ये रंजिशें
ज़्बत है जाने क्यूँ आज दिल की ज़ुबान ,
अधूरे से छूटे कहीं वो पनप रहे अरमान ,
तकदीर की रंजिशों में भटके हैं ख़्याल ,
टूट कर बिखरे तेरे कदमों में जज़्बात ,
बेरूखी के झंझवात में उलझी हर याद ,
उदास सी बैठी आज उम्मीदों की शाम ,
दूरियाँ बढ़ा रहीं मेरे इश्क की रफ़्तार ,
रूठी हर मंज़िल की तू ही है पहचान ,
रूह की गहराई तक बसे हैं तेरे निशान ,
ज़िन्दगी ले रही यूँ हर पल अब जान ,
हर अल्फाज़ में बसा है मेरे तेरा ही नाम............
लेखक- अंकुर सहाय
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