अंत राजनीति का या हिटलर निति का ?
कहा जा रहा है कि आज राजनीति के एक युग का अन्त हो गया. ऐसे युग का अन्त जो धर्म और क्षेत्रवाद का युग बन गया था और ऐसी राजनीति जो तब फली फूली जब ठाकरे साहब ने बिहारियों, गुजरातियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीयों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ पूरी मुहिम ही चला डाली. मराठी मानुष के नाम पर लोगों को खूब खदेड़ा गया. मुंबई में रोजी रोटी कमाने के लिए पहुचे ‘बाहरी’ लोगों के खिलाफ आग उगली गई, मारा गया और उन्हे काम से महरूम किया गया. बिहारियों को ‘एक बिहारी, सौ बीमारी’ बताकर तो दक्षिण भारतीयों को `लुंगी हटाओ, पुंगी बजाओ” का नारा देखकर मुम्बई से बाहर कर दिया गया.
राजनीति के उस युग का भी अन्त हो गया जिसमें मुसलमानों को कैंसर की बीमारी कहा गया. कहा गया कि मुस्लिम कैंसर की तरह फैल रहे हैं और देश को उनसे बचाया जाना चाहिए. आज के दस साल पहले इन्ही बाल ठाकरे ने मुस्लिम हिंसा के विरोध में हिंदू आत्मघाती दस्ताा बनाने का आह्वान किया था. कुछ सालों पहले फिर से ठाकरे ने मुसलमानों पर हमला करते हुए कहा कि मुस्लिम आतंकवाद लगातार फैल रहा है और इससे छुटकारा पाने का एकमात्र रास्ता हिन्दू अतिवाद ही है. भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर ठाकरे ने बाबरी मस्जिद के दंगों की मलाई चखी और बाद तक राजनैतिक रोटियां सेकते रहे. 70 के दशक में जब बेरोजगारी चरम पर थी ठाकरे की राजनैतिक दुकान भी तेजी से चल निकली थी. इस दौरान वे कभी किसी क्रिकेटर को धमकी देखर सुर्खियों में आये तो किसी अभिनेता के लिये तालिबानी फरमान जारी करते रहे.
हिटलर को अपना आदर्श मानने वाले और भारत में तानाशाही की वकालत करने वाले ठाकरे को भारत में अफगानिस्तान की मौजूदगी का ऐहसास कराने के लिये हमेशा याद रखा जाएगा. उन्हे मेरी भावभीनी श्रद्धान्जलि कि वे अब मुम्बई को एक हिंसक और धर्मान्ध शहर बना कर चले गए हैं जिसे उनका परिवार और अनुयायी हमेशा इसी तरह जिन्दा रखेगें.
लेखक- अलोक दीक्षित
Labels: National


1 Comments:
kuch ke liye raajneeti ka ant hua hain kuch ke liye hitler giri ka.
ab sahi kaun hain aur kaun galat bas ye tay karne ke maapdand hone chahiye.
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