Tuesday, 8 January 2013

बयानबाज़ी करते हैं और अपनी टीआरपी बरकरार रखते हैं |



धर्म प्रचार के नाम से पाखंडा फैलाने वाले बाबाओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढती जा रही है पर उनका अमानवीय कृत्यों पर गैरजिम्मेदाराना बयान देना ज्यादा संदेहास्पद है ,वैसे बाबा आशाराम बाबू पहले से अपनी छवि के विपरीत सुर्ख़ियों में बने रहे हैं , एक सीमित संख्या की सोच पर राज्य करने वाले इन बाबाओं का द्रष्टिकोण वृहत नही होता क्यूंकि अपने ही बनाये हुए चश्मे से दुनिया का आकलन करते हैं लोगों पर अपने विचार थोपते हैं ,ज्ञान के पूंजी से अपने को धनी बताने वाले प्राय : ज्ञान अभाव से इस तरह की बयानबाज़ी करते हैं और अपनी टीआरपी बरकरार रखते हैं |
         २१ सदी में आज हम जी रहे फिर भी  हम बाबाओं को इतना बढ़ा -चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं ,जैसे वो ही  दुनिया के मालिक है ,जहाँ तक इसका दोष  विश्वसनीय मीडिया को भी जाता है बाबाओं के द्वारा प्राप्त धन की मोटी  रकम ,उन्हें प्रचार करने के लिए उन्हें विवश करता है | तकनीक और विज्ञानं से लैस वर्तमान मानव क्यूँ ना जाने भावनाओं में बहकर विश्सता पूर्ण उसका अनुयायी बन जाता है | फिर उसी के गुण गाने लगता है और घर में ,ऑफिस में ,गाडी में और मंदिर में बाबा की फोटो चस्पा कर देता है और ना जाने कितना धन बाबा के ट्रस्ट में जमा करता रहता है ,सरकार भी बाबाओं  खिलाफ कोई पहलकारी कदम नही उठाती क्यूंकि वो इन्हें भी बड़ी वोट बैंक का हिस्सा मानती है ,फिर से पुर्नजागरण की जरूरत है लोगों को प्रबलकारी  तरीके से नीतियाँ बनाकर  बाबाओं के  पिछले पहलू को संज्ञान में लाना होगा और संर्कीण विचारधारा को विकसित करना होगा |

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