Friday, 23 November 2012

आखिर किस बात की खुसी ?

                                               
             कसाब की फांसी पर खुश जनता को देखकर मुझे उस भीड़ की याद आ गयी जो हर बार चुनावों से पहले झूट बोलने वाले नेताओं के लिए जुटती है और ये जानते हुए भी की हर बार की तरह वो डींगे हांकने वाला नेता उनकी तरफ दोबारा पलट कर भी नहीं देखेगा, फिर भी उसके लिए पूरी श्रधा से तालियाँ बजाती है और उसकी मनमोहक बातों पर पहली बरसात के मेंढक की तरह खुश भी होती है, मगर इसमें बेच्रारी जनता करे भी तो क्या उसे ताली बजने की पुरानी आदत जो है । 
          कसाब की फंसी होने के बाद बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों का बयान आया और उन्होंने कसाब की फंसी को एक एतिहासिक दिन बताते हुए इसे भारत के चाँद पे पहुँच जाने जैसी उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किया, और साथ ही 26/11 के शहीदों के परिजनों एक अदृश्य लालीपाप की तरह कसाब की फांसी की बधाइयाँ दे दी गयी, मगर क्या सिर्फ कसाब की फांसी से उन परिजानो को चैन की सांस मिल गयी होगी जो हर साल किसी आतंकी घटना का शिकार हो कर अपनी जान पर खेल कर आतंकवादियों को पकड़ते है और फिर हमारी सरकार उन आतंकियों को दामाद की तरह पालने में लग जाती है, क्या सिर्फ कसाब के फांसी से वो सारे ज़ख्म भर जायेंगे जिन्हें समय-समय पर तब खुरचा जाता है जब हमारी सरकार उस आतंकी को हर मौका देती है की किसी तरह वो आतंकी दया अर्जी देकर हमारे क़ानून का मज़ाक बनाकर कुछ और समय हमारे सुविधाओ से भरपूर किसी जेल का आनंद उठाए और और अपनी बेटी की शादी कर चुके बाप की तरह वो अपने जीवन का अंतिम समय शान्ति से गुजार कर फिर मृतु को प्राप्त करे ।
         कसाब जब तक हिन्दुस्तान की जेल में सजा काट रहा था तब तक उसकी खातिरदारी किसी मेहमान से कम न हुई और न जाने कितने करोड़ उसकी सेहत और ख्वाहिशों पर खर्च कर दिए गए, जितने धन से नाजाने कितने घर आबाद हो जाते । दुःख की बात ये नहीं की सरकार ने इस फैसले को लेने में इतना समय क्यों लिया दुःख की बात तो ये है की हमारे देश की जनता इस देरी पर रोष प्रकट करने की बजाये इस बात की ख़ुशी मन रही है और धैर्य दिखा रही है की चलो देर से ही सही पर इन्साफ तो हुआ, वो ये क्यों नहीं समझ रही की उसका अतिधैर्यपूर्ण रवैया कल उनकी ऐसी स्तिथि का ज़िम्मेदार हो सकता है जो भविष्य में बहुत घातक सिद्ध हो सकता है ।
        मै देश की जनता को दोषी नहीं ठहरा रहा हूँ न कोई महान बुद्धिजीवी बनकर कोई सलाह दे रहा हूँ मै तो बस इतना कह रहा हूँ कि ऐसी खोखली ख़ुशी पर ताली बजाने के बजाये हमे सरकार से ये जानना चाहिए की कब तक इन आतंकियों की सजा एक खेल की तरह चलती रहेगी, कब बाकी के गुनेहगार जैसे "अफज़ल गुरु" को फांसी के तख्ते पर सरकार पहुंचाएगी और कब उन वीरो के परिवारजनों को चैन की सांस मिलेगी, तो मै बस इतना कहना चाहूँगा तालियों के शोर की बजाये हमे जरुरत है सवालो के शोर की जो हमारा अधिकार है ।

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