मात्र कारण नहीं है. वे गोद लेने के नाम पर बेचे जाते हैं. वे अंग व्यापार नाम पर बेचे जाते हैं. वे बेचे जाते हैं श्रमिक नाम पर, ऊंट सवार, कुछ भी, सब कुछ.

मैं व्यावसायिक यौन शोषण के मुद्दे पर काम करती हूँ. और मैं आपको वहां की कहानियाँ सुना रही हूँ. इन बच्चों के लिए काम करने की मेरी अपनी यात्रा एक किशोर बालिका के रूप में शुरू हुई. मैं १५ बर्ष की थी जब ८ लोगों ने मेरा सामूहिक बलात्कार किया था. मेरा बलात्कार मुझे उतनी अच्छी तरह याद नहीं है जितना की उसके बाद का गुस्सा. हाँ, वे ८ लोग थे जिन्होंने मुझे अपवित्र किया, मेरा बलात्कार किया, परन्तु उसने मेरी चेतना को कुंठित नहीं किया. मैंने स्वयं को कभी शिकार नहीं समझा, ना तब और ना अब. परन्तु, तो तब से अब तक साथ रहा -- मैं अब ४० की हूँ -- यह महत अपमानजनक क्रोध.

दो बर्षों तक, मैं बहिष्कृत थी, मैं निन्दित थी, मैं अकेली थी, क्योंकि मैं एक शिकार थी. और यह है जो हम करते हैं उन सारे लोगों के साथ जो व्यापारीकरण से बचाए गए हैं. हम, एक समाज के रूप में, हमारे पास PhD है शिकारों का शिकार करने में. १५ बर्ष की आयु से, जब मैंने अपने आस पास देखना शुरू किया, मैंने सैंकड़ो हजारों महिलाओं और बच्चों को देखना शुरू किया जो यौन-दासत्व जैसे व्यवसायों में फंसे हुए हैं, परन्तु वे निसहाय हैं, क्योंकि हम उन्हें (अपने समाज में) आने की स्वीकृति नहीं देते हैं.

उनकी यात्रा कहाँ से शुरू होती है? उनमे से बहुतेरे उन परिवारों से आते हैं जिनके पास कई सारे विकल्प हैं, गरीब (परिवारों) से नहीं. आप कभी-कभी माध्यम वर्ग के लोगों का भी बाजारीकरण देखेंगे. मेरे पास यह IAS अफसर की बेटी थी, जो १४ बर्ष की है, कक्षा ९ में पढ़ती है, जिसका बलात्कार हुआ था एक व्यक्ति से बातचीत (इन्टरनेट चैट) के कारण, और वह अपने घर से भाग गयी क्योंकि वह एक अभिनेत्री बनना चाहती थी, उसका बाजारीकरण हो गया. मेरे पास सैंकड़ो और हजारों ऐसी कहानियां हैं बहूत ही संपन्न परिवारों की, और बच्चों की जो संपन्न परिवारों से हैं, जिनका व्यवसाय हो रहा है.

ये लोग ठगे हुए हैं, विवश हैं. उनमे से ९९.९ प्रतिशत लोग वेश्यावृति को अपनाने में विरोध जताते हैं. कुछ इसका मूल्य चुकाते हैं. वो मार दिए जाते हैं; हम उनके बारे में पता भी नहीं चलता. वे मूक हैं, अनाम लोग हैं. परन्तु बाकी, जो इसमें फँस जाते हैं, हर दिन यातनाओं से गुजरते हैं. क्योंकि जो लोग उनके पास आतें हैं वे उनमे से नहीं हैं जो आपको अपनी प्रियतमा बनाना चाहते हैं, या जो आपके साथ परिवार बसाना चाहते हैं. ये वो लोग हैं जो आपको खरीदते हैं एक घंटे के लिए, एक दिन के लिए, आपका इस्तेमाल करते हैं, आपको छोड़ देते हैं.

हर लड़की जिसे मैंने बचाया है -- मैंने ३२०० से अधिक लड़कियों को बचाया है -- उनमे से हर एक मुझे एक आम कहानी बताती है ... (तालियाँ) एक कहानी एक आदमी के बारे में, कम से कम, उसकी योनि में मिर्च का चूर्ण डालता है, एक आदमी जो उसे सिगरेट से जलाता है, एक आदमी जो उसे पीटता है. हम उन लोगों के बीच में रहते हैं, वे हमारे भाई, पिता, चाचा, भतीजे, हमारे चारों ओर हैं. और हम उनके बारे में चुप हैं.

हम सोचते हैं कि यह पैसा बनाने का आसान मार्ग है. हम सोचते हैं कि यह छोटा मार्ग है. हम सोचते हैं कि वो वही करना चाहती है जो वह कर रही है. परन्तु जो अतिरिक्त लाभ वो पाती है वे हैं बहुतेरे संक्रमण, यौन संचारित संक्रमण, HIV , एड्स, उपदंश, सुजाक, आप नाम लीजिये, मादक द्रव्यों का सेवन, नशीले पदार्थ, सब कुछ. और एक दिन वो आपको और मुझे छोड़ देती है, क्योंकि हमारे पास उनके लिए कोई विकल्प नहीं है. और इस लिए वो इस उत्पीडन कि आदि हो जाती है. वो मानती है "हाँ, अब यही है, यही मेरा भाग्य है." और यह सामान्य है, एक दिन में १०० लोगो के द्वारा बलात्कृत होना. और किसी की शरण में जाना असामान्य है. पुनर्वासित होना असामान्य है.

मैं इसी विषय में काम करती हूँ. इसी विषय में मैं बच्चों को बचाती हूँ. मैंने तीन साल के बच्चों को बचाया है, और मैंने ४० साल की औरतों को बचाया है. जब मैंने उन्हें बचाया, एक सबसे बड़ी चुनौती जो मेरे सामने थी कि मैं कहाँ से शुरू करूँ. क्योंकि मेरे पास बहूत सारे थे जो पहले से ही HIV से संक्रमित थे. एक तिहाई लोग जिन्हें मैं बचाती हूँ HIV संक्रमित हैं. और इसीलिए मेरी चुनौती थी यह समझना कि कैसे मैं बहार निकालूँ इस दर्द से शक्ति को. और मेरे लिए, मैं अपनी महानतम अनुभव थी. स्वयं को समझना, स्वयं कि पीड़ा को समझना, मेरा अपना अकेलापन, मेरा सबसे बड़ा शिक्षक था. क्योंकि जो हमने इन लड़कियों के साथ किया वह है इनकी क्षमता को समझना.

आप यहाँ एक लड़की को देख रहे हैं जो एक झाल लगाने वाली के रूप में प्रशिक्षित की गयी है. वो एक बहूत बड़े संगठन के लिए काम करती है, हैदराबाद की एक कार्यशाला में, जो फर्नीचर बनाती है. वो लगभग १२,००० रूपए कमाती है. वो एक अनपढ़ लड़की है, प्रशिक्षित, युक्त एक झाल लगाने वाली के रूप में. झाल लगाना की क्यों, कंप्यूटर क्यों नहीं? हमने अनुभव किया, एक चीज़ जो इन लड़कियों के पास थी वह है अमित साहस. उनके शरीर पर कोई पर्दा नहीं था, उनमे कोई शर्म नहीं थी, उन्होंने इसकी सीमाएं लाँघ ली हैं. और इसलिए वे एक पुरुष-प्रभुत्व संसार में काम कर सकती थीं, बहूत ही आसानी से, और वे इसमें किसी शर्म का अनुभव नहीं करतीं.

हमने लड़कियों को प्रशिक्षित किया है बढई के रूप में, राजमिस्त्री के रूप में, सुरक्षा पहरेदार के रूप में, टैक्सी चालक के रूप में. और उनमे से हर एक अग्रगण्य है अपने चुने हुए क्षेत्र में, आत्मविश्वास पा रही है, इज्ज़त पा रही है, और अपने जीवन में आशाएं जगा रही है. ये लड़कियां बड़े निर्माण संगठनो में काम कर रही हैं जैसे राम-की कंस्ट्रक्शन, राजमिस्त्री के रूप में.

मेरी चुनौती क्या रही है? मेरी चुनौती वो देह-व्यापारी नहीं रहे हैं जो मुझे पीटते हैं. मैं अपनी जिंदगी में १४ बार से ज्यादा पिट चुकीं हूँ. मैं अपने दायें कान से सुन नहीं सकती हूँ. मैंने अपना एक कार्यकर्ता खो दिया जिसे मार दिया गया जब वो एक बचाव कार्य पर था. मेरी सबसे बड़ी चुनौती है समाज. यह है आप और मैं. मेरी सबसे बड़ी चुनौती है इन भुक्तभोगियों को स्वीकार करने में आपकी बाधाएं हमारे अपनों की तरह.

मेरी एक बहूत ही मददगार मित्र, मेरा भला चाहने वाली, मुझे हर महीने, २,००० रूपए दिया करती थी सब्जियों के लिए. जब उसकी माँ बीमार पड़ी तो उसने कहा, "सुनीता, तुम्हारे बहूत अच्छे संपर्क हैं. क्या तुम किसी को मेरे घर में काम करने के लिए ला सकती हो, ताकि वो मेरी माँ की देखभाल कर सके?" और कुछ देर तक शांति थी. और तब वो कहती है, "हमारी लड़कियों में से किसी एक को नहीं."

मानव व्यवसायों के बारे में बातें करना काफी शौकिया है, इस अच्छे से वातानुकूलित कक्ष में. यह बहूत अच्छा है वाद-विवाद के लिए, प्रवचन के लिए, चलचित्रों के लिए और सभी बातों के लिए. पर उन्हें अपने घरों में लाने के लिए अच्छा नहीं है. उन्हें अपने कारखानों और संगठनों में रोजगार देना उचित नहीं है. उनके बच्चों का हमारे बच्चों के साथ पढना उचित नहीं है. वहां सब ख़त्म हो जाता है. वही मेरी सबसे बड़ी चुनौती है.

अगर मैं आज यहाँ हूँ, तो मैं यहाँ सिर्फ सुनीता कृष्णन के रूप में नहीं हूँ. मैं यहाँ पर देह व्यापार के भुक्तभोगियों एवं उससे बचाए गए लोगों की आवाज़ बन कर आई हूँ. उन्हें आपकी करुणा की जरूरत है. उन्हें आपकी सहानुभूति की जरूरत है. इन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, आपकी स्वीकृति.

बहूत बार, जब मैं लोगों से बातें करती हूँ, मैं उन्हें एक ही बात कहती हूँ: मुझे वो सौ रास्ते मत बताईये कि आप इस समस्या से क्यों नहीं जूझ सकते हैं. क्या आप अपने दिमाग को उस एक दिशा में ले जा सकते हैं जिससे कि आप इस समस्या से जूझ सकें? और इसीलिए मैं यहाँ पर हूँ, आपका सहयोग मांगने के लिए, आपका सहयोग का दावा करने के लिए, आपके सहयोग की विनती करने के लिए. क्या आप अपनी चुप्पी की संस्कृति को तोड़ सकते हैं? क्या आप कम से कम दो लोगों को इस कहानी के बारे में बता सकते हैं? उन्हें ये कहानी सुनाईये. उन्हें यह कहानी दो और लोगों को सुनाने के लिए राजी कीजिये.

मैं आप सभी लोगों को महात्मा गाँधी बनने के लिए नहीं कह रही हूँ या मार्टिन लूथर किंग, या मेघा पाटेकर, या उनकी तरह कुछ. मैं आप से मांग रही हूँ, आपके सीमित संसार में, क्या आप अपना मन खोल सकते हैं? क्या आप अपना दिल खोल सकते हैं? क्या आप इन लोगों को भी स्वीकार कर सकते हैं? क्योंकि वो भी हममे से एक हैं. वो भी इस संसार का हिस्सा हैं. मैं आपसे कह रही हूँ, इन बच्चों के लिए, जिनका चेहरा आप देख रहे हैं, इस संसार में नहीं हैं. वे पिछले साल एड्स से मर गए. मैं आपसे उनकी मदद करने के लिए कह रही हूँ, इंसान के रूप में स्वीकार करने के लिए कह रही हूँ, लोक-कल्याण की तरह नहीं, परोपकार की तरह नहीं, परन्तु इंसानों की तरह जिनका हमारे सहयोग पर हक बनता है. मैं यह आपसे इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कोई बच्चा, कोई इंसान, उसका हक़दार नहीं है जो इन बच्चों पे गुजरी है. धन्यवाद. (तालियाँ)

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