Friday, 2 November 2012

खुशनुमा जिन्दगी को, बदनसीबी में बदलते देखा ।


                                           
                                            मैंने जवानी को तड़पते और बचपन को मरते देखा ।

खुशनुमा जिन्दगी को, बदनसीबी में बदलते देखा ।।



पिता की वो बाजुएँ, जो थाम लेती थी हमें ।
पीठ पर वो लादकर, राह देती थी हमें ।
उस देह को लाठियों में, झुककर आज चलते देखा ।।



जिन बच्चों को कभी, लगता था डर अकेले ।
उन्हें अकेले रहने के लिए, आज लड़ते देखा ।।
और जिनका रोम रोम, पुकारता था सहारा ।
उसी सहारे को उन्हें, पल पल तरसते देखा ।।



जो अपनी उंगलियाँ थमा, सीढ़ी चढाते थे हमें ।
लिए सहारा लाठी का, आज वहीं उतरते देखा ।।
जिनके कदम पर कदम रखकर, हम कभी सम्भलते थे ।
उन्ही कदमो को आज, लड़खड़ाते फिर सम्भलते देखा ।।



दौड़कर हम सिमट जाते थे, जिन आँचल में ।
उन आंचल को इस कदर, तार तार फटते देखा ।।
जो खिलखिलाते थे सदा, हर आहटों पर हमारी ।
उन्हें सर से लेकर पाँव तक, सिसकते देखा ।।



मैंने जवानी को तड़पते और बचपन को मरते देखा ।
खुशनुमा जिन्दगी को बदनसीबी में बदलते देखा ।।

By
Swati Gupta

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