Sunday, 2 December 2012

ये रंजिशें



ज़्बत है जाने क्यूँ आज दिल की ज़ुबान ,

अधूरे से छूटे कहीं वो पनप रहे अरमान ,

तकदीर की रंजिशों में भटके हैं ख़्याल , 

टूट कर बिखरे तेरे कदमों में जज़्बात ,

बेरूखी के झंझवात में उलझी हर याद ,

उदास सी बैठी आज उम्मीदों की शाम ,

दूरियाँ बढ़ा रहीं मेरे इश्क की रफ़्तार ,

रूठी हर मंज़िल की तू ही है पहचान ,

रूह की गहराई तक बसे हैं तेरे निशान ,

ज़िन्दगी ले रही यूँ हर पल अब जान ,

 हर अल्फाज़ में बसा है मेरे तेरा ही नाम............

                                                        लेखक- अंकुर सहाय

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