Tuesday, 13 November 2012

नहीं भूलूंगा मैं - जब तक है जान


"तेरी आँखों की नमकीन मस्तियाँ, तेरी हंसी की बेपरवाह गुस्ताखियाँ, तेरी जुल्फों की लहराती अंगडाइयां,
नहीं भूलूंगा मैं - जब तक है जान

तेरा हाथ से हाथ छोड़ना, तेरा सायों से रुख मोड़ना, तेरा पलट एक फिर न देखना, नहीं माफ़ करूँगा मैं - जब
तक है जान 

बारिशों में बेधड़क तेरे नाचने से, बात बात पर बेवजह तेरे रूठने से, छोटी छोटी तेरी बचकानी बदमाशियों से,
मोहब्बत करूँगा मैं - जब तक है जान

तेरे झूठे कसमें वादों से, तेरे जलते सुलगते ख़्वाबों से, तेरी बे-रहम दुआओं से, नफरत करूँगा मैं - जब तक है
जान"

  

इन्ही पंक्तियों में बयाँ किया जा सकता है फिल्म "जब तक है जान" को । कई मायनों में बेहद ख़ास है जब
तक है जान । जब तक है जान यश चोपड़ा निर्देशित आखिरी फिल्म है । शाहरुख़ खान और केटरीना कैफ की
एक साथ यह पहली फिल्म है । शाहरुख़ और यश चोपड़ा की जोड़ी भी वीर-ज़ारा के आठ साल बाद किसी
फिल्म में एक साथ हैं । किसी फिल्म में पहली बार शाहरुख़ ने किया है ओंन-स्क्रीन किस, वो भी एक नहीं
3-3 बार । फिल्म में शाहरुख़ समर आनंद नाम का किरदार निभा रहे हैं । फिल्म समर की उम्र के दो पड़ाव
दर्शाती है - पहला जब वह लन्दन में रहने वाला एक पच्चीस वर्षीय युवा एवं संघर्षरत संगीतकार है जो
पार्ट टाइम वेटर है और दूसरा जब वह भारतीय सेना में तैनात एक 35 वर्षीय निडर और जांबाज़ मेजर है
। कटरीना इस फिल्म में मीरा नाम थापर का किरदार निभा रही हैं । मीरा के पिता का किरदार निभा रहे
अनुपम खेर लन्दन में बसे अमीर व्यवसायी हैं जिनकी पत्नी पूजा (नीतू कपूर) उन्हें और अपनी 12 साल की
बेटी (केटरीना) को छोड़ कर इमरान (ऋषि कपूर) नाम के एक शख्स के साथ भाग जाती है । 

समर मीरा को पहली दफा एक चर्च में देखते हैं जहाँ उन्हें पहली नज़र में ही कटरीना से प्यार हो जाता है ।
मीरा समर को पहली बार लन्दन की सड़कों पर एक पंजाबी गाना (छल्ला) गुनगुनाते हुए देखती है । दोनों की
मुलाकात होती है मीरा की सगाई के दिन । मीरा एक पंजाबी गाना सीखना चाहती है, जिसके बदले समर
मीरा के सामने लन्दन की हाई-फाई वाली इंग्लिश सिखाने की शर्त रखता है । "डन-डन-लन्दन" होता
है, मुलाकातें बढती हैं, पहले दोस्ती होती है और फिर प्यार । तभी आता है कहानी में एक ट्विस्ट जिसके
बाद दो प्यार करने वालों के बीच आ जाती हैं दूरियां । मीरा समर से कभी न मिलने की कसम खाती है और
समर कभी लन्दन वापस न आने की । समर भारत आ जाता है और भारतीय सेना में मेजर बन जाता है ।
मेजर समर आनंद बन जाता है । मेजर समर आनंद सेना के बम निरोधी दस्ते के प्रमुख हैं और वे बिना किसी
रक्षा कवच के ही बम को डि-फ्यूज  करते हैं । उनके बारे में कहा जाता है - "The Man Who Can't Die"
| मीरा से जुदाई के दस सालों बाद समर की जिंदगी में डिस्कवरी चैनल की इंटर्न अकीरा (अनुष्का शर्मा )
आती है, जिसे समर एक नदी में डूबने से बचाता है । अकीरा के हाथ समर की डायरी लगती है जिसमे उसे
समर के अतीत के बारे में पता चलता है । अकीरा समर की जिंदगी पर एक शोर्ट-फिल्म बनाती है । फिल्म
बनाते-बनाते अकीरा को समर से प्यार हो जाता है । हालात फिर समर को लन्दन वापस ले जाते हैं और आगे
क्या होता है यही कुछ है फिल्म जब तक है जान में ।

 

कहानी कुछ ख़ास नहीं है मगर फिल्म का ट्रीटमेंट बेहद ख़ास है  । फिल्म में यश चोपड़ा के निर्देशन की
महक है । कहानी और स्क्रीनप्ले लिखा है आदित्य चोपड़ा ने । हालांकि फिल्म की पटकथा थोड़ी कमज़ोर
है  लेकिन बावजूद इसके फिल्म में गज़ब की ताजगी है । प्यार - मोहब्बत, जुदाई, ऊपरवाले  से लड़ाई, एक

तरफ़ा-प्यार, त्याग और बलिदान  जैसे सभी पुराने फोर्मुलों को फिल्म नए ढंग से परोसती है ।अपने पूरे
रनिंग टाइम के दौरान फिल्म दर्शकों को बांधे रखती है ।यश चोपड़ा की यह आखरी फिल्म के तौर पर एक
मुक्कम्मल कोशिश है जब तक है जान । एक बेहतरीन प्रयास है यह फिल्म ।

 

फिल्म यश चोपड़ा और शाहरुख़ की पिछली फिल्मों की याद ताज़ा करती है । जैसे शाहरुख़ और कटरीना के
बीच फिल्माया गया "इश्क-शावा" गीत से ठीक पहले का डांस सीक्वेंस दिल तो पागल है में शाहरुख़ और
माधुरी के बीच के एक ऐसे ही द्रश्य की यादें तरोताज़ा करता है । फिल्म में यह द्रश्य बेहद प्रभावशाली
है, इतना प्रभावशाली कि यकीन मानिये यह आपको मंत्रमुग्ध-सा कर देता है । नीतू कपूर और ऋषि कपूर
का किरदार अमिताभ-हेमा मालिनी द्वारा वीर ज़रा में निभाए किरदार की याद दिलाता है । शाहरुख़ का
किरदार फिल्म कल हो न हो में निभाए उनके किरदार और तमाम फिल्मों में राहुल या राज नामक किरदारों
से मेल खाता है । शाहरुख़ और भगवान् के बीच की नाराज़गी यश चोपड़ा द्वारा ही बनायी गयी फिल्म दीवार
की याद दिलाती है । फिल्म में अनुष्का द्वारा निभाया गया अकीरा का किरदार कुछ-कुछ फिल्म बेंड बाजा
बरात में अनुष्का द्वारा ही निभाए गए श्रुति कक्कड़ के किरदार की याद दिलाता है (फिल्म पटियाला
हाउस की सिमरन और फिल्म लेडीज़ vs रिकी बहल की इशिका की भी ) |

 

अभिनय के लिहाज़ से बात करें तो पाएंगे कि समर के किरदार में शाहरुख़ जंचते  हैं । हालांकि अभिनय के
लिहाज़ से उनके लिए इस फिल्म उनके लिए कुछ नया नहीं है जैसा कि  देवदास, स्वदेस, माई नेम इज
खान सरीखी फिल्मों में था मगर उन्होंने अपना ट्रेडमार्क "राज-राहुल" टाइप किरदार पूरी शिद्दत के
साथ निभाया है । यह कहा जा सकता है कि फिल्म 'हकीकत' में बलराज सहानी द्वारा निभाए गए फौजी
के किरदार के सामानांतर अगर चंद किरदार हिंदी सिनेमा में हैं तो उनमें से एक इस फिल्म में शाहरुख़ द्वारा
निभाया हुआ किरदार है । अपनी पिछली दो फिल्मों डॉन 2 और रॉ-वन जहाँ शाहरुख़ पर बढती उम्र का
असर नज़र आ रहा था, के उलट इस फिल्म में वे काफी जवान और तरो-ताज़ा लगते हैं ।

 

मीरा के रूप में कटरीना अब तक के अपने करियर में सबसे ज्यादा खूबसूरत अगर लगी हैं तो जब तक है जान में
। कटरीना न सिर्फ इस फिल्म में बेहद खूबसूरत लगी हैं बल्कि उतनी ही खूबसूरत लगी हैं उनकी अदाकारी ।
अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ अभिनय कटरीना ने इस फिल्म में किया है । हालांकि वे कई जगह "प्लेन" भी
लगती हैं पर वे अच्छी लगी हैं ।

 

अनुष्का शर्मा का अभिनय भी काबिल-ए-तारीफ़ है । वे भी बेहद खूबसूरत लगी हैं । बिंदास, बेबाक, अल्हड
। 

अनुपम खेर का किरदार बहोत छोटा और बेअसर है । इस किरदार को  फिल्म का एक बेहद एहम किरदार
बनाया जा सकता था ।

ऋषि कपूर और नीतू कपूर के किरदार अनुपम खेर के किरदार के सामान ही छोटे तो हैं मगर बावजूद इसके वे
बेहद असरदार है । कटरीना और नीतू के मिलाप का द्रश्य देख बहुत से दर्शकों की आँखें नम हो सकती हैं ।

 

जब तक है जान की खामियों की बात करें तो फिल्म कुछ सवालों का जवाब नहीं देती जैसे - समर का किरदार
25 साल का है, जिसे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती और वह एक वेटर है मगर फिल्म में आगे चल कर वह "मेजर"
कैसे बन जाता है ?? और अनुपम खेर अचानक इंटरवल के बाद कहाँ गायब हो जाते हैं ? 

 

फिल्म सिनेमा घर से निकलने के बाद भी काफी देर तक आपके साथ रहती है । फिल्म का बैकग्राउंड संगीत
आपके कानों में बजता रहता है । फिल्म का संगीत हालांकि उतना अच्छा नहीं है जितना ए आर रहमान के
संगीत से उम्मीद की जाती है मगर वह फिल्म को सूट  करता है । फिल्म के पहले मध्यांतर से पहले एक के
बाद गाने आते हैं मगर ये गाने फिल्म की गति को प्रभावित नहीं करते बल्कि फिल्म को आगे बढ़ाते हैं ।

 

फिल्म देखने के बाद शायद आपको शायद लगे की कहीं कुछ कमी रह गयी मगर ऐसा लगने की वजह यह है
कि यश चोपड़ा सरीखे फिल्मकार जितना भी दें कम ही लगता है और दिल और भी ज्यादा मांगता है । फिल्म
देखकर अपने पहले प्यार की याद आने की पूरी सम्भावना है । यश चोपड़ा का अपने दर्शकों को आखिरी मगर
बेहद ख़ास तोफा कहा जा सकता है जब तक है जान को । 

 

फिल्म को 5 में से 3.5 नंबर दिए जा सकते हैं ।



                                                                                                   लेखक - अतुल शर्मा 

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