वो पत्थर ही है शायद, कोई देवता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद, कोई देवता नहीं।
इतना दर्द देकर भी, वो कभी थकता नहीं।।
हमने उसका हर दिया आंसू, बड़े शौक से पिया है,
पर वो है कि ख़ुशी बनकर कभी बरसता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद कोई देवता नहीं ..............
भटके हैं हर पल, उससे चंद सवाल करने को,
छिपा फिरता है न जाने किससे, वो मुझे मिलता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद, कोई देवता नहीं .............
चीख चीखकर हर आवाज़ मेरी, अब गुमनाम हो गई,
किस मिटटी का बना है, वो कुछ सुनता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद, कोई देवता नहीं ...............
रहमत कर दे खुदाया, मैंने कितना कहा उसे,
पर वो है कि खुशियाँ मेरे दामन ने भरता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद कोई देवता नहीं ...............
हर रोज उसके दर गए इस आस से, कि वो साथ देगा,
पर सिसकते रह गए हम, और वो कुछ समझता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद, कोई देवता नहीं ....................
क्यों गिडगिडाते रहे हम, उसकी चौखट पर नादान बनकर,
जब जानते थे कि वो पत्थर है, कुछ कहता नहीं।
वो पत्थर ही है शायद कोई देवता नहीं ....................
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