मुझे यूँ मैला न करो

क्या आपने कभी भी किसी माँ को अपने बच्चों के पैर छूते देखा है। अगर नहीं देखा तो आपसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि आप अपने नजदीकी गंगा के घाट पर जरूर जाइएगा। मै आपसे वादा करती हूँ कि गंगा की एक एक बूँद आपको चीखती, चिल्लाती और अपनी स्वच्छता की भीख मांगती नजर आएगी। घाट की हर लहर ऐसी लगेगी मानो कदम छूकर गुहार लगा रही हो कि मुझे यूँ मैला न करो। गोमुख से निकलने वाली गंगा की पवित्र और निर्मल धारा कब कहाँ और कैसे विलीन सी हो जाती है और कब शुरू हो जाता है मैली कुचली गंगा का सफ़र पता ही नहीं चल पाता। प्रकृति वही की वही है आज भी गंगा की निर्मल और पावन धारा बिना किसी शर्त दे रही है। एक धार्मिक नदी कही जाने वाली इस नदी को उसी धार्मिक मान्यताओं ने कहीं का न छोड़ा। परिस्थितियां ये है कि जो गंगा भगवान् विष्णु के चरणों से निकलती है और जिसे भगवान् शंकर ने अपनी जटाओं ने धारण किया है वही गंगा नदी अब केवल रासायनिक कचरे, गटर के पानी, पशु और मानवों की लाशों का घर बनकर रह गई है। गंगा माँ खुद ही अपना अस्तित्व खोजती फिरती होगी की मै कहाँ खो गई। गंगा की इस हालत का परिणाम उद्योगीकरण और शहरीकरण को माना जा रहा है। जिस कारण को मै किसी सूरतेहाल में मानने के लिए तैयार नहीं हूँ क्योंकि UK की नदी थेम्स दुनिया की सबसे कम प्रदूषित नदियों में शुमार है जहाँ की आबादी 6,62,65,000 से जादा ही है। इतनी आबादी किसी भी धारा को मैली करने के लिए पर्याप्त है। यहाँ अच्छाई वहां की जनता की नहीं हमारे विचारों में संकीर्णता की है, हमारे अंधविश्वास की है कि आखिर हमारे घर से निकलने वाला पूजा का एक फूल भी गंगा में फेका जाता है, कागज़ पर बनी भगवान् की एक एक आकृति गंगा के घाट पर ही जाकर अपना दम तोडती है। भारत में 365 दिन त्यौहार मनाने के बाद तमाम प्रतिमाओं को हम गंगा में जाकर विसर्जित कर देते हैं। गंगा माँ ने इस मानव जनजाति को क्या नहीं दिया जिसका कर्ज हमने इसे कूड़ादान बनाकर अदा किया है।ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। सरकार की तरफ से भी हर वर्ष गहमागहमी में कई अभियान चलाये जाते हैं और करोडो की लागत के बाद भी गंगा में प्रदूषण का स्तर 1 प्रतिशत भी कम नहीं नजर आता। 1985 में चलाये गए गंगा एक्शन प्लान में 1200 करोड़ की लागत लगाने के बाद भी गंगा जस की तस मैली ही रही। मै आपके सामने केवल अपना एक विचार प्रकट करना चाहूंगी कि सरकार गंगा नदी में गिरने वाले कचरे, नाले, फक्ट्रियों से निकलने वाली विषाक्त गंदगी, सीवर नालियों के लिए तो प्रबंध करा सकती है पर गंगा की इस करुण धारा का उदधार तब तक नहीं हो सकता जब तक हम अपनी संस्कृति से जुडी इस अन्धविश्वासी कड़ियों को निकाल कर अलग नहीं करेगे। हर वर्ष केवल गंगा के ऊपर करोडो की लागत लगती रहेगी और स्वयं गंगा माँ अपमे ऊपर चलने वाले इन अभियानों पर रोती रहेगी।जय गंगा माँ
By- Swati GuptaLabels: National
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