Friday, 25 January 2013

सहमी-सहमी जिंदगियां जीने को मजबूर महिलाये



दिल्ली में १६ दिसम्बर को हुए कुकृत्य के बाद बहुत से मामले आये, एक तरफ तो ये एक अच्छा संकेत कि जो मामले किसी दबाव या संकोच कि वजह से सामने नहीं आ पाते थे वो अब खुल कर लोगो के सामने आने कि हिम्मत तो कर पाते हैं, मगर दूसरी ही तरफ ये बात भी जगजाहिर करता है कि सामाज में कितने वैह्शी दरिंदे हैं जिनकी वजह से महिलाए आज असुरक्षित हैं | वही सरकार कि कोई भी कोशिश इस लायक नहीं कि वो महिलाओ को इस बात का आश्वाशन दे सके कि वो सुरक्षित है, इसके विपरीत दिल्ली में ऐसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं जिनमे लड़कियों के साथ गैंग हो रहा है |
माहौल तो ऐसा बनता जा रहा है कि ऑफिस में काम करने वाली महिलाये डर कि वजह से अँधेरा होने से पहले ही घर आ जाने का हर प्रयास कर रही हैं, ऐसे में महिलाये मजबूर हैं सिर्फ एक डरी और सहमी हुई जिन्दगी जीने को जिसमे वो खुद ही ऐसी परिस्थितियों से लड़ते हुए जीती हैं, उन्हें भले ही सरकार कि तरफ से कोई आश्वासन न मिला हो पर उन्हें इस बात का भरोसा जरुर हो चूका है कि उन्हें अपनी सुरक्षा खुद ही करनी होगी जिसमे उनकी सहायता और कोई करने वाला नहीं है और अब उनके पास सिर्फ दो ही रास्ते हैं या तो वो खुद ही इसके खिलाफ खड़ी हों या फिर वो सहमी जिंदगियां जीने को तैयार हो जाएँ |

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